बंदूक से ज्यादा क्यों खतरनाक हैं वीडियो एडिटिंग टूल्स, HC ने क्यों कहा ऐसा?
क्यों वीडियो एडिटिंग टूल्स और एप्स किसी बंदूक से भी ज्यादा खतरनाक है? दिल्ली हाईकोर्ट की इस चौंकाने वाले बयान के पीछे का क्या है पूरा सच? जान लीजिए इस खबर में.

- दिल्ली हाईकोर्ट ने AI टूल्स को बंदूक से ज़्यादा ख़तरनाक बताया.
- विकास दिव्यकीर्ति के डीपफेक, पहचान चोरी मामले में टिप्पणी.
- ये उपकरण बिना लाइसेंस, नियंत्रण के प्रतिष्ठा मिटाते हैं.
आज के दौर में रील्स बनाना, वीडियो एडिट करना आम बात हो गई है. हर दूसरे फोन में आपको कोई न कोई ऐसा ऐप मिल जाएगा जो मिनटों में किसी का भी चेहरा, आवाज बदल दे. और एआई के दौर में तो चीजें काफी ज्यादा आसान हो गई है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस तकनीक को हम मनोरंजन और क्रिएटिविटी का जरिया मान रहे हैं. वह असल जिंदगी में कितनी बड़ी तबाही ला सकती है.
हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कुछ ऐसी ही बात कही है. अदालत ने कहा है कि आज के मार्डन वीडियो एडिटिंग टूल्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस किसी भी बंदूक से कहीं ज्यादा खतरनाक हैं. यह सख्त टिप्पणी देश के जाने-माने कोचिंग संस्थान दृष्टि IAS के संस्थापक विकास दिव्यकीर्ति के पर्सनल्टी राइट्स यानी व्यक्तित्व अधिकारों से जुड़े विवाद पर आई है. आखिर ऐसा क्या हुआ कि अदालत को इन टूल्स को हथियारों से भी खतरनाक बताना पड़ा. जानें इस खबर में.
बंदूक से खतरनाक एडिटिंग टूल्स?
दृष्टि आईएएस के संस्थापक डॉ. विकास दिव्यकीर्ति के पर्सनैलिटी राइट्स के उल्लंघन से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने टेक कंपनियों के वकीलों के सामने इसके पीछे कई तर्क देते हुए कहा कि आज के दौर में यह एडिटिंग टूल्स किसी एक बंदूक से भी ज्यादा खतरनाक हैं क्योंकि यह किसी की प्रतिष्ठा की हत्या कर सकते हैं.
कोर्ट न कहा कि कम से कम हमारे देश में अगर आप एक बंदूक रखना चाहते हैं. तो फिर आपको एक बेहद कठिन कानूनी प्रोसेस और बैकग्राउंड वेरिफिकेशन से गुजरना पड़ता है. लेकिन इंटरनेट पर यह सारे टूल्स फ्री में उपलब्ध हैं. कभी भी कोई बिना अपनी पहचान जाहिर किए और बिना किसी रोक-टोक के इन्हें इस्तेमाल कर सकता है.

पहचान की चोरी और डीपफेक
आज के समय में तकनीक इतनी आगे निकल चुकी है कि किसी का चेहरा या आवाज चुराना बच्चों का खेल बन गया है. विकास दिव्यकीर्ति के मामले में भी यही देखने को मिला. जहां सोशल मीडिया पर उनके नाम से धड़ल्ले से फर्जी प्रोफाइल और अकाउंट्स चलाए जा रहे हैं.
इन टूल्स का इस्तेमाल करके उनके ऐसे डीपफेक वीडियो तैयार किए गए जिनमें वे ऐसी बातें बोलते नजर आ रहे हैं जो उन्होंने कभी कही ही नहीं थीं. इतना ही नहीं उनके चेहरे और आवाज का इस्तेमाल करके नकली विज्ञापन और एंडोर्समेंट्स तक फैला दिए गए जिससे लोग यह सच मान बैठें कि वे किसी ब्रांड और गलत प्रोडक्ट का प्रचार कर रहे हैं.
आम इंसान को तो यह पता भी नहीं चलता कि स्क्रीन पर जो वीडियो चल रहा है. वह असली है या फिर किसी टूल का इस्तेमाल करके बनाया है. ऐसा सिर्फ विकास दिव्यकीर्ति के मामले में ही नहीं हो रहा. बल्कि देश के कई बड़ी हस्तियों को लेकर इस तरह के फेक वीडियो बनाए जा रहे हैं.

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गलत जानकारी फैलााने में इस्तेमाल
इन वीडियो एडिटिंग टूल्स की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह किसी भी असली वीडियो का हुलिया पूरी तरह बदल सकते हैं. किसी की भी वीडियो क्लिप के छोटे-छोटे हिस्से काटकर, कॉन्टेक्स्ट बदलकर और आवाज की टोन को ट्यून करके एक नया और बेहद खतरनाक नैरेटिव गढ़ा जा सकता है.
मान लीजिए किसी ने बहुत ही संजीदगी से कोई सामाजिक बात कही है. तो यह टूल्स उस क्लिप को ऐसे काट-छांट देंगे कि लगे वह किसी विवादित बात का समर्थन कर रहा है. सोशल मीडिया पर वायरल होने के लिए लोग बिना यह सोचे-समझे इन फेक वीडियो को शेयर करने लगते हैं कि इसका समाज पर क्या असर पड़ेगा.
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