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जिस पिता से जिंदगी भर नहीं बनी, क्या उनका श्राद्ध करना जरूरी है?

Pitru Paksha: जिस पिता से ताउम्र रिश्ते तल्ख रहे, क्या उनका श्राद्ध करना जरूरी है? जानिए धर्मशास्त्रों के नियम, रामायण का प्रसंग और इस भावनात्मक असमंजस का सही समाधान.

Pitru Paksha: पिता के जाने के बाद घर में मातम तो होता है, लेकिन कई बार दुख से ज्यादा पुरानी कड़वाहट हावी हो जाती है. किसी को पिता के ताने याद आते हैं. किसी को अपने सपनों पर लगी रोक सालती है. कई लोगों को वह वक्त याद आता है, जब सबसे ज्यादा सहारे की जरूरत थी और पिता ने मुंह मोड़ लिया था.

अब परिवार श्राद्ध करने का दबाव बना रहा है. रिश्तेदार कहते हैं कि बेटा होने के नाते यह करना ही पड़ेगा. ऐसे में मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जिस इंसान ने जीते जी कभी साथ नहीं दिया, उसके जाने के बाद यह सब क्यों करें?

क्या श्राद्ध का मतलब पिता की गलतियों को सही मानना है

यह सवाल सिर्फ पूजा-पाठ का नहीं है. इसका सीधा ताल्लुक आपके आत्मसम्मान से है. बहुत से लोगों को लगता है कि श्राद्ध करने का मतलब पिता को माफ कर देना है. हिंदू परंपरा में पितृकर्म को बेटे का दायित्व माना गया है. लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि पिता का हर बर्ताव सही था.

धार्मिक रस्म और आपका निजी दर्द, दोनों अलग बातें हैं. किसी की आत्मा की शांति के लिए हाथ जोड़ना और उसके गलत व्यवहार को सही ठहराना एक बात नहीं हो सकती. आप अपने जख्मों को भुलाए बिना भी यह कर्म कर सकते हैं.

धर्मग्रंथ क्या कहते हैं और परिवार के दबाव की सीमा क्या है

शास्त्रों में पितृकर्म को परिवार चलाने वाले का कर्तव्य बताया गया है. मनुस्मृति में अन्न, जल और फल से तर्पण की बात कही गई है. यह नियम व्यवस्था बनाए रखने के लिए था. 

इसलिए यह कहना गलत है कि पहले मन का सारा गुस्सा खत्म करो, तभी पूजा में बैठो. यह बात परिवार की अपनी हो सकती है, लेकिन इसे धर्म का आखिरी फैसला नहीं माना जा सकता.

रामायण की वो कहानी, जो लोग अक्सर गलत सुनाते हैं

इस मामले में अक्सर रामायण का उदाहरण दिया जाता है. भरत जब वन जाकर श्रीराम को राजा दशरथ के निधन की खबर देते हैं, तो राम गहरे सदमे में आ जाते हैं. वे नदी किनारे खड़े होकर पिता को जल देते हैं. राजमहल से दूर, वे जंगल के बेर और कंदमूल से ही पिंडदान करते हैं.

इस प्रसंग से यह तो साफ है कि श्राद्ध के लिए भारी-भरकम खर्च या आडंबर की जरूरत नहीं होती. जो पास है, उसी से काम चल जाता है. लेकिन इस कहानी की एक सीमा है. भगवान राम और दशरथ के बीच गहरा लगाव था. इसे उन रिश्तों की मिसाल नहीं बनाया जा सकता, जहां पूरी जिंदगी सिर्फ नफरत और तकरार रही हो.

आत्मा की शांति अलग बात है और माफी बिल्कुल अलग

अगर आप श्राद्ध करने का मन बना भी लें, तो इसका मतलब यह नहीं कि पिता सही हो गए. रोज-रोज के झगड़े और मानसिक प्रताड़ना में जमीन-आसमान का फर्क होता है. कड़वे अनुभवों के बाद सब कुछ भूल जाना किसी के बस में नहीं होता. श्राद्ध का लोटा उठाने से पुराने घाव नहीं भरते.

यह बात अपने जेहन में साफ रखिए. यह पूजा पिता के गलत फैसलों पर कोई मुहर नहीं है. यह सिर्फ एक गुजरे हुए इंसान के प्रति औपचारिकता भर है.

जब मन गवाही न दे और पैसे की तंगी हो, तब क्या करें

अगर पिता की याद से सिर्फ तकलीफ होती है, तो खुद पर जबरदस्ती मत कीजिए. पहले यह समझिए कि असल दिक्कत क्या है. क्या पैसों की तंगी है? पूजा की रस्में समझ नहीं आ रहीं? या फिर उनका चेहरा याद आते ही दम घुटने लगता है?

अगर भारी-भरकम कर्मकांड नहीं झेल पा रहे, तो किसी सीधे-सादे पंडित से बात करें. उनसे कहें कि बिना तामझाम के सबसे आसान तरीका बताएं. अगर मन बिल्कुल ही राजी न हो, तो उनके नाम पर किसी भूखे को खाना खिला दें. यह भी एक तरीका है.

क्या श्राद्ध न करने से घर बर्बाद हो जाएगा

हमारे समाज में डर बहुत जल्दी बेचा जाता है. लोग डराते हैं कि श्राद्ध नहीं किया तो नौकरी चली जाएगी, बीमारियां घेर लेंगी या खानदान पर विपत्ति आ जाएगी. धर्म को इस तरह खौफ का जरिया बनाना पूरी तरह गलत है. ऐसी बातों का कोई सिर-पैर नहीं होता.

परंपरा अपनी जगह है और आपका सच अपनी जगह. अगर आप यह रस्म निभाना चाहते हैं, तो एक औपचारिकता समझकर निभा लीजिए. लेकिन इसके लिए अपने अतीत से झूठ बोलने या खुद को अपराधी मानने की रत्ती भर जरूरत नहीं है.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

हृदेश कुमार सिंह । Hirdesh Kumar Singh 

Senior Vedic Astrologer । Head – Religion & Astrology, ABP Live । Lead – ABP Dharma LIVE

हृदेश कुमार सिंह वरिष्ठ वैदिक ज्योतिषाचार्य और मीडिया पेशेवर हैं. उन्हें ज्योतिष, धर्म और मीडिया के क्षेत्र में 17 साल से अधिक का अनुभव है. वर्तमान में वे ABP Live में Religion & Astrology वर्टिकल का नेतृत्व करते हैं. साथ ही ABP Dharma LIVE की कंटेंट और डिजिटल रणनीति की जिम्मेदारी संभालते हैं.

उनके काम में ज्योतिषीय लेखन, संपादन, वेबसाइट और वीडियो के लिए विषय चयन तथा संपादकीय योजना शामिल है. वे Search, Google Discover और सोशल मीडिया पर पाठकों की रुचि को ध्यान में रखकर धर्म और ज्योतिष की कवरेज तय करते हैं.

पंचांग, राशिफल, ग्रह गोचर, व्रत-त्योहार और धार्मिक परंपराएं उनके लेखन के प्रमुख विषय हैं. वे करियर, विवाह, शिक्षा और व्यापार से जुड़े सवालों पर भी लिखते हैं. राजनीति और सामाजिक घटनाओं पर उनके ज्योतिषीय विश्लेषण वैदिक गणना, गोचर और मेदिनी ज्योतिष पर आधारित होते हैं. इनमें ग्रह स्थितियों को संभावित संकेतों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है.

उन्होंने Indian Institute of Mass Communication (IIMC), नई दिल्ली से पत्रकारिता और IIMT University, मेरठ से ज्योतिष शास्त्र एवं वास्तु शास्त्र की शिक्षा ग्रहण की है. वे AstroSage और Astrotalk जैसे प्लेटफॉर्म के साथ भी काम कर चुके हैं. उन्होंने Semrush Academy से 'Content Marketing Essentials for SEO and AI Search with Semrush' सर्टिफिकेशन प्राप्त किया है.

नई पीढ़ी के पाठकों के लिए उन्होंने 'Gen-Z Horoscope' जैसे प्रारूप पर काम किया है. इसमें पढ़ाई, नौकरी, रिश्तों और रोजमर्रा के फैसलों से जुड़े सवालों को राशिफल में जगह दी गई है. उनके लेख धार्मिक परंपराओं से जुड़े उन प्रश्नों पर भी केंद्रित होते हैं, जो बदलती जीवनशैली में सामने आते हैं.

वैदिक ज्योतिष, होरा शास्त्र, संहिता, मेदिनी ज्योतिष, अंक ज्योतिष, शकुन शास्त्र और वास्तु उनके अध्ययन एवं लेखन के विषय हैं. उनका मानना है, 'ज्योतिष केवल भविष्य बताने की विद्या नहीं, बल्कि समय को समझने की कला है.'

ज्योतिष और मीडिया के अलावा उन्हें सिनेमा, संगीत, साहित्य, राजनीति, पर्यावरण, ग्रामीण जीवन और यात्राओं में विशेष रुचि है.

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