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कनाडा हो या अमेरिका, भारतीय विदेशनीति में राष्ट्रहित सर्वोपरि, पन्नू विवाद बस रणनीतिक साझेदारी का मसला

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने वहां की संसद में बोलते हुए भारतीय खुफिया एजेंसियों को खालिस्तानी आतंकी  निज्झर की हत्या के पीछे बता दिया. भारत ने तीखी प्रतिक्रिया दी और डिप्लोमैटिकली बहुत कड़ा एक्शन लिया. अभी अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट ने कहा कि एक भारतीय अधिकारी ने खालिस्तानी आतंकी सतवंतसिंह पन्नू की हत्या की कोशिश की, जो एक अमेरिकी नागरिक है. पन्नू अक्सर ही न्यूयॉर्क में बैठकर भारत के खिलाफ जहर उगलता है. अमेरिका ने दावा किया कि भारत को कुछ सबूत भी दिए गए हैं. भारत ने अमेरिका के साथ जांच करने की बात कही है. एक ही तरह की घटना पर भारतीय विदेश मंत्रालय की दो तरह की प्रतिक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं कि कहीं भारत अमेरिका के दबाव में तो नहीं? कनाडा के खिलाफ कड़ी प्रतिक्रिया और अमेरिका के साथ सहयोगात्मक जांच पर सवाल उठ रहे हैं. 

भारत का रवैया बिल्कुल उचित

दोनों ही मामले खालिस्तान से जुड़े हैं. निज्झर और सतवंतसिंह पन्नू दोनों ही खालिस्तानी आतंकवाद को समर्थन देते रहे हैं और पन्नू तो न्यूयॉर्क में बैठकर भारत के खिलाफ जहर उगलता रहा है, प्लेन उड़ाने की धमकी देता रहा है और भारत ने उसके खिलाफ अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को आगाह भी किया है. भारत ने कहा है कि वह एक आतंकवादी है और वह आपके शहर में बैठकर भारत की संसद पर आक्रमण या एयर इंडिया का विमान उड़ाने की धमकी दे रहा है. यहां तक कि पन्नू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक की हत्या की धमकी दी है. अगर हम खालिस्तानी डायस्पोरा की बात करें तो वे अमेरिका में भी हैं और उससे अधिक कनाडा में हैं. कनाडा की धरती से भी कई बार उन्होंने भारत के खिलाफ बड़बोले बयान दिए हैं, हमने देखा ही कि उन्होंने भारत की पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या तक को महिमामंडित किया था, तब भी भारत ने कड़ा विरोध किया था.

इतना सब होने के बावजूद कनाडा और अमेरिका के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी, उन्होंने कुछ नहीं किया और अब भी कुछ नहीं कर रहे हैं. जब निज्झर की हत्या हो गयी तो भारत पर आरोप लगाए जा रहे हैं और भारत उनसे लगातार सबूत मांगता रहा, लेकिन सबूत देना तो दूर जस्टिन ट्रूडो ने संसद में भारत के राजदूत को वापस भेजने की बात की, तो भारत ने तीखी प्रतिक्रिया दी. भारत ने कहा कि खालिस्तानियों के तुष्टीकरण के लिए ट्रूडो केवल राजनीति कर रहे हैं और इसीलिए भारत ने उस पर उचित कार्रवाई की. 

भारत और अमेरिका रणनीतिक साझीदार

अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट ने जो भी कहा है, वह भारत के साथ साझा भी कर रहा है और वहां की सुरक्षा एजेंसियां भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के साथ मिलकर काम कर रही हैं और सारे विषयों पर गहन मनन और चिंतन हो रहा है. वहां के राजनीतिक लोग इस पर कोई गैर जिम्मेदाराना बयान नहीं दे रहे हैं, सुरक्षा एजेंसियां ही बोल और कर रही हैं. जिस तरह ट्रूडो ने किया था, यह उससे अलग है. इसीलिए, भारत अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों के साथ मिलकर काम कर रहा है. इसके साथ एक बात और है कि भारत और अमेरिकी एजेंसियां कई और विषयों जैसे, आतंकवाद, नारकोटिक्स और साइबर क्राइम इत्यादि पर भी काम कर रहा है. अभी भारत और अमेरिका रणनीतिक साझीदार हैं, इसलिए भारत की प्रतिक्रिया अमेरिकी हस्तक्षेप के मामले में अलग होना ही चाहिए और वैसा ही है. कनाडा के आरोप मुख्यतः राजनीतिक थे और इसीलिए वहां प्रतिक्रिया अलग थी. 

कनाडा ने भारत के अधिकारियों को वापस भेजा, डिप्लोमैटिकली मामले को खराब किया, इसलिए भारत ने भी जैसे को तैसा जवाब दिया. जहां तक एफबीआई के चीफ के भारत दौरे पर आने की बात है, तो ऐसा कुछ नहीं है कि भारत किसी तरह के दबाव में है. अमेरिका के डिप्टी एनएसए और वहां के इंटेलिजेंस ब्यूरो के चीफ भी आ रहे हैं, तो यह दौरा बहुत पहले से तय था और उसका एजेंडा भी विस्तृत है. अभी चूंकि यह विषय उठा हुआ है, तो लग रहा है कि वे इसी के लिए आ रहे हैं. चूंकि, भारत और अमेरिका के संबंध अच्छे हैं और स्ट्रेटेजिक अलायंस है, इसलिए भारत ने भी यह समझा है कि जो भी सबूत दिए गए हैं, उनकी गहन जांच की जाए. जब यह आरोप लगाए गए थे, तो हमारे विदेश मंत्रालय ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी. भारत ने बिना किसी दबाव के यह साफ-साफ बोला कि ऐसे किसी भी मामले से भारत का कोई लेनादेना नहीं है. अगर हमारे किसी मित्र ने कुछ बोला है, तो उस पर चिंतन चल रहा है, बस इतनी सी बात है. 

अमेरिका का मामला अलग

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई बार वर्चस्व की बात आती है. पिछले कई वर्षों तक अमेरिका की वैश्विक राजनीति में धाक रही है और जाहिर तौर पर वह चाहता है कि उसकी यही स्थिति बनी रहे. ऐसे मसले जब आते हैं, तो अमेरिका को लगता है कि कोई अन्य राष्ट्र उनको नीचा दिखाने की कोशिश कर रहा है. या फिर यह एक तरह का मनोवैज्ञानिक युद्ध है. अमेरिका को लगता है कि इस तरह के काम करने का एकाधिकार तो उसका है, ऐसी हत्याएं जो हुई हैं, उनमें तो सीआईए का नाम इन सब चीजों में ही आता रहा है. यहां याद करना होगा कि होमी जहांगीर भाभा की मौत के पीछे भी सीआइए का ही नाम उछला था. भाभा हमारे मुख्य परमाणु वैज्ञानिक थे जब 1960 और 70 के दशक में भारत परमाणु परीक्षण करना चाहता था.

ईरान के परमाणु वैज्ञानिकों का गायब हो जाना या मर जाना भी काफी विवादित रहा है. अमेरिका का इन सबके पीछे या ऐसे कई मसलों के पीछे नाम उछलता रहा है. अब अमेरिका को लगता है कि उसके वर्चस्व को चुनौती दी जा रही है और जो उसकी नजर में कभी छोटे, अविकसित राष्ट्र थे, वे भला ऐसा काम कैसे कर सकते हैं? भारत एक सभ्य राष्ट्र है और प्रजातंत्र की शुरुआत हमारे यहां से ही हुई है, अमेरिका से नहीं. भारत ऐसे काम में संलिप्त नहीं होता. अमेरिका ने कोई बात कही है, तो बस उसकी जांच की जा रही है. इतनी सी बात है. अगर जांच में भारत ने कुछ गलत पाया, तो वह वैसी ही प्रतिक्रिया भी देगा. वर्तमान सरकार की विदेशनीति तो यही कहती है. 

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ़ लेखक ही ज़िम्मेदार हैं.]

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