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Explained: AI डेटा सेंटर की बढ़ती तलब! एक सवाल पूछने पर जितना पानी उड़ता है, उतने से कितने लोगों की प्यास बुझ सकती है?

Data Centre Water Consumption: NASSCOM के मुताबिक, भारत में डेटा सेंटरों की क्षमता 2024 के 950 मेगावाट से बढ़कर 2026 तक 1,700 मेगावाट होने जा रही है. रोजाना करीब 1 करोड़ लीटर तक पानी की मांग बढ़ेगी.

आपने फोन पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से एक मामूली सा सवाल पूछा, 'आज का मौसम कैसा रहेगा?' जवाब भी सेकेंड भर में आ गया. लेकिन इस एक सवाल के पीछे जो चीज खपती है, वो है पानी की एक पूरी बोतल. जी हां, हर बार जब आप AI से बात करते हैं, तो कहीं न कहीं एक डेटा सेंटर की चिमनी से पानी भाप बनकर उड़ रहा होता है. ये पानी आपके पीने, खेतों की सिंचाई या शहर की सप्लाई का हो सकता है. आखिर डेटा सेंटर में कितना पानी खपता है...

आखिर डेटा सेंटर को इतना पानी क्यों चाहिए?

डेटा सेंटर कोई ऑफिस नहीं, बल्कि हजारों सर्वरों से भरे बड़े-बड़े हॉल होते हैं. ये सर्वर चौबीसों घंटे गर्मी उगलते हैं. अगर इन्हें ठंडा न किया जाए तो ये पिघल जाएंगें. इसी ठंडक के लिए बहुत सारा पानी इस्तेमाल होता है. कूलिंग टावरों में वाष्पीकरण के जरिये या फिर बिजली पैदा करने वाले थर्मल प्लांट में, क्योंकि डेटा सेंटर बिजली के बिना मर जाएंगे.

एक डेटा सेंटर रोज कितना पानी पी जाता है?

अमेरिकी संस्था एनवायर्नमेंटल एंड एनर्जी स्टडी इंस्टीट्यूट (EESI) की रिपोर्ट के मुताबिक, एक औसत 100 मेगावाट क्षमता वाला हाइपरस्केल डेटा सेंटर हर दिन 30 से 50 लाख गैलन पानी खपत करता है. इसे लीटर में बदलें तो यह 1.1 करोड़ से 1.9 करोड़ लीटर प्रतिदिन होता है. इसे ऐसे समझें:

  • एक इंसान को रोजाना पीने के लिए 3-4 लीटर पानी चाहिए.
  • एक अकेला 100 मेगावाट का डेटा सेंटर रोज इतना पानी खर्च करता है, जो 30 लाख से 50 लाख लोगों की रोज की पीने की जरूरत पूरी कर सकता है.
  • एक डेटा सेंटर की रोज की पानी की खपत, 2 करोड़ की आबादी वाले मुंबई शहर की एक दिन की पीने की पानी की जरूरत के एक बड़े हिस्से के बराबर बैठती है.

गूगल और माइक्रोसॉफ्ट कैसे शहरों के पानी पी गए?

अमेरिका की दिग्गज टेक कंपनियों की ही बात करें तो आंकड़े और भी चौंकाने वाले हैं:

  • गूगल ने अपनी 2023 की एनवॉयर्नमेंटल रिपोर्ट में बताया कि उसके दुनिया भर के डेटा सेंटरों और ऑफिसों ने उस साल 5.6 अरब गैलन पानी का इस्तेमाल किया. यानी करीब 21,200 करोड़ लीटर. इसमें से अकेले अमेरिका के द डल्स शहर में स्थित गूगल के एक डेटा सेंटर ने हर दिन 15 लाख गैलन (करीब 57 लाख लीटर) पानी पिया. यह उस पूरे इलाके की कुल जलापूर्ति का 29% था.
  • माइक्रोसॉफ्ट के एरिजोना के गुडइयर शहर वाले डेटा सेंटर ने 2022 में 5.6 करोड़ लीटर से ज्यादा पानी इस्तेमाल किया, जबकि वह इलाका सूखे की मार झेल रहा था.

डेटा सेंटर के एक दिन का पानी, पूरे मौसम की फसल के बराबर

भारतीय कृषि के मामले में एक एकड़ गेहूं की फसल को पूरे सीजन में (बुवाई से कटाई तक) लगभग 20-25 लाख लीटर पानी की जरूरत होती है. अब गूगल के द डल्स वाले डेटा सेंटर का ही उदाहरण लें, जो रोजाना 57 लाख लीटर पानी खर्च करता है. यानी, यह एक अकेला डेटा सेंटर हर दिन इतना पानी पीता है जितने से लगभग ढाई एकड़ गेहूं की पूरी फसल पैदा की जा सकती है.

अगर पूरे साल का हिसाब लगाएं तो इस डेटा सेंटर का सालाना पानी 200 करोड़ लीटर से ऊपर होगा, जो 800-1000 एकड़ गेहूं के पूरे सीजन की सिंचाई के बराबर है. यह किसी छोटे-मोटे किसान की नहीं, बल्कि एक बड़े कृषि फार्म की पानी की जरूरत है.

AI की प्यास: एक चैटबॉट से बात करने पर कितना पानी उड़ा?

नेचर पेपर में छपी रिसर्च स्टडी के मुताबिक, GPT-4 जैसे एक बड़े लेंग्वेज मॉडल को ट्रेन करने में अनुमानित 70 लाख लीटर ताजा पानी खर्च होता है. जब आप उस चैटबॉट से 10 से 50 सवाल पूछ लेते हैं, तो इतनी ही बातचीत में आधा लीटर पानी की बोतल   भाप बनकर हमेशा के लिए गायब हो जाती है.

इसे स्विमिंग पूल से तुलना करके देखें तो एक ओलंपिक साइज के स्विमिंग पूल में लगभग 25 लाख लीटर पानी आता है. GPT-4 को ट्रेन करने में करीब तीन ओलंपिक स्विमिंग पूल जितना पानी खर्च हुआ. दुनिया भर में जितने लोग रोजाना AI चैटबॉट का इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे हर दिन दर्जनों स्विमिंग पूल का पानी भाप बन रहा है.

भारत में डेटा सेंटर की बाढ़ के लिए क्या हम तैयार हैं?

भारत में डेटा सेंटर उद्योग विस्फोटक रफ्तार से बढ़ रहा है. NASSCOM की रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में भारत में डेटा सेंटरों की कुल क्षमता 950 मेगावाट थी, जो 2026 तक बढ़कर 1,700 मेगावाट होने का अनुमान है. अगर एक सामान्य अनुमान लगाएं कि हर 100 मेगावाट डेटा सेंटर रोजाना औसतन 1.5 करोड़ लीटर पानी खर्च करता है, तो:

  • 2024 में भारत के सभी डेटा सेंटर रोज लगभग 14 करोड़ लीटर पानी खर्च कर रहे थे.
  • 2026 तक यह आंकड़ा 25 करोड़ लीटर प्रतिदिन से पार जा सकता है.

अब इसकी तुलना इंसानों की जरूरत से कीजिए. 25 करोड़ लीटर पानी 8 करोड़ से ज्यादा लोगों की रोजाना पीने की जरूरत के बराबर है. यानी सिर्फ दो साल बाद भारत के डेटा सेंटर इतना पानी पीएंगे जो 24 करोड़ आबादी वाले पूरे उत्तर प्रदेश के एक-तिहाई लोगों की प्यास बुझा सकता है.

मजेदार बात यह है कि ये डेटा सेंटर मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद और बेंगलुरु जैसे शहरों में लग रहे हैं, जहां पहले से पानी की किल्लत है.

क्या इस पानी की बर्बादी का कोई हल है?

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, टेक कंपनियों पर अब दबाव बढ़ रहा है. गूगल और माइक्रोसॉफ्ट ने 2030 तक 'वाटर पॉजिटिव' होने का वादा किया है, यानी जितना पानी खर्च करेंगे, उससे ज्यादा साफ करके लौटाएंगे. नए डेटा सेंटरों में अब 'एयर कूलिंग' और 'लिक्विड इमर्शन कूलिंग' जैसी तकनीकें आ रही हैं, जिनमें पानी का इस्तेमाल लगभग जीरो हो जाता है.

रिसाइकल किए गए गंदे पानी और समुद्री पानी से कूलिंग की भी योजनाएं बन रही हैं. फिलहाल तो सच्चाई यही है कि हमारा डिजिटल जीवन एक अनदेखी प्यास पर चल रहा है.

अगली बार जब आप अपने फोन पर कोई वीडियो देखेंगे, सोशल मीडिया स्क्रॉल करेंगे या AI से कोई मजेदार तस्वीर बनाने को कहेंगे, तो एक पल के लिए रुकिएगा. पर्दे के पीछे किसी डेटा सेंटर का कूलिंग टावर आपकी इस छोटी सी ख्वाहिश पूरा करने के लिए शायद किसी किसान के खेत का पानी भाप बना रहा होगा. यह बहस तकनीक बनाम प्रकृति की नहीं है, बल्कि हमारी सोच की है.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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