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"बुलडोज़र" चलाने से बुझ जाएगी क्या मज़हबी नफ़रत की आग?

देश में इस वक़्त जो माहौल बन रहा है या बनाया जा रहा है, उसे लेकर ओशों ने बरसों पहले कहा था- "तुमने अपने नाम को समझ लिया कि यह मैं हूं. नाम लेकर आये थे? कोई तो नाम लेकर आता नहीं है. तुमने अपनी भाषा को समझ लिया कि यह मैं हूं. भाषा लेकर आये थे? कोई भाषा तो लेकर आता नहीं, न कोई धर्म लेकर आता है, और न ही कोई देश लेकर आता है. ये सब बातें सीखा दी गई हैं. ये तुम्हें तोतों की तरह रटा दी गई हैं. तुम तोते बन गये हो और बड़े अकड़ रहे हो, क्योंकि तुम्हें वेद याद हैं, क्योंकि तुम्हें कुरान कंठस्थ है.तुम्हारी अकड़ तो देखो! और तुम्हें जरा भी होश नहीं है कि तुम जब आए थे, न कुरान थी तुम्हारे पास न वेद थे तुम्हारे पास. केवल एक कोरे कागज थे तुम! और जब तुम कोरे कागज थे,तब तुम परमात्मा से जुड़े थे.जब से तुम्हारा कागज गूद दिया गया है ,तब से तुम समाज से जुड़ गये हो. तब से तुम अपने से टूट गये हो और भीड़ से जुड़ गये हो.तब से तुम भीड़ के हिस्से हो गये हो, तुम्हारी आत्मा खो गई है."

कहते हैं कि भीड़, भेद में बदल जाती है और पिछले तकरीबन 10 दिनों से यही नज़ारा हमें देश के अलग-अलग हिस्सों में देखने को मिल रहा है. ये सिर्फ लोकतंत्र के लिए ही खतरनाक नहीं है,बल्कि इस राष्ट्र की "सर्वधर्म समभाव" वाली सदियों पुरानी परंपरा के लिए भी कोई शुभ संदेश नहीं है. हर मज़हब व हर समुदाय की कट्टरपंथी ताकतों को दरकिनार करते हुए समाज के सभी वर्गों के समझदार लोगों को ये गंभीरता से सोचने की जरुरत है कि आखिर हम अपने देश को किस तरफ ले जा रहे हैं? ईमानदारी से सोचना ये भी होगा कि ऐसी हिंसा भड़काने के लिए अल्पसंख्यक समुदाय ही क्या अकेले कसूरवार है या फिर बहुसंख्यक समुदाय के शरारती तत्वों की भी कोई भूमिका है,जो अक्सर पर्दे के पीछे ढक जाया करती है?

ऐसे आफत वाले वक़्त पर ही किसी भी देश के प्रबुद्ध वर्ग का ये पहला फ़र्ज़ बनता है कि वो कानून का साथ देते हुए और बगैर किसी खास मज़हब का पक्ष लेते हुए किसी भी तरह की नाइंसाफी के खिलाफ अपनी आवाज़ को बुलंद करने से डरे नहीं.

किसी भी देश के लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी ये होती है कि आप चाहे जिस किसी भी राजनीतिक पार्टी के समर्थक हों,लेकिन देश या किसी भी राज्य की सत्ता में बैठी सरकार के ख़िलाफ़ अगर आपने आवाज उठाई है,तो उसे लोकतंत्र में मिले अधिकार को सम्मान देते हुए उस सरकार ने कभीआपको अपना'दुश्मन'नहीं समझा होगा.लेकिन कहते हैं कि वक़्त बदलने के साथ सियासत का मूड भी बदल जाता है,जो कब,कहां, किसे अपना दुश्मन समझ ले,इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते.

पिछले तकरीबन दो साल से इस देश के सबसे बड़े सूबे उत्तरप्रदेश से कानून-व्यवस्था को संभालने के लिए एक अजूबी शुरुआत हुई है,जिसे लोग "बुलडोज़र राजनीति" का नाम देते हैं.लेकिन सोचने वाली बात ये है कि इस देश को या किसी प्रदेश की कानून-व्यवस्था को संभालने के लिए पिछले 75 बरस में जब किसी भी सरकार ने किसी दंगाई के घर को बुलडोज़ करने के बारे में सोचा तक नहीं था,तब योगी आदित्यनाथ की इस बहादुरी के देश-दुनिया में चर्चे हो रहे हैं. होने भी चाहिए लेकिन बुलडोज़र तो एक मशीन है.सो,उसे कौन ये समझायेगा कि तेरे शिकंजे में किसी ख़ास जाति या धर्म के लोग ही नहीं आने चाहिये? उस मशीन को भला इंसाफ करने से क्या वास्ता,जिसका काम ही जमींदोज करना है?

हालांकि दिल्ली हाइकोर्ट के वकील और सामाजिक कार्यकर्ता रवींद्र कुमार कहते हैं कि "दुनिया के इतिहास पर गौर करेंगे,तो आप पाएंगे कि किसी भी लोकतंत्र में मज़हबी नफरत का नंगा नाच बहुत दिन तक नहीं चला है और न ही चल सकता है. ये अल्पसंख्यकों को डराने-धमकाने और उन्हें सत्ता की नीतियों के मुताबिक चलने पर मजबूर करने का एक सियासी औजार है. लेकिन इसकी आड़ में जिस  दिन भी किसी बेकसूर का घर इस राजनीतिक बुलडोज़र ने ध्वस्त कर दिया और वो अपनी फरियाद लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया,तो आप मान लीजिये की उसी दिन से इस बुलडोज़र पर ऐसा ब्रेक लग जायेगा कि वो जंग खाने लगेगा."

वैसे इतिहास के पन्ने बताते हैं कि "बुलडोजर" शब्द का जन्म 19वीं शताब्दी में हुआ,जब इसका मतलब किसी धातु को आकार देने और उसे मोड़ने के लिए उपयोग किए जाने वाले फोर्जिंग प्रेस से होता था. इसका संबंध एक और शब्द  “बुल डोज”, यानी एक बड़ी डोज से भी जोड़ा जाता है जो किसी भी प्रकार की दवा या सजा के लिए उपयोग में लाया जाता था. हालांकि

बुल-डोजिंग का शाब्दिक अर्थ जबरदस्ती करना या डराना भी होता है. 19वीं सदी के अंत में, बुलडोजिंग का मतलब था कि किसी भी बाधा को पार करने के लिए पूरी ताकत का उपयोग करना. जिन ताकतों को ये गलतफहमी है कि ये देश सिर्फ उन्हीं का है और यहां अल्पसंख्यकों की कोई बिसात नहीं है,तो उन्हें हिंदी के मशहूर कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की इस कविता को एक बार नहीं बार-बार पढ़ना चाहिये और फिर सोचना चाहिये कि आखिर हम जा किधर रहे हैं.

"यदि तुम्हारे घर के
एक कमरे में आग लगी हो
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में सो सकते हो?
यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में
लाशें सड़ रहीं हों
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो?
यदि हाँ
तो मुझे तुम से
कुछ नहीं कहना है.

देश कागज पर बना
नक्शा नहीं होता
कि एक हिस्से के फट जाने पर
बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें
और नदियां, पर्वत, शहर, गांव
वैसे ही अपनी-अपनी जगह दिखें
अनमने रहें.

यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे तुम्हारे साथ
नहीं रहना है.

इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा
कुछ भी नहीं है
न ईश्वर
न ज्ञान
न चुनाव
कागज पर लिखी कोई भी इबारत
फाड़ी जा सकती है
और जमीन की सात परतों के भीतर
गाड़ी जा सकती है.

जो विवेक
खड़ा हो लाशों को टेक
वह अंधा है
जो शासन
चल रहा हो बंदूक की नली से
हत्यारों का धंधा है
यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे
अब एक क्षण भी
तुम्हें नहीं सहना है.

याद रखो
एक बच्चे की हत्या
एक औरत की मौत
एक आदमी का
गोलियों से चिथड़ा तन
किसी शासन का ही नहीं
सम्पूर्ण राष्ट्र का है पतन.

ऐसा खून बहकर
धरती में जज्ब नहीं होता
आकाश में फहराते झंडों को
काला करता है.

जिस धरती पर
फौजी बूटों के निशान हों
और उन पर
लाशें गिर रही हों
वह धरती
यदि तुम्हारे खून में
आग बन कर नहीं दौड़ती
तो समझ लो
तुम बंजर हो गये हो-
तुम्हें यहां सांस लेने तक का नहीं है अधिकार
तुम्हारे लिए नहीं रहा अब यह संसार.

आखिरी बात
बिल्कुल साफ
किसी हत्यारे को
कभी मत करो माफ
चाहे हो वह तुम्हारा यार

धर्म का ठेकेदार,
चाहे लोकतंत्र का
स्वनामधन्य पहरेदार."

-सर्वेश्वर दयाल सक्सेना  

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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