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क्या गुजरात कांग्रेस में असंतोष की आग दिसंबर की चुनावी गर्मी से पहले बुझेगी?

गुजरात विधानसभा की 182 सीटों के लिए चुनाव होने में अब मुश्किल से 6 महीने का ही वक्त बचा है लेकिन कांग्रेस पार्टी सत्तारूढ़ खेमे में दहशत पैदा करने की बजाए खुद दो फाड़ होने की कगार पर है. लगभग 20 वर्षों से राज-काज चला रही भाजपा के खिलाफ सूबे में लगातार बढ़ रही एंटीइनकंबैंसी, जातीय असंतोष और सरकार विरोधी उग्र आंदोलनों का फायदा उठाने की बजाए कांग्रेस को अपना कुनबा संभालने में ही एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाना पड़ रहा है. गुजरात कांग्रेस के वरिष्ठ ज़मीनी नेता शंकर सिंह वाघेला चुनाव की तैयारियों से संबंधित बैठकों तक में शामिल नहीं हो रहे हैं.वाघेला गुजरात कांग्रेस की आंतरिक कलह को सुलझाने के लिए पिछले माह नई दिल्ली में हुई एआईसीसी की बैठक अधूरी छोड़ कर बाहर निकल गए थे और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के साथ कोर कमेटी के सामूहिक फोटोग्राफ के दौरान भी वह उपस्थित नहीं हुए. जबकि गुजरात कांग्रेस के नवनियुक्त राज्य प्रभारी अशोक गहलोत, एआईसीसी अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल, गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भरत सिंह सोलंकी, राज्य कांग्रेस प्रवक्ता शक्ति सिंह गोहिल, गुजरात कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अर्जुन मोधवाडिया और अन्य नेताओं ने गहन चुनावी चर्चा की. इतना ही नहीं उसी दौरान वाघेला ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी समेत पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को अपने ट्विटर अकाउंट पर अनफॉलो कर दिया था जिसका गुजरात के राजनीतिक हलकों में विद्रोह का संकेत भी चला गया. आखिर गुजरात कांग्रेस, ख़ास तौर पर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शंकर सिंह वाघेला के असंतोष की वजह क्या है? जवाब काफी उलझा हुआ है. एक तरफ वाघेला कह रहे हैं कि उनका लक्ष्य गुजरात में कांग्रेस की जोरदार वापसी कराना है, दूसरी तरफ अपनी ‘भाजपा वापसी’ की अटकलों पर 6 जून को उन्होंने बयान दे दिया- ‘अभी कुछ नहीं... लेकिन समय आने पर आपको सब बताऊंगा.” हालात इतने विस्फोटक हैं कि कांग्रेस के वर्तमान 57 में से 36 विधायक वाघेला को बतौर आगामी मुख्यमंत्री घोषित करने की जिद पर अड़े हैं, जबकि गुजरात कांग्रेस के नवनियुक्त राज्य प्रभारी अशोक गहलोत की राय है कि घोषित नाम के साथ चुनाव मैदान में उतरना कांग्रेस के लिए घाटे का सौदा होगा. उधर विधायकों की मांग को हवा देते हुए वाघेला कहते हैं कि कांग्रेस के हर विधायक को अपनी भावनाएं व्यक्त करने का अधिकार है. भले खुलकर न कहें लेकिन दबंग ठाकुर नेता शंकर सिंह वाघेला की महत्वाकांक्षा समझ में आती है. 1995 में भाजपा को जिताने में अहम योगदान देने वाले वाघेला की जगह जब दिग्गज पटेल नेता केशुभाई को गुजरात का मुख्यमंत्री बना दिया गया था तो वह अपमान वाघेला से सहन नहीं हुआ और पार्टी से बगावत करके 1996 में उन्होंने अपनी ‘राष्ट्रीय जनता पार्टी’ बनाकर सीएम की कुर्सी पर कब्ज़ा कर लिया था, जिसका आगे चलकर कांग्रेस में विलय हो गया था. कभी आरएसएस स्वयंसेवक रहे वाघेला कांग्रेस की सरकार में केंद्रीय कपड़ा मंत्री भी रहे. लेकिन राज्य और केंद्र से कांग्रेस की सत्ता जाने के बाद से वाघेला खाली हाथ बैठे हैं और अब जाकर गुजरात में उन्हें अपने लिए बड़ा अवसर नज़र आ रहा है. जाहिर है कि उम्र के 78 वें पड़ाव पर उन्हें लग रहा होगा कि अभी नहीं तो कभी नहीं. लेकिन गुजरात के नए-नए प्रभारी बने राजस्थान के पूर्व सीएम और अनुभवी कांग्रेसी अशोक गहलोत अच्छी तरह जानते हैं कि वाघेला को बतौर सीएम प्रस्तुत करने का पार्टी पर कितना खतरनाक असर हो सकता है? कहा जाता है कि गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमेटी पर चार प्रमुख गुटों की आपसी खींचतान हावी रहती है. ये हैं- भरत सिंह सोलंकी गुट, शक्ति सिंह गोहिल गुट, अर्जुन मोधवाडिया गुट और शंकर सिंह वाघेला गुट. पिछले तीन विधानसभा चुनावों से देखा जा रहा है कि जैसे ही सीटों के लिए टिकट वितरण का समय आता है, ये चारों गुट अपने-अपने लोगों को ज़्यादा से ज़्यादा टिकट दिलाने की कोशिश करते हैं और आखिरकार अनउपयुक्त उम्मीदवारों के चयन के चलते धूल चाटते नज़र आते हैं. शायद इसीलिए गहलोत के बाद जीपीसीसी प्रमुख सोलंकी ने भी कहा है कि दिसंबर 2017 के चुनाव हेतु पार्टी किसी भी व्यक्ति को सीएम उम्मीदवार घोषित नहीं करेगी. उधर सत्तारूढ़ भाजपा गोधरा, जामनगर, साबरकांठा और खेड़ा जिलों के कांग्रेसी खेमों में घुसकर अपने शिकार ढूंढ़ रही है, क्योंकि यहां उसके जीतने की संभावनाएं कम हैं. कहा जाता है कि स्वयं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और राज्य में पार्टी के प्रभारी महसचिव भूपेंद्र यादव कांग्रेस के दर्ज़नों असंतुष्ट नेताओं से सीधे तोल-मोल कर रहे हैं. मार्च में शाह और गुजरात सीएम विजय रूपानी वाघेला के दफ्तर में जाकर मिले थे. भाजपा अच्छी तरह से जानती है कि अगर वाघेला की ‘घर वापसी’ हो गई तो इस बार गुजरात का उसका ‘मिशन 150’ आसान हो जाएगा. पार्टी को यकीन है कि अगर वाघेला लौटे तो उनके विधायक बेटे महेंद्र सिंह, उद्योगपति बलवंत सिंह राजपूत और गोधरा विधायक सीके रावलजी भी भाजपा में शामिल हो जाएंगे. कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव 2017 के लिए कुछ स्वअनुशासन बनाए थे. बीती मार्च में जीपीसीसी ने घोषणा की थी कि दो बार विधानसभा चुनाव हार चुके उम्मीदवारों को टिकट नहीं दिया जाएगा. साथ ही पिछले चुनावों में जो उम्मीदवार 20000 मतों के अंतर से चुनाव हारे हैं, उन्हें भी टिकट नहीं मिलेगा, जीते हुए विधायक अपना चुनाव क्षेत्र नहीं बदल सकेंगे, हर जिले में कम से कम एक महिला उम्मीदवार होगी आदि. लेकिन जून में केंद्रीय नेतृत्व द्वारा जीते हुए सभी 57 विधायकों की टिकट पर मुहर लगने से वाघेला की नाराजगी बढ़ गई है और कांग्रेस का सारा आत्मानुशासन डगमगा गया है. गुजरात के असंतुष्ट कांग्रेसियों की शिकायत यह है कि राज्य के ज़मीनी नेता दिल्ली में बैठे हवाई नेताओं की तानाशाही से तंग हैं. देखना दिलचस्प होगा कि नए राज्य प्रभारी अशोक गहलोत केंद्रीय फायरबिग्रेड के नेतृत्व में इस आग को दिसंबर की चुनावी गर्मी से पहले ठंडा कर पाते हैं या नहीं! -विजयशंकर चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार लेखक से ट्विटर पर जुड़ने के लिए क्लिक करें-  https://twitter.com/VijayshankarC और फेसबुक पर जुड़ने के लिए क्लिक करें-  https://www.facebook.com/vijayshankar.chaturvedi
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