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BLOG: बिना टकराव मोले बहुत कुछ कर गए जस्टिस मिश्रा

उनके चीफ जस्टिस बनने के कुछ ही महीनों बाद, 12 जनवरी 2018 को एक और ऐसी घटना हुई जिसे न्यायिक इतिहास में हमेशा जगह मिलेगी. उनके बाद के 4 वरिष्ठतम जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की.

"क्या आप पिछली कुछ रातों में सो पाए?" कार्यकाल के आखिरी 5-6 दिनों में 10 से भी ज़्यादा बड़े फैसले देने वाले चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा से ये स्वाभाविक सवाल था. अपने कार्यकाल और भविष्य की योजना से जुड़े सवाल टाल रहे जस्टिस मिश्रा ने मुस्कुराते हुए कहा, "मेहनत से नींद नहीं उड़ती."

कुछ साथी पत्रकारों के साथ जस्टिस दीपक मिश्रा से मेरी ये मुलाकात पहले हुई 3-4 मुलाकातों जैसी ही थी. साथ चाय पीना, बिस्किट लेने को कहना, लेकिन सवालों को घुमा देना. सवाल कैसा भी हो, उसे अपने पसंदीदा विषय साहित्य की तरफ मोड़ देना. आप जब तक उनके साहित्यिक उदाहरण को समझें, चर्चा कहीं और जा चुकी होती है.

सौम्य लेकिन दृढ़ मृदुभाषी और नर्म स्वभाव के जस्टिस दीपक मिश्रा, अंदर से कितने दृढ़ हैं, ये उनसे मिल कर ही समझा जा सकता है. कार्यकाल के अखिरी दिनों में भी वो इस अलिखित नियम पर कायम रहे कि एक जज अपने फैसले के ज़रिए बोलता है. खुद मेहनती इतने कि साथी जजों, वकीलों, कोर्ट स्टाफ और पत्रकार उनके दौर में पहले से ज़्यादा मेहनत करते नज़र आए.

आधी रात के बाद बैठे 29-30 जुलाई 2015 को रात के 2 बजे के बाद उनका कोर्ट में बैठना और याकूब मेमन की फांसी पर मुहर लगाना ऐसी एक घटना है, जिसे न्यायपालिका के इतिहास में कभी भुलाया नहीं जा सकेगा. तब जस्टिस मिश्रा चौथे वरिष्ठतम जज थे. फैसले के बाद उनके घर धमकी भरी चिट्ठी आने की बात सामने आई. सुरक्षा बढ़ाई गई. हर कोई जानना चाहता था कि उनके मन में क्या है.

फैसले और धमकी पर रहे खामोश दिल्ली में उनसे मुलाकात की कोशिश विफल रही. संयोग ऐसा बना कि करीब एक हफ्ते बाद उनका भुवनेश्वर के एक कार्यक्रम में शिरकत करना तय हुआ. मैं खबर हासिल होने की उम्मीद लिए वहां जा पहुंचा. कार्यक्रम के एक सत्र के बाद चाय पर उनसे मुलाकात हो गई. वो अपनी जानी-पहचानी गर्मजोश मुस्कान के साथ मिले. मेरे हाथ मे चाय का कप न होने पर मुझसे सवाल किया. लेकिन खबर से जुड़े मेरे सवाल को मुस्कुरा कर टाल गए.

काम से दिया जवाब उनके चीफ जस्टिस बनने के कुछ ही महीनों बाद, 12 जनवरी 2018 को एक और ऐसी घटना हुई जिसे न्यायिक इतिहास में हमेशा जगह मिलेगी. उनके बाद के 4 वरिष्ठतम जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की. कोर्ट में कामकाज के बंटवारे पर अपनी नाराज़गी का इज़हार किया. हमला सीधे जस्टिस मिश्रा की कार्यशैली पर था. सबको लगा वो जवाब देंगे. लेकिन उन्होंने बोलकर कभी जवाब नहीं दिया. कुछ दिनों बाद जजों का रोस्टर तैयार किया और वेबसाइट पर सार्वजनिक कर दिया. ये सबको पता चल गया कि कौन से जज, किस तरह के मामलों को देखेंगे.

कभी तारीफ, कभी आलोचना समलैंगिकता और व्यभिचार जैसे मसलों पर फ़ैसला हो या सबरीमाला मंदिर के दरवाजे हर उम्र की महिला के लिए खोलना या फिर कथित केरल लव जिहाद मामले में हदिया को उसके पति शफीन जहां के पास भेजना, जस्टिस मिश्रा ने प्रगतिशील तबके की खूब वाहवाही पाई. लेकिन भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार सामाजिक कार्यकर्ताओं की रिहाई से मना करने और इस्लाम में मस्ज़िद की अनिवार्यता के सवाल को बड़ी बेंच के पास भेजने से मना करने के लिए उनकी आलोचना भी हुई.

पद से हटाने के प्रस्ताव पर भी शांत रहे सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले की सुनवाई कर रहे महाराष्ट्र के सीबीआई जज बी एच लोया की मौत की जांच की मांग खारिज करने के फैसले ने भी कई लोगों को नाराज़ किया. फैसले के कुछ दिनों बाद मेडिकल कॉलेज मान्यता मामले में एक आरोपी के फोन कॉल की रिकॉर्डिंग को आधार बना कर कांग्रेस और कुछ विपक्षी पार्टियों ने उन्हें पद से हटाने का प्रस्ताव राज्यसभा के सभापति को सौंप दिया.

किसी चीफ जस्टिस के खिलाफ इस तरह का प्रस्ताव आने की ये पहली घटना थी. लेकिन हर रोज़ कोर्ट में बैठ रहे जस्टिस मिश्रा पहले की तरह अपना काम करते रहे. जब राज्यसभा के सभापति ने प्रस्ताव खारिज कर दिया तो कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट पहुंची. चूंकि मामला खुद उनसे जुड़ा था और 4 वरिष्ठतम जज उनके खिलाफ मत रख चुके थे, ऐसे में जस्टिस मिश्रा ने मामला वरिष्ठता में छठे से दसवें जज की 5 सदस्यीय बेंच को सौंपा. बाद में कांग्रेस ने अपनी याचिका वापस ले ली.

बिना टकराव किये बड़े काम पिछले हफ्ते ही मेरी उनसे फोन पर बात हुई. उन्होंने मुलाकात के लिए बुलाने की बात कही. कहा- इस हफ्ते व्यस्त हूं. अगले हफ्ते चाय पियेंगे, बातें करेंगे. अलग से मुलाकात अभी बाकी है. आज बाकी पत्रकारों के साथ मुलाकात हो गई. जानता हूं, अलग से मुलाकात में भी वो अपने कार्यकाल और भविष्य की योजनाओं पर बात नहीं करेंगे. अब पहचानने लगा हूं उन्हें. सौम्य हैं, लेकिन दृढ़ हैं. मस्तिष्क पर, वाणी पर पूरा नियंत्रण रखते हैं.

खबर का तलबगार एक पत्रकार इससे निराश है. लेकिन उनकी अदालत में बिताए समय को एक नागरिक की तरह देखूं, उनसे हुई मुलाकातों को खबर का स्वार्थ किनारे रख कर देखूँ तो यही कहूंगा कि न्यायपालिका ने उनके दौर में अच्छा काम किया.

जस्टिस मिश्रा, आपने हमेशा अपने काम के ज़रिए बात की. बिना टकराव मोले बहुत कुछ कर गए. आप लंबे अरसे तक याद आएंगे.

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(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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