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वक्फ बोर्ड में संशोधन जरूरी..लेकिन, सरकार इस कार्य में क्यों दिखा रही जल्दबाजी

लोकसभा में एनडीए की सरकार वक्फ बोर्ड संशोधन बिल लेकर आई हैं. बिल के आने के बाद विपक्ष की ओर सपा, टीएमसी और ओवैसी ने हंगामा किया गया, उसके बाद अब इस बिल को जेपीसी कमेटी में भेज दिया गया है. सरकार जो बिल लेकर आई है इससे कोई खास परिवर्तन नहीं होगा. पिछले 100 सालों में कई बार संशोधन किया गया है.

1997 और 2010 में भी संशोधन किया गया था. उसके बाद 2013 में भी यूपीए सरकार की ओर से कई बदलाव किए गए थे. ये बात सच है कि डिफेंस और रेलवे के बाद वक्फ बोर्ड के पास सबसे अधिक जमीन और संपत्ति है. मुस्लिम समुदाय के लोगों का कहना है कि ये कोई चैरिटेबल ट्रस्ट नहीं है.

नए लाॅ में कई चीजों पर बदलाव 

सरकार की ओर से जो बिल लाया गया है उसमें कई बदलाव के साथ इसको लोकसभा में लाया गया है. इससे पहले वक्फ बोर्ड का कानून भी है. इससे पहले जो लॉ था और उसकी परिभाषा तय की गई थी, नये बिल में उसको हटा दिया गया है. वक्फ बोर्ड के मामले सुप्रीम कोर्ट और बंबई हाईकोर्ट चल रहे हैं. वक्फ बोर्ड में सरकार की ओर से कई सुधार के साथ उसको लाने का प्रयास किया जा रहा है.

वक्फ में गैर मजहब के लोगों को भी लाने की बात चल रही है. मुस्लिम की ओर से इसका विरोध किया जा रहा है. कुछ मुसलमान और हिंदू से जुड़े लोग भी ये कह रहे हैं कि वक्फ बोर्ड में सुधार जरूरी है और ये सुधार होना चाहिए, लेकिन सरकार इसमें इतना जल्दबाजी क्यों दिखा रही है? पार्लियामेंट में इस बिल के आने के बाद हंगामा हुआ. इससे पूरे हिंदुस्तान पर भी इसका प्रभाव देखने को मिलेगा.

वक्फ के नाम पर राजनीति शुरु

किसी मजहब से जुड़ी हुई चीजें होंगी तो उसका फायदा उठाने की कोशिश उस मजहब के पॉलिटिक्स वाले लोग करते हैं. इसी का फायदा उठाने की कोशिश ओवैसी कर रहे हैं. अगर रेलवे और डिफेंस के बाद वक्फ बोर्ड के पास सबसे अधिक संपत्ति है तो ऐसे में बदलाव किए जा रहे हैं तो उसके लाभान्वित लोगों से बातें करनी चाहिए.

जो कानून लाया जा रहा है उसमें बातचीत पहले होनी चाहिए, बातचीत होने के बाद जो निष्कर्ष निकले फिर आगे की ओर सरकार को बढ़ना चाहिए. किसी मजहब को नुकसान पहुंचाने और बड़ी कंपनियों को फायदा पहुंचाने की कोशिश एक षड्यंत्र के अंतर्गत की जा रही है इस तरह का मैसेज समाज में नहीं जाना चाहिए. पहले सभी बातों को ध्यान में रखकर उसके पहलुओं पर बात कर के फिर कानून बनाने की राह पर सरकार को आगे बढ़ना चाहिए. अगर हड़बड़ी में कोई कानून बनता है तो ऐसे में गड़बड़ियां हो सकती है. ऐसा पहले भी कई बार देखा गया है.

वक्फ कई चीजों पर कर चुका है क्लेम 

90 के दशक से लेकर अब तक में कई बार ऐसा देखा जा चुका है. अलग अलग राज्यों में अलग कानून का प्रावधान है. सरकार को ये भी देखना चाहिए कि मुस्लिम के वेलफेयर के लिए ये है या नहीं है इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है. वक्फ तो ताजमहल और अन्य कई चीजों पर क्लेम कर चुका है तो ऐसे में सरकार को सोच समझ कर और सभी पहलुओं पर ध्यान रखकर आगे का कदम उठाना चाहिए.

ये बात कहीं से नहीं लगनी  चाहिए कि सरकार इसको जोर जबरदस्ती से लागू करने का प्रयास कर रही है. सबसे बातचीत कर के आपसी सहमति से इसमें संशोधन की ओर आगे बढ़ना चाहिए. लॉ में जो सुधार की बात हो रही है उसके लिहाज से ऐसे ही कदम उठाए जाने चाहिए ताकि इस कदम का विरोध ना हो.

आम सहमति से होना चाहिए बदलाव 

वक्फ कोई आज नया नहीं बना है बल्कि कड़ों सालों से चलता आ रहा है. उसके काफी पहले से ऐसी चीजें होती आई है. अलग-अलग प्रॉपर्टी की देखरेख के लिए कमेटी बनाई गई है. अगर हम 500 सालों का ही दायरा लेते हैं तो काफी चीजें उसमें कॉम्प्लिकेटेड है. अगर उसमें सुधार की जरूरत है तो इसमें किसी को कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन वो ऐसा हो जिसमें सभी की सहमति हो. कहीं से कोई दिक्कत सामने ना आए. ऐसे में रातोंरात इसको बदलने का काम नहीं किया जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट में एक ही प्रकार के कई मामले इससे जुड़े हुए चल रहे हैं लेकिन उसके समाधान आज तक नहीं हो पाए. वक्फ बोर्ड और उससे जुड़े लोग तथा सभी को सरकार को अपना पक्ष रखना होगा, जिससे कि सभी में आपसी सहमति हो पाए तभी जाकर इसमें सुधार और संशोधन संभव है. जो कुछ भ्रम उत्पन्न हो रहा है सरकार को उसको क्लीयर करना चाहिए.

मुस्लिम समाज में भी लोग संशोधन चाहते हैं, लेकिन सरकार को सोच समझ कर ही कदम उठाना चाहिए ताकि किसी को कभी कुछ कहने का मौका ना मिल पाए और ये कोई मजहबी मुद्दा ना बन पाए. इन बिंदुओं को ध्यान में रखकर ही सरकार को संशोधन की ओर जाना चाहिए.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं.यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]

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