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चीन की ये बारंबार घुसपैठ क्या किसी जंग को न्योता दे रही?

दुनिया का ड्रैगन माने जाने वाले चीन पर हमने इतना भरोसा किया था कि शी जिनपिंग को साबरमती नदी के किनारे पर झूला झुलाने के बाद खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने हाथों से देसी चाय बनाकर उन्हें परोसी थी. तब पूरी दुनिया के मीडिया ने उस तस्वीर को दोनों देशों के बीच पनपने वाली दोस्ती की अनूठी और अद्वितीय मिसाल बताते हुए लिखा था कि दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले ये दो मुल्क अगर साथ आ गए तो सोचिए कि अमेरिका और यूरोप का क्या हाल होगा?

तब मीडिया का वह आकलन अपने हिसाब से बिल्कुल दुरुस्त था लेकिन, भारत समेत ये भला कौन जानता था कि चीन की नीयत ख़राब होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी. पिछले 15 सालों में चीन ने भारत में घुसपैठ कर जमीन हथियाने की जो कोशिश की है, उसे लेकर हुई एक अंतरराष्ट्रीय स्टडी में खुलासा किया गया है कि चीन अपनी हरकतों से बाज नहीं आने वाला है.इसमें आशंका जताई गई है कि इसे लेकर दोनों देशों के बीच तनाव इतना बढ़ जाएगा, जो अगर जंग में भी तब्दील हो जाए तो हैरानी नहीं होनी चाहिए.

गौर करने वाली बात ये भी है कि जिनपिंग लगातार तीसरी बार चीन के राष्ट्रपति बनने के हकदार हो चुके हैं और उन्होंने देश के संविधान में ऐसा संशोधन करवा दिया है कि वे मरते दम तक इसी पद पर बने रहेंगे.अभी दो दिन पहले ही उन्होंने अपनी सेनाओं को आगाह किया है कि वे किसी भी तरह के युद्ध से लड़ने के लिये तैयार रहें.हालांकि उन्होंने किसी देश का नाम नहीं लिया है लेकिन विदेशी कूटनीति के विश्लेषक मानते हैं कि उनका पहला निशाना ताइवान पर कब्ज़ा करना ही है,जिसके लिए वे अपनी सेनाओं को इशारा दे चुके हैं.

दरअसल,आपको ये जानकर हैरानी होगी कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत की देसी चाय पीने और उसका मिठास चखने के बाद से लगातार हमें ऐसा धोखा दिया है,जिसकी कल्पना पीएम मोदी ने कभी सपने में भी नहीं की होगी. जून,2020 में गलवान घाटी में उसकी घुसपैठ करने के बाद दोनों देशों की सेना के बीच जो संघर्ष हुआ और उसमें हमारे जितने सैनिक मारे गये, उससे साफ हो गया कि वो भारत की जमीन को कब्जाने के लिए किस कदर बेताब है.लेकिन साबरमती के किनारे चाय पीने के बाद महज तीन साल के भीतर ही चीन ने एक हजार से ज्यादा बार भारत की सीमा में घुसपैठ करने की कोशिश की है.

चीनी सेना ने कई बार की घुसपैठ

हालांकि हमारी सरकार ने पिछले तीन सालों के ऐसा कोई आंकड़ा जारी नहीं किया है कि इस दौरान चीन ने कितनी बार घुसपैठ की है. लेकिन साल 2019 में जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार, चीनी सेना ने 2016 और 2018 के बीच 1,025 बार भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ की.तत्कालीन रक्षा राज्य मंत्री श्रीपद नाइक ने नवंबर 2019 में लोकसभा में बताया था कि 2016 में चीनी सेना ने 273 बार भारतीय सीमा में घुसपैठ की थी, जो 2017 में बढ़कर 426 हो गई.जबकि 2018 में ऐसे मामलों की संख्या 326 थीं.

भारत-चीन सीमा विवाद की असली जड़

भारत-चीन सीमा विवाद की असली जड़ है 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा जिसे (एलएसी) कहा जाता है.चीन,अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत के हिस्से के रूप में मानते हुए उस पर अपना दावा करता है जबकि भारत इसका विरोध करता है. अक्साई चीन भी लद्दाख में एक विशाल क्षेत्र है जो वर्तमान में चीनी कब्जे में है. हाल ही में नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी, नीदरलैंड्स के तकनीकी विश्वविद्यालय और नीदरलैंड्स डिफेंस एकेडमी के विशेषज्ञों ने हिमालय में बढ़ते तनाव और भारतीय सीमा पर चीनी घुसपैठ का भू-स्थानिक विश्लेषण किया है.इसमें पिछले 15 साल के आंकड़े जुटाए गए हैं.उसकी रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय क्षेत्र में चीनी घुसपैठ की खबरें अब रोजाना की बात हो गई हैं. इसमें कहा गया है कि दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देशों के बीच बढ़ता तनाव वैश्विक सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा है.

पूर्वी लद्दाख में सीमा गतिरोध जारी

ये भी सच है कि भारत और चीन के बीच पिछले 29 महीने से अधिक समय से पूर्वी लद्दाख में सीमा गतिरोध जारी है.इस स्टडी में कहा गया है कि दोनों देश केवल अपने से जुड़ी कार्रवाइयों पर प्रतिक्रिया नहीं देते, बल्कि अपने मित्र गठबंधनों तथा प्रतिद्वंद्वी देशों के समूहों से जुड़ी कार्रवाइयों पर भी सक्रियता दिखाते हैं. क्वाड में भारत की भागीदारी और अमेरिका, भारत, जापान व आस्ट्रेलिया के बीच सुरक्षा संवाद एक ऐसा 'ट्रिगर' है,जो चीन-भारत सीमा पर  चीनी गतिविधि को काबू कर सकता है.

इस स्टडी की रिपोर्ट ये भी कहती है कि चीन की विदेश नीति तेजी से आक्रामक हो गई है. वह ताइवान के आसपास अपने सैन्य अभ्यास बढ़ा रहा है और दक्षिण चीन सागर में अपनी मौजूदगी भी बेहद तेजी से बढ़ा रहा है.इसमें सुझाव दिया गया है कि चीन की विस्तारवादी नीतियों का मुकाबला करने के लिए आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन तथा अमेरिका ने एक साझेदारी की है और भारत के लिए एक विकल्प है कि वह खुद को इन तीनों देशों के साथ संयोजित करे.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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