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BLOG: ‘बुराई’ फैलाने वाले का जेंडर क्या है, इससे क्या फर्क पड़ता है

यह किसी को भी बुरा लग सकता है, जब एक सी करनी के लिए किसी को कम सजा मिले, किसी को ज्यादा. ऐसा ही केरल की इंडियन नेवल एकेडमी की एक महिला कैडेट को महसूस हुआ. एक पुरुष कैडेट और उसने एक दूसरे को किस किया. नेवी में ट्रेनीज़ एक दूसरे के साथ शारीरिक निकटता नहीं रख सकते. यहां तक तो ठीक है. लेकिन इस मामले में महिला कैडेट को एकेडमी से निकालने का आदेश दिया गया. जबकि पुरुष कैडेट को सिर्फ चेतावनी दी गई. इसीलिए महिला कैडेट ने आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल में इस भेदभाव के खिलाफ अर्जी लगाई. ट्रिब्यूनल ने फिलहाल महिला कैडेट को हटाने की प्रक्रिया पर रोक लगा दी है और इस मामले की सुनवाई अगले साल जनवरी में होगी.

भारतीय सेनाओं में महिलाओं की स्थिति यूं धीरे-धीरे सुधर रही है. अभी सितंबर में इंडियन नेवी ने हेलीकॉप्टर स्ट्रीम में दो महिला अधिकारियों को ऑबर्जवर के तौर पर चुना है. ये पहली महिला एयरबॉर्न कॉम्बैटेंट हैं जो वॉरशिप्स को ऑपरेट करेंगी. मार्च में सुप्रीम कोर्ट ने सेना में महिलाओं को परमानेंट कमीशन देने की बात कही थी, जोकि नेवी पर भी लागू होता है. वैसे नेवी ने पिछले साल दिसंबर में पहली महिला पायलट चुनी थी. यह डोर्नियर एयरक्राफ्ट की पायलट के तौर पर चुनी गई थी जोकि फिक्स्ड विंग वाला एयरक्राफ्ट होता है और एशोर इस्टैबिशमेंट से ऑपरेट किया जाता है.

1992 से पहले तक नेवी में महिला अधिकारी सिर्फ मेडिकल सेवाओं के लिए नियुक्त की जाती थीं. जुलाई 1992 में नेवी ने महिलाओं को चुनना शुरू किया- पहले स्पेशल इंट्री स्कीम के तहत, और फिर शॉर्ट सर्विस कमीशन पर. लेकिन यह सिर्फ चुनींदा शाखाओं के लिए ही था. फिर साल बदलते गए और नई शाखाओं में औरतों को नियुक्त किया जाने लगा- एयर ट्रैफिक कंट्रोल, ऑबजर्वर, लॉ, लॉजिस्टिक्स, शिक्षा, नेवल आर्किटेक्चर वगैरह. 2000 की शुरुआत में मेडिकल और लॉजिस्टिक्स शाखाओं की महिला अधिकारियों को बोर्ड नेवल शिप्स पर तैनात किया गया लेकिन किन्हीं कारणों से इन तैनातियों को फिर रोक दिया गया. यूं ऑनबोर्ड वॉरशिप्स पर महिलाओं की तैनातियों में कई तरह की चुनौतियां हैं. सबसे बड़ी बात तो यह है कि बड़ी वॉरशिप्स पर महिलाओं के हिसाब से लिविंग अरेंजमेंट्स नहीं हैं. इसके लिए न सिर्फ ये व्यवस्थाएं करनी पड़ेंगी बल्कि जेंडर सेंसिटाइजेशन भी करना होगा. यह जेंडर सेंसिटाइजेशन का ही मामला है कि केरल की नेवल एकेडमी में महिला और पुरुष कैडेट्स के साथ अलग-अलग किस्म का व्यवहार किया गया.

तो, यह मामला भले ही थम गया लगता हो लेकिन मुद्दा तो बड़ा है. एक से काम के लिए औरतों और मर्दों को अलग-अलग व्यवहार का सामना क्यों करना पड़ता है. ऐसी ही एक और घटना हाल में हुई है. सुपरमॉडल रहे मिलिंद सोमन ने अपने जन्मदिन पर गोवा के एक बीच पर बिन कपड़ों के दौड़ लगाई. पुलिस ने क्या किया.. उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 294 के तहत मामला दर्ज किया. बाकी, कुछ खास हुआ नहीं. हां, इससे कुछ दिन पहले गोवा में पोर्न वीडियो शूट करने के आरोप में मॉडल पूनम पांडे और उनके पति को गिरफ्तार किया गया था. बाद में भले ही उन्हें बेल पर छोड़ दिया गया लेकिन उन्हें हिदायत दी गई कि वे अदालत की अनुमति के बिना गोवा छोड़कर नहीं जा सकते और हर छह दिन में एक बार उन्हें पुलिस स्टेशन आकर हाजिरी देनी होगी. इसके बाद कई लोगों ने सोशल मीडिया पर सवाल किए थे- एक से ‘अपराध’ के लिए मिलिंद और पूनम के साथ अलग-अलग व्यवहार क्यों? न्यूडिटी कोई भी फैलाए- आदमी या औरत, अगर यह समाज के लिए ‘बुरा’ है तो इस ‘बुराई’ फैलाने वाले का जेंडर क्या है, क्या इससे फर्क पड़ना चाहिए? इसीलिए अगर महिला कैडेट का एकेडमी में किस करना गलत है, तो पुरुष कैडेट का क्यों नहीं?

इसकी एक वजह और है. लड़कियों को यह बताने वाले कितने ही हैं, कि उन्हें कैसे व्यवहार करना चाहिए. यह भी कि वे कैसे कपड़े पहनें, कैसे बोलें- कितना हंसें. किसके साथ बोलें, और किसके साथ हंसें. जब भी लड़कियां आजाद हवा में सांस लेने की कोशिश करती हैं, आदमियों को नथुनी, सिंदूर और हिजाब की जंजीरों के दरकने की आवाज सुनाई देने लगती है. हर आजाद ख्याल लड़की को देखकर उन्हें अपने मर्द होने की वैधता खतरे में दिखाई देती है. यह नैतिक पहरेदारी का ही तो मसला है कि हुजूम के हुजूम लड़कियों की जिंदगी के फैसलों में दखल दे रहे हैं. उन पर निगाह रखने और लगाम लगाने की दुहाई दे रहे हैं. उनके मजहबी रुख को लेकर परेशान हैं.

कभी एक पूर्व महिला एवं बाल कल्याण मंत्री ने लड़के-लड़कियों के हारमोनल विस्फोट पर चिंता जताई थी. वह चाहती थीं कि गर्ल्स हॉस्टलों में नाइट कर्फ्यू लगा रहे. दिन भर लड़के-लड़कियां जो मर्जी करें लेकिन शाम होते ही अपने-अपने दबड़ों में घुस जाएं. बाहर निकलेंगे तो क्या कुछ हो जाएगा- उनके हारमोनल विस्फोट से सारा समाज, सारी संस्कृति तहस-नहस हो जाएगी. दिल्ली के मिरांडा हाउस में पढ़ चुकी और हॉस्टल में रहने वाली एक लड़की ने बताया था कि उसकी वॉर्डन कहा करती थी- शाम के बाद हॉस्टल से बाहर निकलो- बस, प्रेग्नेंट होकर वापस मत आना. बेशक, जब औरत की देह को निजी संपत्ति मान लिया जाएगा तो ऐसे ही उदगार बरसेंगे.

यह भोंपू लगाकर बोलने की जरूरत नहीं कि मध्ययुगीन समाज की औरतों की जगह नई लड़कियों ले ली है. उनकी प्रेम बेल वर्ण, वर्ग, नस्ल और संप्रदाय की कंटीली दीवारें फलांगती हुई, आसमान को छूना चाहती है. नेवल एकेडमी की महिला कैडेट साहस का ऐसा ही नया चेहरा है.

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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