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अगर आतंकी रमज़ान का एहतराम नहीं करते तो उनके खिलाफ नरमी बरते जाने का कोई औचित्य नहीं

जम्मू-कश्मीर में केंद्र सरकार के एकतरफा सीजफायर के एलान के अगले ही दिन आतंकियों ने दो वारदात करके अपने नापाक इरादे ज़ाहिर कर दिए हैं. एक तरफ जहां रमज़ान के पहले ही दिन लश्कर-ए-तैय्यबा के आतंकियों ने हाजिन में सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा की तैयारी कर रहे 23 साल के एक नौजवान की हत्या कर दी, वहीं सूबे की राजधानी श्रीनगर की एक पॉश कालोनी में सुरक्षाबलों पर हमला करके राज्य का माहौल बिगाड़ने की कोशिश की है.

आतंकियों ने सुरक्षा बलों के एकतरफा सीजफायर का मज़ाक उड़ाते हुए श्रीनगर में डल झील के पास एक होटल की सुरक्षा में तैनात सुरक्षा बलों के जवानों पर हमला किया और उनके हथियार छीनकर भाग खड़े हुए. जहां यह हमला हुआ है वहां से कुछ ही फासले पर मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती, पूर्व मुखमंत्री उमर अब्दुल्ला और फारूक अब्दुल्ला समेत राज्य की कई बड़ी राजनीति हस्तियों के घर हैं. ज़ाहिर है ऐसे हाई प्रोफाइल और सुरक्षा वाले इलाके में हमला करके आतंकियों ने सुरक्षा बलों के सीधी चुनौती दी है. राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की विशेष सिफारिश पर ही गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सुरक्षा बलों को रमज़ान में आतंकियों के चलाए जा रहे अभियान को रोकने की हिदायत दी है.

गौरतलब है कि गृह मंत्रालय ने सुरक्षाबलों को आतंकियों के खिलाफ़ अभियान रोकने की हिदायत देते वक्त जवाबी कार्रवाई पर की रोक नहीं लगाई थी. लिहाजा इस हमले के बाद सुरक्षाबलों ने हाई अलर्ट जारी करके आतंकियों को ढूंढने के लिए तलाशी अभियान शुरू कर दिया है. सेनाध्यक्ष जनरल विपिन रावत पहले ही कह चुके हैं कि सेना उससे लड़ने वाले आतंकियों के खिलाफ कोई नरमी नहीं बरतेगी. बरतनी भी नहीं चाहिए. अगर आतंकी रमज़ान के पवित्र महीने का भी एहतराम नहीं करते तो फिर उनके खिलाफ नरमी बरते जाने का कोई औचित्य नहीं है.

दरअसल आतंकियों की नज़र में न रमज़ान की कोई अहमियत है और नहीं ईद की. न उनके लिए मस्जिद कोई मायने रखती है और न ही नमाज़ी. इसलिए उनके हमले न रमज़ान में रुकते हैं न ईद पर. आतंकी हमला करने के मामले में न मस्जिदों को बख्शते हैं और नहीं नमाज़ियों को. अक्सर मस्जिदों में जुमे की नमाज़ के दौरान भी आतंकी हमलों की खबरें आती रहती हैं. इसी लिए सोशल मीडिया पर केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह से सुरक्षा बलों को रमज़ान में आतंकियों के खिलाफ़ चलाए जा रहे अभियान को रोकने की हिदायत देने वाले ट्वीट पर जमकर मज़ाक उड़ा था.

जम्मू-कश्मीर में आतंकियों ने कभी रमज़ान का एहतराम नहीं किया. पिछले साल भी रमज़ान के दौरान कश्मीर जलता रहा था. पिछले साल यानि 2017 में रमज़ान के दौरान फौज, पुलिस, आतंकवादी और स्थानीय नागरिकों को मिलाकर 42 लोग मारे गए थे. सबसे ज्यादा दर्दनाक मौत डीएसपी एमए पंडित की हुई थी. उन्हें भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला था. रमज़ान के दौरान पिछले साल 5 स्थानीय नागरिक, 9 पुलिसकर्मी और 25 आंतकी मारे गए थे. इनमें हिजबुल कमांडर सबजार बट भी शामिल था. उसे सुरक्षाबलों ने रमज़ान की शुरुआत में ही एक एनकाउंर में मारा था. उसकी मौत के बाद तीन दिनों तक बाजार बंद रहे. सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच हिंसक झड़प हुई. इसके करीब तीन हफ्ते बाद ही आतंकियों ने पुलिस चौकी को निशाना बनाया जिसमें एसएचओ फिरोज अहमद डार समेत 6 पुलिसकर्मियों की मौत हुई.

साल 2016 में रमज़ान के दौरान 32 लोगों की मौत हुई थी. इनमें 2 जवान, 22 आंतकी और 8 सीआरपीएफ के जवान थे. हालांकि उस साल कोई स्थानीय नागरिक नहीं मारा गया था. रमजान खत्म होने के कुछ ही दिन बाद 8 जुलाई 2016 को हिजबुल के पोस्टर ब्वॉय बुरहान वानी को सुरक्षाबलों ने एनकाउंटर में मार गिराया गया था. उसके बाद से कश्मीर में हिंसा का एक नया दौर शुरू हुआ था.

जम्मू-कश्मीर में सुरक्षाबलों की एकतरफा सीज़फायर कभी कामयाब नहीं रहा. इससे पहले 19 नवंबर 2000 को तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने आतंकियों के खिलाफ एकतरफा अभियान रोकने का एलान किया था और यह 28 नवंबर 2000 से लागू किया गया था. तब केंद्र सरकार की यह योजना फ्लॉप रही थी. आतंकियों ने इसका फायदा उठाते हुए कई हमले किए थे. इसमें सुरक्षाबलों के 43 जवानों सहित 129 लोग मारे गए थे.

लिहाज़ा पुराना रिकॉर्ड देखते हुए यह कहा जा सकता है कि रमज़ान के दौरान सुरक्षाबलों को आतंकियों के खिलाफ किसी तरह की नरमी नहीं बरतनी चाहिए. सुरक्षा एजेंसियों का भी साफ मानना है कि आतंकी समूहों पर पैना निगाह रखनी होगी क्योंकि एकतरफा सीज़फायर जैसे मौकों का इस्तेमाल आतंकी अपना संगठन मजबूत करने में करते हैं. हालांकि केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने एकतरफा सीज़फायर को आतंकी हमलों से इस्लाम का नाम खराब करने वालों को अलग-थलग करने के लिए यह महत्वपूर्ण क़दम बताया है. अगर आतंकी ही इस्लाम का नाम खराब करने पर तुले हैं तो भला कोई सरकार इसमें क्या कर सकती है.

गौरतलब है कि 1990 के दशक में रमजान के दौरान घाटी में आतंकवादी भी सुरक्षाबलों पर हमला नहीं करते थे. लेकिन पिछले कुछ सालों में रमजान के दौरान भी हिंसा होती है. ऐसा लगता है कि आतंकी सुरक्षाबलों को चिढ़ाने के लिए रमज़ान को दौरान उन पर योजनाबद्ध तरीके से हमला करते हैं. लिहाज़ा रमज़ान में आतंकियों के खिलाफ अभियान रोकने का कोई तार्किक आधार नहीं है. केंद्र सरकार को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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