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शिशु को इत्र नहीं लगाते, गोमाता का दुग्धपान कराते हैं अखिलेश यादव जी!

सुगंध और दुर्गंध से भरा अखिलेश यादव का बयान नया क्लेश छेड़ चुका है. बयान से लगता है कि वे यूपी के कन्नौज प्रेम से ज्यादा मुगल विरासत और मल्लिका ए हुस्न नूरजहां के इत्र ईजाद की महक में जकड़े हुए हैं. सपा सुप्रीमो टीपू का ताना महज एक बहाना है,नैरेटिव तो मुगल विरासत और विकास को सामने लाना है,मगर अधूरा. खैर,इस दौर में वो संभव नहीं. समाजवादी पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव यानी टीपू भैया को अचानक गो शालाओं में से दुर्गंध क्यों आने लगी ? टीपू ने कन्‍नौज में कहा है कि भाजपा को दुर्गंध पसंद है, इसलिए वो गोशालाएं बनवा रही है,जबकि समाजवादी पार्टी को सुगंध पसंद है इसीलिए उसने इत्र पार्क बनाए…

अखिलेश की बेतुकी बयानबाजी

अखिलेश की यह बयानबाजी इन दिनों मौसम में बढ़ रहे तापमान के साथ सियासी और समाजिक तौर पर घमासान मचाने को आतुर लगती है. इस बयान पर सवाल उठ रहे हैं. यह ताना सिर्फ भाजपा सरकार पर है या सनातन परंपरा और गो भक्तों पर निशाना ? देश में कुछ समय से बाबर, औरंगजेब और मुगल प्रेमियों की जमात मुखर हुई है. यह मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से मुगलकाल की विशेषताओं का खाका प्रस्तुत करते हैं.संभवतः उत्तर प्रदेश के कन्नौज और इत्र के माध्यम से अखिलेश यादव ने एक नैरेटिव सैट करने का अधूरा प्रयास किया,जिसकी कड़ी मुगल बादशाह जहांगीर और उसकी मल्लिका नूरजहां से जोड़ी जा रही है,मगर यादव जी द्वारा उत्तर प्रदेश में ही कहे जाने वाले गो लोक वृंदावन और सनातन परंपरा को भुला कर यह काम हो रहा है.

महाभारत की भूमि कुरुक्षेत्र के 48 कोस में एक अति प्राचीन शहर है स्थाणेश्वर,जो वर्तमान में हरियाणा के थानेसर विधानसभा क्षेत्र के नाम से प्रख्यात है. महाभारत और गीता के अलावा भी थानेसर भूमि का अपना वैभवशाली अतीत है. वर्धन वंश के शासनकाल में यह राजधानी रहा और राजा हर्षवर्धन के समय भी काफी संपन्न राजधानी रही. सातवीं शताब्दी में राजनीतिक कारणों से हर्षवर्धन ने इसे उत्तर प्रदेश के कन्नौज में शिफ्ट किया था. उनसे पहले चौथी से छठी शताब्दी में गुप्त काल के दौरान भी कन्नौज इत्र के लिए विख्यात रहा और इनके बाद हर्षवर्धन के शासनकाल में भी.अब समाजवादी पार्टी कहां से इत्र नगरी की झंडाबरदार हुई,यह समझ से बाहर है.क्योंकि अखिलेश यादव की सपा सरकार के दौरान विवादित सुर्खियां तो  याद होंगी कि कन्‍नौज में खो रही इत्र की खुशबू, इत्र उत्पादक यादव वंश से नाखुश…

समाजवादी पार्टी और मुस्लिम तुष्टीकरण

समाजवादी पार्टी को सुगंध पसंद है, इसीलिए उसने इत्र पार्क बनाए. और मुगल इतिहास कहता है कि सम्राट जहांगीर ने फूलों से इत्र निकालने के लिए शोध को बढ़ावा दिया था,जबकि मल्लिका-ए-हुस्न नूरजहां ने गुलाब के फूल से बनाये जाने वाले विशेष प्रकार के कोलोन उत्पाद तैयार करने के लिए कारीगर बुलाए थे और शोध को बढ़ावा दिया.एक किस्सा नूरजहां की मां अस्मत बेगम का मिलता है.जो मल्लिका के हमाम  से जुड़ा है. अस्मत बेगम ने देखा था कि हमाम में रखे बर्तन में गर्म पानी में गुलाब पंखुड़ियों को डालने से हलका सा तेल जमा होता है,इसकी सुगंध अनगिनत गुलाब के फूलों से भी अधिक है.मुगल इतिहास बताता है कि इस तरह नूरजहां ने गुलाब इत्र की खोज की थी.

हमारे यहां शिशु के पैदा होने पर मां के साथ उसे गाय का दुग्धपान कराया जाता है,टीपू भूल गए सुगंधित इत्र नहीं. इत्र से किसी को वैर क्यों होगा ? मगर गो माता के आश्रय स्थलों को दुर्गंध का केंद्र बताने वालों के प्रति यह भाव पैदा करने की नौबत आन बनती है. बेशक कुछेक की यह धारणा हो कि कन्नौज में मुगलों ने इत्र की खुशबू को बिखेरने की पहल की और इसे बढ़ावा दिया. 1975 में पुरातत्त्ववेत्ता डा. पाइलो रोवेस्टी की रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि एक टेराकोटा डिस्टिलेशन प्लांट मिला था, जिसकी कार्बन डेट 3000 ईसा पूर्व थी,जो बताती है सिंधु घाटी सभ्यता से भारत इत्र से महका. वैसे आयुर्वेद में भी इत्र का उल्लेख सुश्रुत संहिता और चरक संहिता में उपलब्ध है.

खुद को यदुवंशी और भगवान श्रीकृष्ण का वंशज बताने वाले अखिलेश यादव को गो शालाओं में से दुर्गंध क्यों आ रही है,इस पर देश के साथ सवाल विशेष रुप से यादव समाज का भी बनता है. पुराणों में यदु का वर्णन राजा ययाति और उनकी रानी देवयानी के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में मिलता है. महाभारत में अहीर, गोप, गोपाल (गो पालक)और यादव सभी पर्यायवाची हैं.महाभारत काल के यादवों को वैष्णव सम्प्रदाय के अनुयायी के रूप में जाना जाता था. 

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.

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