एक्सप्लोरर

BLOG: बच्चे से पहले, मां का राइट टू फूड आता है

विश्व स्वास्थ्य संगठन बार-बार यह कह रहा है कि ब्रेस्टफीडिंग के बहुत ज्यादा लाभ नहीं होते. उसकी एक स्टडी लॉन्ग टर्म एफेक्ट्स ऑफ ब्रेस्टफीडिंग में कहा गया है कि ब्रेस्टफीडिंग के लाभ जरूरत से ज्यादा ही गिनाए जाते हैं जो उतने भी नहीं हैं.

औरत की एक और जिम्मेदारी तय की जा रही है- लीगली. मद्रास हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है- हर बच्चे के लिए स्तनपान उसका मौलिक अधिकार क्यों न बनाया जाए. एक केस की सुनवाई के समय कोर्ट ने यह तो कहा ही है, साथ ही यह भी कहा है कि सरकार को छह महीने तक बच्चे को स्तनपान कराए जाने पर कानून ही बना देना चाहिए. तो, इससे कौन असहमत होगा... आखिर बच्चे ही देश का भविष्य हैं. उनकी सेहत का ख्याल तो रखा ही जाना चाहिए. मुद्दा यह है कि बच्चे की सेहत की पूरी जिम्मेदारी उसकी जननी पर ही है. स्तनपान दूसरा कौन करा सकता है- किसकी आंखों में पानी, और आंचल में दूध होता है... मां की. मां भी वो, जो जन्म दे. यह काम सेरोगेट या एडॉप्शन करने वाली मां के जिम्मे तो आएगा नहीं- या पता नहीं.

ब्रेस्टफीडिंग पर है कानून बनवाने की तैयारी

इस एंगल से हम कभी सोचते भी नहीं. लिखे-बने पारिवारिक सेटअप से बाहर निकलना हमारे बस में नहीं. इसीलिए लगातार मां की भूमिका निश्चित करते रहते हैं. फिलहाल यह तय करने की कोशिश की जा रही है कि स्तनपान यानी ब्रेस्टफीडिंग कितना जरूरी है. वैसे इस बारे में सरकारी विज्ञापनों की भरमार है. छह महीने तक मां के दूध की अहमियत बताते हुए महिला और परिवार कल्याण मंत्री ने तो मेटरनिटी लीव को लंबा छह महीने करा दिया. एक बार फिर पुष्ट हो गया कि बच्चे को छह महीने तक मां की कितनी जरूरत होती है- पिता जाए तेल लेने. उसकी जरूरत बच्चे को कभी होती ही नहीं. सिवाय नाम की चिप्पी लगाने के अलावा. जायदाद देने के अलावा. सीना तान कर संपत्ति बढाने के अलावा. इसीलिए तो उसे नौकरी से कुछ महीने की छुट्टी दिलवाने के बारे में किसी ने विचार नहीं किया. अब बेस्टफीडिंग पर भी कानून बनवाने की तैयारी है.

मां के राइट टू फूड पर बाकी है लंबी चर्चा

मां का दूध बच्चे का राइट टू फूड है. मां के राइट टू फूड पर अभी लंबी चर्चा बाकी है. मां की हालत यह है कि हर घंटे औसत पांच औरतें बच्चे के जन्म देने के समय मौत का शिकार हो जाती हैं. 2015 में विश्व बैंक ने कहा था कि हमारे यहां मेटरल मॉरटैलिटी रेट कम हुआ है, फिर भी हालत खराब है. हर एक लाख जीवित बच्चों के जन्म के समय भारत में 174 औरतों की मौत हो जाती है. 2010 में तो यह आंकड़ा 215 था. जो नहीं मारी जाती हैं, उनमें से एक तिहाई औरतें कुपोषण का शिकार होती हैं. ये वे औरतें है जो रीप्रोडक्टिव एज यानी बच्चे पैदा करने की उम्र की होती हैं. इनका बॉडी मास इंडेक्स 18.5 kg/m2 से कम होता है. इसलिए यह भोंपू लगाकर बोलने की जरूरत नहीं कि बच्चे के भोजन के अधिकार से पहले मां के भोजन का अधिकार आता है. वह उसे मिलेगा?

अधिकार के साथ खींची जा रही हैं सीमाएं

दरअसल, अधिकार जितने मिल रहे हैं, उतनी सीमाएं भी खींची जा रही हैं. मशहूर अमेरिकी लेखिका जेनिफर सीनियर ने कहीं कहा था- श्रम की दुनिया औरतों के लिए जितनी उदार हो रही है, उतना ही औरतों से अपेक्षाएं भी बढ़ रही हैं. आप उनमें चाबी भरते रहना चाहते हैं ताकि वे अपनी नई भूमिका तो निभाए ही, तयशुदा भूमिका से भी चिपकी रहें. पूरी तरह से उसी तरह, जिस तरह आप तय करते रहें. आप तय करें कि वह पार्ट टाइम काम करे, या वर्क फ्रॉम होम चुने. दिलचस्प बात यह है कि हमारे नए मेटरनिटी बेनेफिट वाले एक्ट में वर्क फ्रॉम होम का ऑप्शन भी है. औरत चाहे तो बच्चा पैदा करने के बाद यह विकल्प भी चुन सकती है- तब काम करना और बच्चे पालना, दोनों आसान होगा.

जरूरत से ज्यादा गिनाए जाते हैं  ब्रेस्टफीडिंग के लाभ 

पर यह वह तय कहां कर रही है- यह तो आप फिक्स कर रहे हैं. आपने फिक्स किया है कि ब्रेस्ट मिल्क अमूल्य अमृत तुल्य है- उससे बढ़कर है. इसलिए बच्चे को छह महीने तक यह मिलना ही चाहिए. इसके लिए औरत छह महीने तक या तो कामकाज करे ही नहीं- यह उसे छोड़कर घर पर बैठ जाए. बात बच्चे की है- बच्चे के लिए जिम्मेदार कौन... मां. यह बात और है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन बार-बार यह कह रहा है कि ब्रेस्टफीडिंग के बहुत ज्यादा लाभ नहीं होते. उसकी एक स्टडी लॉन्ग टर्म एफेक्ट्स ऑफ ब्रेस्टफीडिंग में कहा गया है कि ब्रेस्टफीडिंग के लाभ जरूरत से ज्यादा ही गिनाए जाते हैं जो उतने भी नहीं हैं. सोशल साइंस एंड मेडिसिन नाम के एकैडमिक जरनल के एक अध्ययन में तो ओहायो यूनिवर्सिटी की एक टीम ने हजारों बच्चों पर सर्वे किया और पाया कि मां का दूध और दूसरा दूध पीने वाले एक ही परिवार के दो बच्चों में कोई खास फर्क नहीं है.

यह फर्क हमारे दिलो-दिमाग में है. हमारा दिलो-दिमाग तो अब भी औरत की चौदहद्दी बांधने पर तुला है. पगहा खूंटे से बंधा है, उतना ही घूम सकता है जितनी रस्सी है. घूम-घूमकर थक जाता है तो बैठ जाता है. बच्चे पैदा करने के बाद औरत थक गई तो खूंटे के पास बैठ जाती है. यह भूल जाती है कि दोबारा उठकर घूमना मुश्किल होने वाला है. हमारे यहां मर्द औरतों के मुकाबले 67% अधिक कमाई करते हैं. इसके अलावा फादरहुड मर्दों के लिए बोनस होता है, मदरहुड औरत के लिए पैनल्टी. औसत पुरुष की तनख्वाह पिता बनने के बाद बढ़ती जाती है, औरत की घटती जाती है. मैसाच्यूसेट्स यूनिवर्सिटी की सोशियोलॉजी की प्रोफेसर मिशेल जे बुडुग ने इसी पर अपना थीसिस लिखा है. उनका कहना है कि हर बच्चे के पैदा होने के बाद औरत की तनख्वाह में कटौती होती जाती है. जाहिर सी बात है, इसकी वजह यह है कि औरत के लिए नौकरी करना मुश्किल होता जाता है. वह घर परिवार की जिम्मेदारी में बंधती चली जाती है.

औरत ही तय करें की उनके लिए अच्छा क्या है

ब्रेस्टफीडिंग को लीगली मैन्डेटरी बनाया जाएगा तो यही होगा. हमारे यहां अनौपचारिक क्षेत्र में औरतें बड़ी संख्या में हैं. ऐसे नियम कानून उन्हें श्रम की दुनिया से पूरी तरह से आउट कर देंगे. इसीलिए सिर्फ छुट्टी दे देने, बेनेफिट्स थमा देने से काम चलने वाला नहीं है. काम करने की जगहों पर औरतों को रीइंटिग्रेट करने की जरूरत है. ब्रेस्टफीडिंग एक विकल्प ही रहे तो अच्छा. औरत ही तय करें की उनके लिए क्या अच्छा है. दुश्वारियों और रूढ़ियों के जाले साफ कीजिए. अपनी आंखों की धुंध भेदिए. जीवन के बदलावों में औरत का साथ दीजिए- वही अच्छा होगा.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

View More

ओपिनियन

Sponsored Links by Taboola
25°C
New Delhi
Rain: 100mm
Humidity: 97%
Wind: WNW 47km/h

टॉप हेडलाइंस

'सोशल मीडिया, बड़े मुद्दे और नेता…', एक्शन में राहुल गांधी, पार्टी को दिए ये बड़े निर्देश
'सोशल मीडिया, बड़े मुद्दे और नेता…', एक्शन में राहुल गांधी, पार्टी को दिए ये बड़े निर्देश
लखनऊ के मानस ने पत्नी और बहन को मारने के बाद सुनी हनुमान चालीसा, फिर खुद को भी मारी गोली
लखनऊ के मानस ने पत्नी और बहन को मारने के बाद सुनी हनुमान चालीसा, फिर खुद को भी मारी गोली
'हिंदू-मुस्लिम वाली सोच से बाहर आएं...', शर्मिला टैगोर पर क्यों भड़कीं कंगना रनौत?
'हिंदू-मुस्लिम वाली सोच से बाहर आएं...', शर्मिला टैगोर पर क्यों भड़कीं कंगना रनौत?
‘दिव्या काश तुम इतनी सीधी नहीं होतीं’ पति की गोली का शिकार बैंक मैनेजर को बहन ने दी भावुक विदाई
‘दिव्या काश तुम इतनी सीधी नहीं होतीं’ पति की गोली का शिकार बैंक मैनेजर को बहन ने दी भावुक विदाई

वीडियोज

Sansani: दौलत की खातिर पति की साजिश !
SRK के गाने पर Air Force Officers का Dance, ‘Operation Safed Sagar’ का Emotional किस्सा
Bollywood News: 'टॉक्सिक' में दिखेगा अंधाधुंध खून-खराबा! UK सेंसर बोर्ड ने दी 18+ रेटिंग, हिंसा और बोल्ड सीन्स में मिले 5/5 नंबर (20.08.26)
Bareilly Ke Bacchan: 😳Ajab Singh की हरकत पर Sangam ने दी नसीहत, ससुर जी को बुरी लगी बातें! #sbs
Sunny Deol की ‘Batwara 1947’ क्यों हुई फ्लॉप? Muslim किरदार और कहानी पर उठे सवाल

पर्सनल कार्नर

टॉप आर्टिकल्स
टॉप रील्स
'सोशल मीडिया, बड़े मुद्दे और नेता…', एक्शन में राहुल गांधी, पार्टी को दिए ये बड़े निर्देश
'सोशल मीडिया, बड़े मुद्दे और नेता…', एक्शन में राहुल गांधी, पार्टी को दिए ये बड़े निर्देश
लखनऊ के मानस ने पत्नी और बहन को मारने के बाद सुनी हनुमान चालीसा, फिर खुद को भी मारी गोली
लखनऊ के मानस ने पत्नी और बहन को मारने के बाद सुनी हनुमान चालीसा, फिर खुद को भी मारी गोली
'हिंदू-मुस्लिम वाली सोच से बाहर आएं...', शर्मिला टैगोर पर क्यों भड़कीं कंगना रनौत?
'हिंदू-मुस्लिम वाली सोच से बाहर आएं...', शर्मिला टैगोर पर क्यों भड़कीं कंगना रनौत?
‘दिव्या काश तुम इतनी सीधी नहीं होतीं’ पति की गोली का शिकार बैंक मैनेजर को बहन ने दी भावुक विदाई
‘दिव्या काश तुम इतनी सीधी नहीं होतीं’ पति की गोली का शिकार बैंक मैनेजर को बहन ने दी भावुक विदाई
पीवी सिंधु वर्ल्ड चैंपियनशिप से बाहर, पहली बार चीनी खिलाड़ी के हाथों मिला हार
पीवी सिंधु वर्ल्ड चैंपियनशिप से बाहर, पहली बार चीनी खिलाड़ी के हाथों मिला हार
BNP नेता मिर्जा फखरुल आलमगीर होंगे बांग्लादेश के राष्ट्रपति, इतने वोटों से जीता चुनाव
BNP नेता मिर्जा फखरुल आलमगीर होंगे बांग्लादेश के राष्ट्रपति, इतने वोटों से जीता चुनाव
सम्राट चौधरी की शिक्षा विभाग संग बैठक खत्म, लिए गए ये बड़े फैसले
सम्राट चौधरी की शिक्षा विभाग संग बैठक खत्म, लिए गए ये बड़े फैसले
‘वी आर Gen Z’, वायरल गर्ल ने भारतीय सेना से मांगी माफी, जानें क्या कहा?
‘वी आर Gen Z’, वायरल गर्ल ने भारतीय सेना से मांगी माफी, जानें क्या कहा?
Embed widget