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केरल के बम धमाके हैं भारत के लिए चेतावनी, एक दिन पहले हुई हमास समर्थक रैली की हो सख्ती से जांच

कल यानी शनिवार 28 अक्टूबर को केरल के मल्लापुरम में हमास के समर्थन में एक रैली हुई, जिसमें हमास के नेता खालेद मशाल को भी वर्चुअली बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था. अपने भड़काऊ भाषण में खालेद ने वहां जमा मुसलमानों से सड़क पर उतरने और जिहाद में हिस्सा लेने की अपील की. आज दोपहर केरल में जब 2000 ईसाई एर्नाकुलम में प्रेयर करने इकट्ठा हुए थे, तो एक के बाद एक चार बमों का विस्फोट हुआ. भारत ने अभी संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव पर वोटिंग से भी खुद को अलग किया, जिसमें इजरायल से तुरंत संघर्षविराम करने की बात कही गयी थी. इस पर भी भारत में राजनीति तेज हो गयी है. इजरायल और हमास को लेकर काफी तेजी से मतों का ध्रुवीकरण हो रहा है. 

केरल में हमास समर्थक रैली

केरल में जो जमात-ए-इस्लामी हिंद के माध्यम से एक रैली हुई और उसमें हमास के नेता को वर्चुअली जोड़ा और उसने सभा को संबोधित भी किया. उसने चार बातों की अपील की थी, जो भारतीय सुरक्षा के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण मसला है और उस पर ध्यान दिया जाना चाहिए था, वह सुरक्षा के लिहाज से भी काफी अहम था. वहां लेकिन सीपीएम की सरकार है और उनकी नीति हमास के समर्थन की रही है, इसलिए उन्होंने कोई एक्शन नहीं लिया. हमास के नेता खालेद मशाल ने उस सभा में चार बातें कहीं जो बहुत ही संवेदनशील थीं, वहां 'अपरूट हिंदुत्व' के पोस्टर भी लगे थे. खालेद मशाल ने मुसलमानों से सड़कों पर उतरने और गुस्सा जाहिर करने, जिहाद के लिए तैयार रहने, हमास को पैसों के माध्यम से सपोर्ट करने और फिलीस्तीन के मसले पर सोशल मीडिया के प्रचार-प्रसार की बात कही. इजरायल और यहूदियों के खिलाफ तो भड़काऊ नारे लगे ही.

पिछले कई वर्षों से केरल कहीं न कहीं इस्लामिक आतंकी संगठनों का अड्डा बन चुका है और ऐसे में जमाते-इस्लामी-हिंद का यह प्रदर्शन भी उसी कड़ी में देखा जाना चाहिए. केरल से आइसिस के लड़ाके भी भर्ती हुए हैं और वहां के बहुतेरे मुसलमान आतंकी संगठनों के साथ खड़े होते भी देखे गए हैं. जिस इलाके में आज एक के बाद एक चार बम धमाके हुए हैं, वहां यहूदियों की भी आबादी है, हालांकि जहां धमाका हुआ, वहां 2000 से अधिक ईसाई अपना प्रेयर कर रहे थे. अब ये भी खुलकर सामने आ रहा है कि पिनराई विजयन की सरकार को केंद्रीय एजेंसियों ने चेतावनी भी दी थी, लेकिन उन्होंने उस पर ध्यान नहीं दिया. तो चंद वोटों के चक्कर में अगर आज वे हमास के साथ खड़े हो रहे हैं, भारत के मुसलमानों को बरगला रहे हैं कि वे हमास के साथ खड़े हों, जबकि भारतीय मुसलमानों का आतंक से कोई लेना-देना नहीं है, हमास से कोई लेना-देना नहीं है और वोटों की खातिर दोनों को इक्वेट करना, चूंकि केवल मजहबी आधार पर वे एक हैं, भारतीय मुसलमानों को एक अंधी खाई में धकेलने जैसा है. 

यूएन प्रस्ताव पर भारत का रुख बिल्कुल ठीक 

पहले तो यह समझा जाए कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में जो प्रस्ताव आया, उस पर बात की जाए. वह प्रस्ताव नॉन-बाइंडिंग था.  इस तरह के नॉन-बाइंडिंग रेजोल्यूशन जो होते हैं, वह केवल पॉलिटिकल नैरेटिव सेट करने के लिए होते हैं. जैसा कि इजरायल ने भी कहा कि अब यूएन की कोई जरूरत नहीं है और वह केवल कठपुतली बनकर रह गया है और वो सही तरीके से काम नहीं कर रहा है. अगर सचमुच मानवीय सहायता को लेकर यूएन चिंतित होता तो वह इस तरह के नॉन-बाइंडिग रेजोल्यूशन नहीं लाता. वहां बाइंडिंग रेजोल्यूशन की बात होती. यूएन का काम है कि वह मामले में दखल देकर शांतिपूर्ण निपटारा करे, लेकिन वह कई वर्षों से ऐसा करता दिख नहीं रहा है.

रही बात, पॉलिटिकल नैरेटिव की जो इजरायल को दबाव डालकर हमास के सामने पॉलिटिकली सरेंडर करने की है, मानवीय सहायता की दुहाई दी जाए, तो वह काम नहीं करेगा. वहां बात इजरायल के बंधकों को छोड़ने की भी आयी, और भारत भी यह मानता है कि हमास की ब्लैकमेलिंग जो आज भी चल रही है, वह ठीक नहीं है. वह अस्पतालों को और स्कूलों के पीछे छिपकर, अपना बेस बनाकर वहां से ऑपरेट कर रहा है और उसे गाजा में मरनेवालों की चिंता नहीं है, वह चाहता है कि वहां कुछ भी गलत हो और इजरायल की निंदा हो. यह गलत है. भारत का स्टैंड हमेशा से यही है कि विवाद का निबटारा शांतिपूर्ण तरीके से हो.

इजरायल और फिलीस्तीन आपस में बातचीत करें. आतंक को लेकर हमारी नीति जीरो-टॉलरेंस की है. यूएन जेनरल असेंबली के प्रस्ताव में भी भारत ने उस संशोधन का समर्थन किया कि हमास के 7 अक्टूबर के हमले की निंदा की जाए. यह संशोधन जब नहीं माना गया तो भारत ने उस प्रस्ताव से एब्सटेन करने का फैसला किया. भारत की विदेश नीति में फिलीस्तीन को लेकर कोई अंतर नहीं आया है. भारत आतंक का विरोधी है और इस फर्क को समझना चाहिए. कांग्रेस अभी चूंकि विपक्ष में है, 2024 का चुनाव आ रहा है, इसलिए वह जबरन इस बात को मुद्दा बना रही है, लेकिन कांग्रेस की जो नीति फिलीस्तीन पर थी, वही अभी भी चल रही है. इसे लेकर भ्रम नहीं फैलाना चाहिए. आतंकवाद के मसले पर भारत के सभी दलों को एक साथ इकट्ठा होना चाहिए. हमास का हमला आतंकी था और उसकी पुरजोर निंदा होनी चाहिए. हमास के साथ खड़े होने का परिणाम हम लोग केरल में देख ही रहे हैं, क्योंकि केरल में आइसिस का बेस बन चुका है और इसको लेकर काफी समय से केंद्रीय एजेंसियां चेतावनी भी दे रही हैं. 

केरल के धमाके चेतावनी

जिस तरीके से मजहब के नाम पर, रिलीजस सॉलिडैरिटी के नाम पर हमास के पक्ष में हवा बनाई जा रही है, तो ऐसी घटनाएं यहीं तक सीमित रहें, तभी ठीक है. 2024 में चुनाव होने हैं और सभी पार्टियों को संभल कर चलना चाहिए. चंद वोटों के चक्कर में सुरक्षा को दांव पर नहीं लगाना चाहिए. हर सरकार चाहे वो किसी भी दल की हो, उन्हें सुरक्षा एजेंसियों की मदद करनी चाहिए.

हमारे देश के अलावा भी अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जर्मनी इत्यादि में फिलीस्तीन के नाम पर जुलूस निकल रहे हैं और उनमें से कई तो हिंसक भी हो जा रहे हैं. भारत में मुसलमानों की बड़ी आबादी है और इस पर हमारी सुरक्षा एजेंसियों को चौकस रहना चाहिए. हमारे राजनीतिक दलों को भी इस संवेदनशील मुद्दे पर हल्की राजनीति से बाज आना चाहिए, वरना केरल से जो सिलसिला शुरू हुआ है, वह आगे और भी बढ़ सकता है. यह भारत के लिए खतरनाक होगा. इजरायल और फिलीस्तीन का मुद्दा सैकडो़ं सालों से चलता आ रहा है औऱ इसे शांतिपूर्ण तरीके से ही निबटाना चाहिए.  

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ़ लेखक ही ज़िम्मेदार हैं.]

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