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अजब-गजब! यहां बैल से बिजली बनाने का काम चल रहा है, ऐसे हो रही है शानदार कमाई

Bull Power: अब देश में कई लोग ऐसी आधुनिक और इको फ्रैंडली तकनीकों पर काम कर रहे हैं, जिससे निराश्रित गौवंश खुद ही अपने चारे का इंतजाम कर पाएंगे और इससे बिजली का उत्पादन भी मिल जाएगा.

Bull Electricity: आज किसानों के लिए निराश्रित गौवंश बड़ी समस्या बनती जा रही है. दूसरी तरफ देश में देसी गौवंशों के संरक्षण-संवर्धन को बढ़ावा दिया जा रहा है. इन गौवंशों पर आधारित प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन देसी गौवंश में सबसे बड़ी बाधा दूध ना देने वाले पशु यानी बछड़े और बैल ही बनते हैं, जिनकी कुछ ज्यादा वैल्यू नहीं है. यही वजह है कि किसान और पशुपालक भी इनके बड़े होते ही सड़कें हांकने के लिए छोड़ देते हैं. बाद में ही यही गौवंश खेतों में आतंक मचाते हैं और फसलें बर्बाद कर देते हैं, लेकिन यदि सही तरीके से इन निराश्रित पशुओं की अहमियत समझें तो ये बोझ नहीं, बल्कि कमाई का साधन बन सकते हैं. अब देश में कई लोग ऐसी तकनीकों पर काम कर रहे  हैं, जिससे ये गौवंश खुद ही अपने चारे का इंतजाम कर पाएंगे और इनसे बिजली का उत्पादन भी मिल जाएगा.

नंदी रथ का आविष्कार
आज बैलों के बल से देश के कई इलाकों में बिजली बनाई जा रही है. इसे निराश्रित पशुओं के लिए अच्छा विकल्प बताया जा रहा है. आवारा पशु एक तरह से गौशाला के ऊपर बोझ ही होते हैं, जिनकी देखभाल और खान-पान आदि पर सरकार का खर्च बढ़ जाता है. यदि सरकार इन्हीं गौवंशों को बिजली बनाने के काम पर लगा दे तो इन गौवंशों की वैल्यू बढ़ेगी और कमाई भी होगी.

लखनऊ से कुछ ही किलोमीटर दूर पर गोसाईगंज के सिद्धुपुरवा गांव में भी एक ऐसे ही मॉडल पर काम चल रहा है. यहां एक गौशाला में ट्रेडमील पर बैलों को चालकर बिजली उत्पादन किया जा रहा है. इस कांसेप्ट को नंदी रथ का नाम दिया है.

इस नंदी रथकर पर बैलों को चढ़ा दिया जाता है. साथ में चारे का इंतजाम भी होता है. ये बैल चारा खाते है और ट्रेडमील पर चलते हैं. बदले में ट्रेडमील को गियर बॉक्स से जोड़ा गया है, जो 1500 आरपीएम पावर को कन्वर्ट कर रहा है. 

जबरदस्त बिजली उत्पादन
न्यूज 18 की रिपोर्ट में इस गौशाला के मालिक पूर्व डीएसपी शैलेंद्र सिंह बताते हैं कि 1500 आरपीएम पर ही बिजली निर्माण होता है. अभी तक पूरी दुनिया में  500 से 700 आरपीएम ही लिया गया है, लेकिन इस गैशाला में लगे गियरबॉक्स ने अधिक बिजली मात्रा में बिजली लेने का रिकॉर्ड बना दिया है. इस मॉडल को बाकायदा पेटेंट करवाया गया है.

इस मॉडल से उत्पादित बिजली से किसान ना सिर्फ सिंचाई आदि कृषि कार्य कर सकते हैं, बल्कि घर पर तमाम बिजली उपकरण इससे चलाए जा सकते हैं. शैलेंद्र सिंह बताते हैं कि जहां सौर ऊर्जा से उत्पादित बिजली 3 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली मिलती है, जबकि ये बैलों से उत्पादित बिजली मात्र 1.5 रुपये में ही मिल सकती है.

कितनी कमाई हो जाएगी
रिपोर्ट के अनुसार, नंदी रथ के जरिए बैलों से बिजली बनाने वाले कांसेप्ट पर काम करके हर महीने 4,000 से 5,000 रुपये की आमदनी ले सकते हैं. यह कमाई तो सिर्फ बिजली से होगी. इसके अलावा, बैलों से मिलने वाले गोबर से आप वर्मी कंपोस्ट, जैविक खाद आदि बनाकर भी अच्छा पैसा कमा सकते हैं. इन दिनों पर्यावरण सरंक्षण में जैविक खेती और ग्रीन एनर्जी का चलन बढ़ता जा रहा है.

ऐसे में यह कांसेप्ट भी सौर ऊर्जा की तरह ग्रीन एनर्जी का शानदार उदाहरण बन सकता है, हालांकि सोलर ऊर्जा से सिर्फ एयर पोल्यूशन दूर होता है, लेकिन 25 साल बाद सोलर पावर प्लांट के डिस्पोजल की समस्या गंभीर हो जाएगी, जिससे प्रदूषण भी बढ़ेगा, जबकि बैलों से बिजली उत्पादन के कांसेप्ट में कोई भी चीज पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाती.

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. किसान भाई, किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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