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Blog: क्या 2जी में 'वन टू का फोर' नहीं था जी?

खोदा पहाड़ निकली चुहिया और वह भी मरी हुई! 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में सीबीआई की विशेष अदालत के फैसले को देखते हुए तो यही कहा जा सकता है. साल 2011 की शुरुआत में एक लाख छिहत्तर हज़ार करोड़ रुपए के कथित घोटाले का भारी हल्ला मचा था लेकिन 2017 समाप्त होते-होते दोषी कोई नहीं! गब्बर के शब्दों में कहें तो 'बहुत नाइंसाफी है!'

अदालत के इस फैसले ने ऐसे कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनके जवाब निकट भविष्य में मिलने मुश्किल हैं. सवाल हमारी न्याय-व्यवस्था से लेकर जांच एजेंसियों और पॉलिटिकल क्लास यानी राजनीतिक वर्ग की कार्यप्रणाली और व्यवहार से जुड़े हुए हैं. सवाल यह भी है कि क्या हम सचमुच ‘सच का सामना’ करना चाहते हैं?

अगर हम 2जी पर आए फैसले को परे रख कर भी बात करें तो आम लोगों की यह धारणा प्रबल होती जा रही है कि न्याय व्यवस्था में देर भी है और अंधेर भी! कहने को तो कानून सबके लिए समान है पर आम (गरीब और कमज़ोर) लोगों को न्याय देरी से मिलता है या नहीं भी मिलता. अदालतों की अपनी मजबूरियां/सीमाएं हैं. जब जांच एजेंसियां अपना काम ठीक से नहीं करेंगी, अभियोजन पक्ष ढिलाई से या पक्षपातपूर्ण ढंग से काम करेगा तो अदालतें भी क्या कर लेंगी?

जहां तक 2जी मामले में फैसले की बात है, अदालत ने जो सबसे महत्वपूर्ण बात कही है, वह यही है कि अभियोजन पक्ष साबित ही नहीं कर पाया कि कोई घोटाला हुआ था और वह सात साल तक पूरी तत्परता से इंतज़ार करती रही लेकिन सीबीआई ने पुख्ता सबूत पेश नहीं किए. सवाल यह भी उठता है कि क्या सीबीआई या प्रवर्तन निदेशालय जैसी एजेंसियां अक्षम हैं? सवाल एजेंसियों की 'नीयत' का भी है. ‘कैग’ के तत्कालीन मुखिया विनोद राय ने 2जी घोटाले के कई आकलन पेश किए थे. लेकिन विपक्ष सबसे बड़े वाले आंकड़े को ले उड़ा और यूपीए सरकार को उखाड़ कर फेंक दिया. इससे पहले साफ-सुथरी छवि वाले पीएम डॉ. मनमोहन सिंह पर आरोप लगाने की ताब न आरएसएस में थी न बीजेपी में. लेकिन कथित 2जी घोटाले की आड़ में उनकी छवि पर ऐसी कालिख पोती गई कि मनमोहन सिंह को खुद कहना पड़ा था- ‘इतिहास मेरे साथ नरमी बरतेगा.‘

बोफोर्स दलाली मामले में यही हुआ था. वीपी सिंह ने कथित दलाली को हथियार बना कर राजीव गांधी जैसे भविष्यदृष्टा पीएम को सड़क पर ला खड़ा किया था! अब न वीपी हैं, न राजीव गांधी हैं, न कथित दलाल क्वात्रोची है, न बोफोर्स घोटाला है. जिसे जो लाभ लेना था ले लिया. ‘नो वन किल्ड जेसिका’ वाला मामला होकर रह गया. हमारे देश में यह बात कोई रहस्य नहीं रह गई है कि केन्द्र से लेकर राज्यों तक की जांच एजेंसियों का राजनीतिकरण हो चुका है. 2जी घोटाले के संदर्भ में बात करें, खासकर सीबीआई की, तो उसकी भूमिका काफी उलझी हुई है. पिछले साढ़े तीन साल से ज्यादा समय से केंद्र में बीजेपी की सरकार है. बीजेपी ने 2जी घोटाले को भुनाकर 2014 में सत्ता हासिल की थी. बाद में कई राज्यों में सरकारें भी बनाईं. फिर क्या वजह है कि सीबीआई का उत्साह इस मामले में ठंडा पड़ गया?

Blog: क्या 2जी में 'वन टू का फोर' नहीं था जी?

इस फैसले से आम लोगों में एक धारणा यह भी बनी है कि बीजेपी और कांग्रेस इस मामले में एक हो गईं और 'घोटालेबाज राजनीतिज्ञों' को बचाया गया. यह कोई आश्चर्यजनक बात भी नहीं है क्योंकि राजनीति में सामने कुछ कहा जाता है और अंदरखाने समीकरण कुछ और ही होते हैं. 2जी घोटाले के मुख्य आरोपियों में तमिलनाडु के एक प्रमुख राजनीतिक दल डीएमके की कनिमोझी और पूर्व केंद्रीय दूर संचार मंत्री ए. राजा का शुमार था. कनिमोझी डीएमके प्रमुख करूणानिधि की सुपुत्री हैं. जयललिता के निधन के बाद तमिलनाडु में राजनीति काफी जटिल हो गई है. हालांकि बीजेपी की पहली पसंद एआईएडीएमके ही थी और उसने उसके दोनों धड़ों से दिल मिलाने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी. फिर भी बीजेपी को दक्षिण भारत में 2019 के आम चुनाव के लिए कोई मजबूत सहयोगी तो चाहिए ही चाहिए. क्या यह महज एक इत्तेफाक है कि नवंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी डीएमके प्रमुख करूणानिधि का हाल-चाल पूछने स्वयं गए थे!

यहां हम इस मुलाकात को अदालत के फैसले से कतई नहीं जोड़ रहे! लेकिन यह सर्वविदित तथ्य है कि तमिलनाडु की दोनों प्रमुख पार्टियां एआईएडीएमके और डीएमके प्रमुख केंद्रीय राजनीतिक दलों कांग्रेस और बीजेपी के पाले में आती-जाती रही हैं. यूपीए सरकार में शामिल रही डीएमके और कांग्रेस के सम्बन्ध 2जी घोटाले में डीएमके नेताओं के फंसने के बाद से ही तनावपूर्ण हैं. ऐसे में दक्षिण में पैर पसारने की राह ताक रही बीजेपी का डीएमके से नजदीकियां बढ़ाना स्वाभाविक है. भले ही उसकी गति सांप-छछूंदर वाली हो! क्योंकि कनीमोझी और राजा को लेकर नरम रुख अपनाना बीजेपी के लिए घातक सिद्ध हो सकता है और आक्रामक होने से डीएमके के साथ भी बात बिगड़ सकती है. लेकिन लगभग पूरे उत्तर भारत को फतह करने के बाद दक्षिण विजय पर निकली बीजेपी किसी भी हद तक जा सकती है. वह ‘कानून अपना काम करेगा’ वाला रुख भी अपना सकती है.

लेकिन 2जी घोटाले में आया फैसला बीजेपी के लिए 'दोनों हाथों में लड्डू' जैसा है. इस घोटाले को दुहकर पार्टी कांग्रेस को जितना बदनाम कर सकती थी, कर लिया और सत्ता भी हासिल कर ली. कांग्रेस के लिहाज़ से फैसले की 'टाइमिंग' (हिमाचल और गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले फैसला आ जाता तो क्या बात थी!) गलत थी और उसके लिए सांत्वना पुरस्कार यही है कि भविष्य में वह भ्रष्टाचार के आरोप लगने पर बोफोर्स की तरह इस फैसले का हवाला दे सकती है. कांग्रेस कह सकती है कि उसकी ‘जीरो लॉस’ वाली थ्योरी सही थी और 10 रुपए में बिकी चीज को 20 रुपए के हिसाब से आंकलन करके घोटाला करार नहीं दिया जा सकता.

अंत में एक राइडर- फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दी ही जाएगी. 2जी मामले में अंतिम फैसला क्या होगा, कोई नहीं जानता. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सामने खुद उसका वह फैसला मौजूद होगा जिसके चलते 122 लाइसेंस रद्द किए गए थे. फिलहाल यही कहा जा सकता है कि कभी बोफोर्स की तरह राजनीतिक भूचाल मचाने वाला एक और घोटाला टांय-टांय फिस्स होने जा रहा है और यह हमारे सिस्टम के लिए शुभ संकेत तो नहीं ही है!

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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