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प्रशांत किशोर ने क्यों कहा कि वे वोट कटवा नहीं हैं, बिहार में नया विकल्प बनना आसान नहीं

राजनीतिक रणनीतिकार से राजनेता बनने की महत्वाकांक्षा पालने वाले प्रशांत किशोर इन दिनों सुर्खियों में हैं. बिहार विधान परिषद की 5 सीटों पर चुनाव होता है. उनमें से एक सारण शिक्षक निर्वाचन सीट है, जिस पर अफाक अहमद महागठबंधन समर्थित भाकपा के प्रत्याशी आनंद पुष्कर को हरा कर एमएलसी बन जाते हैं. अफाक अहमद प्रशांत किशोर के जन सुराज से जुड़े हैं.

छह महीने से बिहार में पद यात्रा कर रहे प्रशांत किशोर  इस जीत से काफी ज्यादा उत्साहित नज़र आ रहे हैं, ये इससे भी समझा जा सकता है कि नतीजों के बाद उनका बयान आता है कि जन सुराज बीजेपी या आरजेडी-जेडीयू का वोट काटेगा, बल्कि भविष्य में ऐसे हालात होने वाले हैं कि बिहार की जनता दो को काटकर अलग कर देगी.

जब से प्रशांत किशोर ने बिहार की राजनीति में उतरने की मंशा जाहिर की है, तब से उन पर वोट कटवा का आरोप लगते रहा है. लेकिन सारण में स्नातक कैटेगरी से आने वाले एमएलए सीट पर अपने समर्थक की जीत के बाद जिस तरह का बयान दे रहे हैं, उससे साफ है कि भविष्य में वे बिहार की राजनीति में जन सुराज के बैनर तले चुनाव लड़ेंगे.

पिछले कुछ महीनों से जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस यानी महागठबंधन के नेता बार-बार प्रशांत किशोर पर वोट कटवा और बीजेपी का एजेंट होने का आरोप लगा रहे हैं. वहीं प्रशांत किशोर बिहार की जनता को ये समझाने में जुटे हैं कि यहां सत्ता परिवर्तन के साथ व्यवस्था परिवर्तन की जरूरत है.

ऐसे तो प्रशांत किशोर आने वाले वक्त में क्या करेंगे, क्या जन सुराज एक राजनीतिक पार्टी बनेगी, क्या इसके तले 2024 में लोकसभा चुनाव और 2025 में विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर किस्मत आजमाएंगे..ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका स्पष्ट जवाब प्रशांत किशोर की ओर से नहीं आया है. लेकिन सारण जीत के बाद प्रशांत किशोर ने कहा है कि बिहार की जनता एक विकल्प की तलाश में है.

वोट कटवा नहीं होने का बयान देकर एक तरह से प्रशांत किशोर ऐलान करना चाह रहे हैं कि वे पूरी तरह से बिहार की राजनीति में उतरने को तैयार है. हालांकि प्रशांत किशोर का बिहार की राजनीति में क्या भविष्य होने वाला है, ये तो बाद में ही पता चलेगा. लेकिन फिलहाल बिहार के लोगों में उनकी जो छवि है वो एक नेता की नहीं बल्कि चुनावी कैंपेन मैनेजर की है. जन सुराज के बैनर तले पद यात्रा इस छवि को बदलने की ही कवायद है.

अभी के हिसाब से बिहार में न तो उनका कोई जनाधार है और न ही राजनीतिक अस्तित्व. ये बात सच है कि पद यात्रा के दौरान वो बिहार के लोगों को ये समझा रहे हैं कि अभी तक जितनी भी पार्टियों ने बिहार की सत्ता संभाली है, उनमें से किसी ने भी बिहार की हालत को सुधारने की कोशिश नहीं की है.

वे नीतीश पर सियासी निशाना साधते हैं, लालू-तेजस्वी यादव पर भी. इसके साथ ही बीजेपी पर भी. लेकिन जब आप पिछले 6 महीने के उनके बयानों या भाषणों पर गौर करेंगे, तो उनके निशाने पर नीतीश-लालू परिवार ज्यादा रहता है. बीजेपी की आलोचना करने में उस तरह की उग्रता नहीं दिखती है. वे कहते हैं कि पिछले 30-32 सालों में लालू और नीतीश ने बिहार को पूरी तरह से तबाही के कगार पर खड़ा कर दिया है. भले ही दबे जबान में वे बीजेपी को भी खरी-खोटी सुनाने से बाज नहीं आते हैं, लेकिन जो उग्रता और आक्रामक रवैया नीतीश और लालू परिवार के प्रति दिखाते हैं, वैसा बीजेपी या पीएम नरेंद्र मोदी को लेकर नहीं दिखता है. वे इस बात पर भी ज्यादा ज़ोर नहीं देते हैं कि 2005 से 2022 के 17 सालों में बिहार में ज्यादातर वक्त नीतीश के साथ बीजेपी भी सत्ता में शामिल रही थी.

शायद यही वजह है कि महागठबंधन से जुड़े लोग प्रशांत किशोर को बीजेपी के लिए काम करने वाला तक कह देते हैं. इसमें कितनी सच्चाई है ये तो भविष्य में प्रशांत किशोर के रुख से ही पता चलेगा.

हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को अगर किसी राज्य में सबसे ज्यादा डर सता रही है, तो वो बिहार ही है. इसका कारण ये हैं कि बिहार में जिस तरह का चुनावी समीकरण है, उसमें जेडीयू-आरजेडी और कांग्रेस के गठजोड़ का तोड़ फिलहाल बीजेपी के पास नहीं है. लोकसभा और विधानसभा को मिलाकर पिछले कई चुनाव में हमने देखा है कि बिहार में जब भी जेडीयू-बीजेपी का गठजोड़ हुआ है या फिर जेडीयू-आरजेडी का गठजोड़ हुआ है, दोनों ही तरह के गठबंधन को हराना मुश्किल रहा है. हालांकि बीजेपी, जेडीयू और आरजेडी ये सब अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं तो फिर उसमें बीजेपी का पलड़ा भारी रहेगा, इसमें कोई दो राय नहीं है. इसकी बानगी हम 2014 के लोकसभा चुनाव में देख चुके हैं. 

लेकिन अभी हालात वैसे नहीं हैं और फिलहाल जैसी स्थिति है, 2024 में जेडीयू और आरजेडी-कांग्रेस का गठबंधन कायम रहेगा, इसकी पूरी संभावना है. ऐसे में बीजेपी वो हर हथकंडा या उपाय अपनाना चाहेगी, जिससे आगामी लोकसभा चुनाव में वो बिहार के सियासी समीकरणों को अपने पक्ष में कर सके. यहीं वजह है कि जेडीयू-आरजेडी के साथ-साथ कुछ राजनीतिक विश्लेषक भी ये मानते हैं कि प्रशांत किशोर बीजेपी के लिए बिहार के लोगों का नब्ज टटोल रहे हैं और उसके हिसाब से ही 2024 में कोई फैसला करेंगे. अगर प्रशांत किशोर के पार्टी बनाकर चुनाव मैदान में उतरने से जेडीयू-आरजेडी को थोड़ा सा भी नुकसान होता है, तो उसका सीधा फायदा बीजेपी को मिलेगा, इसमें भी कोई दो राय नहीं है. इसके पीछे कारण ये है कि फिलहाल प्रशांत किशोर उस हैसियत में नहीं हैं कि 2024 या 2025 में बिहार के सामने विकल्प बनकर उभरे.

2020 में बिहार विधानसभा चुनाव से पहले भी हम लोगों ने देखा था कि पुष्पम प्रिया चौधरी नाम की एक महिला ने भी द प्लूरल्स पार्टी के जरिए कुछ इसी तरह के दावे और माहौल बनाने की कोशिश की थी. लंदन से पढ़ी-लिखी पुष्पम प्रिया ने खुद को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार तक बता डाला था. अलग-अलग मंचों पर बड़े-बड़े विज्ञापन के जरिए खुद को बिहार के लिए नया विकल्प बता रही थीं. तमाम अखबारों में पूरे पेज पर विज्ञापन देकर बिहार के चुनावी माहौल में सनसनी पैदा करने की कोशिश की थी. हालांकि उनके सभी दावे को हवा निकल गई. उन पर बीजेपी के फायदे के नजरिए से काम करने का उस वक्त आरोप लगा था. बिहार में आरजेडी, जेडीयू और बीजेपी से इतर नया विकल्प बनना फिलहाल किसी के लिए भी बहुत मुश्किल है और ये बात प्रशांत किशोर पर भी लागू होती है.

जहां तक बात रही सारण में स्नातक कैटेगरी में आने वाली एमएलसी सीट पर उनके समर्थक अफाक अहमद के जीतने की, तो ये जानना बेहद जरूरी है कि एमएलसी स्नातक सीट पर एक तो वोटर बहुत कम होते हैं. उसमें भी शिक्षकों के आपसी मुद्दे और पुराने वचर्स्व से इस कैटेगरी पर जीत-हार का फैसला होता है. इसे बिहार की राज्यव्यापी राजनीति से जोड़कर बड़ी घटना मानना सही नहीं है.

इतना कह सकते हैं कि प्रशांत किशोर को इसी बहाने ये संदेश देने का मौका मिल गया कि वे और उनका संगठन जन सुराज राजनीति में आने को तैयार है और बिहार की जनता ऐसा चाह रही है. ये प्रशांत किशोर के लिए एक तरह से भावनात्मक मौका है, इससे ज्यादा कुछ नहीं. इस नतीजे को राज्यव्यापी स्तर पर पकड़ या जनता के बीच पैठ बन जाने से जोड़ना फिलहाल जल्दबाजी होगी.

ये जरूर है कि प्रशांत किशोर जिस तरह से बिहार में पद यात्रा कर रहे हैं और वहां के लोगों से सीधा संवाद स्थापित कर उनसे जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं, इससे उनको बिहार की जमीनी हालात और बेहतर समझ में आ जाएगी.

(ये आर्टिकल निजी विचारों पर आधारित हैं)

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