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भारत कैसे बचा पाएगा अफगानिस्तान में लगाए अपने 23 हज़ार करोड़ रुपये ?

पुरानी कहावत है कि अगर पड़ोसी के घर में आग लगी हो और आपको चैन की नींद आ जाती हो, तो समझ लीजिये कि अगला नंबर आपका है. कुछ वैसी ही हालत से फिलहाल हमारा देश भी गुजर रहा है. पड़ोसी मुल्क अफगानिस्तान में चरमपंथी संगठन तालिबान जिस तेजी से अपना कब्ज़ा करता जा रहा है, उसने भारत की चिंता और भी अधिक इसलिये बढ़ा दी है कि भौगोलिक व सामरिक लिहाज से महत्वपूर्ण होने के अलावा हमने वहां करीब तीन अरब डॉलर यानी 23 हज़ार करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश भी किया हुआ है. इसलिये ताजा हालात में यह बड़ा  सवाल है कि क्या भारत अपने इस निवेश को बचा पायेगा?

अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना तेजी से वापस जा रही है और तालिबान ने अफगानिस्तान के अधिकांश इलाकों मतलब लगभग एक तिहाई हिस्से पर अपना कब्जा कर लिया है. तालिबान को पाकिस्तान का समर्थन भी मिल रहा है, लिहाज़ा भारत के लिए ये हालात हर लिहाज़ से चुनौतीपूर्ण बनते जा रहे हैं. इन सबके बीच अफगानिस्तानी सेना के प्रमुख 27 जुलाई को भारत दौरे पर आ रहे हैं. समझा जा रहा है कि तालिबान से निपटने के लिए अफगानिस्तान अब भारत से सैन्य मदद की गुहार लगा सकता है, इसलिये भारत को हर पहलू ध्यान में रखते हुए अपनी रणनीति बनाने पर माथापच्ची करनी पड़ रही है.

एक अनुमान के मुताबिक, अफ़ग़ानिस्तान में इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं और संस्थानों के पुनर्निर्माण में भारत अब तक तीन अरब डॉलर से अधिक का निवेश कर चुका है. भारत ने अफ़ग़ानिस्तान के संसद भवन का निर्माण किया है और अफ़ग़ानिस्तान के साथ मिलकर एक बड़ा बांध भी बनाया है. हमने शिक्षा और तकनीकी सहायता भी दी है. साथ ही, भारत ने अफगानिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों में निवेश को भी प्रोत्साहित किया है.

ज़ाहिर है, इस तरह के गहरे जुड़ाव के कारण भारत, अफ़ग़ानिस्तान में किए अपने निवेशों के लिए चिंतित है. तालिबान जिस तरह की हिंसा अफ़ग़ानिस्तान में कर रहा है, उस स्थिति में उसके सत्ता हासिल कर लेने की वैधता पर हालांकि भारत सवाल उठा रहा है.

दरअसल, भारत की सबसे बड़ी चिंता पाकिस्तान के ख़िलाफ़ अपनी सामरिक बढ़त खोने को लेकर है. अफ़ग़ानिस्तान में भारत के मज़बूत होने का एक मनोवैज्ञानिक और सामरिक दबाव पाकिस्तान पर रहता है. वहां भारत की पकड़ कमज़ोर होने का मतलब है पाकिस्तान का दबदबा बढ़ना.

हजारों करोड़ रुपये के निवेश के अलावा भारत को एक और बड़ी आशंका यह भी सता रही है कि यदि अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का प्रभाव बढ़ता है तो कश्मीर में हालात प्रभावित हो सकते हैं. क्योंकि तालिबान के एक धड़े पर पाकिस्तान का भारी प्रभाव है. यदि अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की पकड़ मज़बूत होती है तो भारत के लिए स्थिति अच्छी नहीं होगी. तालिबान के एक प्रमुख समूह हक्क़ानी नेटवर्क ने अफ़ग़ानिस्तान में भारतीय निवेश को पहले भी कई बार निशाना बनाया है.

अमेरिका के नेतृत्व वाली नेटो सेना की वापसी के बाद अफ़ग़ानिस्तान में भारत को अपनी प्राथमिकताएं बदलनी पड़ सकती हैं और ऐसी चतुर कूटनीति अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है, जिससे निवेश पर भी कोई आंच न आ सके.

भारत में अफ़ग़ानिस्तान के राजदूत फ़रीद मामुन्दज़ई ने हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में इस बात को माना है कि ज़रूरत पड़ने पर हम भारत से सैन्य मदद मांग सकते हैं, लेकिन फ़िलहाल तालिबान पर शांति के लिए दबाव डालने में भारत की भूमिका को उन्होंने अहम बताया. अफ़ग़ानिस्तान में सुरक्षा स्थिति को लेकर फ़रीद ने कहा कि "हालात बहुत मुश्किल और डरवाने हैं. 150 ज़िलों में संघर्ष चल रहा है. कुछ ज़िले तालिबान के कब्ज़े में चले गए हैं. पिछले 11 हफ़्तों में 3,600 से भी लोगों की जान जा चुकी है. देश के अंदर ही दो लाख लोग विस्थापित हो चुके हैं."

भारत के निवेश पर होने वाले खतरे की आशंका से भी उन्होंने इनकार नहीं किया है. फ़रीद मामुन्दज़ई कहते हैं, ''भारत का निवेश दो क्षेत्रों में था -एक, हल्का बुनियादी ढांचा जैसे शिक्षा व तकनीक और दूसरा ठोस बुनियादी ढांचा जैसे सड़कें और इमारतें. अगर देश में सुरक्षा हालात ख़राब होते हैं तो दोनों तरह के बुनियादी ढांचे ख़तरे में पड़ सकते हैं.''

अंतराष्ट्रीय विश्लेषक मानते हैं कि तालिबान चीन की सीमा तक पहुंच गया है. वो भारतीय कश्मीर में ख़तरा पैदा कर सकते हैं, पाकिस्तान का तालिबानीकरण कर सकते हैं, ईरान भी इस ख़तरे से दूर नहीं. तालिबान के सत्ता में आने से पाकिस्तान, ईरान, चीन और भारत में चिंता बढ़ेगी. लिहाज़ा आने वाले कुछ महीनों में हम इन मुल्कों के रिश्तों को नई तरह से परिभाषित होते देख सकते हैं.

वैसे तालिबान ने तो यहां तक दावा किया है कि अगर वो चाहे तो दो हफ्तों में पूरे मुल्क पर कब्ज़ा कर सकता है. 

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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