Diwali 2026: लपलपाती क्यों है दिवाली की झालर, समझें इसके अंदर की टेक्नोलॉजी?
Diwali 2026: दिवाली पर घर को रोशन करने वाली रंग-बिरंगी झालरें जब लपलपाती हैं. तो नजारा बेहद खूबसूरत लगता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसके अंदर कौनसी टेक्नोलॉजी काम कर रही है?

- दिवाली की रंगीन झालरों में छोटा कंट्रोलर बॉक्स होता है।
- इसके अंदर माइक्रोचिप पैटर्न वाली बिजली भेजती है।
- बल्बों को अलग ग्रुप में जोड़कर प्रभाव बनते हैं।
- अब स्मार्ट झालरें ऐप या संगीत से जुड़कर जलती हैं।
Diwali 2026: अब बस कुछ ही दिनों में दिवाली का त्योहार है. अभी से ही पूरे देश में दिवाली की रौनक नजर आने लगी है. लोगों ने घर की साफ-सफाई करके सजावटी सामान लाना शुरू कर दिया है. दिवाली की सजावट में सबसे अहम हिस्सा होती है रंग-बिरंगी लाइटों वाली झालर. शाम होते ही जब बालकनी और छतों पर ये झालरें जलती हैं तो पूरा माहौल ही बदल जाता है. आपने गौर किया होगा कि यह लाइटें सिर्फ एक जैसी नहीं जलतीं.
बल्कि कभी तेजी से लपलपाती हैं कभी धीरे-धीरे बुझती हैं, तो कभी किसी लहर की तरह आगे बढ़ती हैं. दे. अक्सर हम इन्हें बस प्लग में लगाकर छोड़ देते हैं लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर इन छोटी-छोटी एलईडी बल्बों को कौन बताता है कि कब जलना है और कब बुझना है? चलिए आपको बताते हैं कि दिवाली की इन झालरों के अंदर कौन-सी टेक्नोलॉजी काम करती है.
छोटा-सा कंट्रोलर बॉक्स करता है काम
आपने देखा होगा कि हर झालर के प्लग से थोड़ा आगे एक छोटी-सी प्लास्टिक की डिब्बी लगी होती है, जिस पर एक बटन भी होता है. यही डिब्बी इस पूरी झालर का दिमाग है. जिसे टेक्निकल भाषा में कंट्रोलर या चेजर सर्किट कहते हैं. जब आप इस डिब्बी के बटन को दबाते हैं तो लाइटों के जलने का पैटर्न बदल जाता है. इस छोटे से बॉक्स के अंदर एक प्रिंटेड सर्किट बोर्ड यानी PCB और एक छोटी-सी माइक्रोचिप लगी होती है.
इस चिप के अंदर पहले से ही अलग-अलग पैटर्न की कोडिंग फीड होती है. जैसे कि चेजिंग, फ्लैशिंग, स्लो फेड या ट्विंकलिंग. हमारे घरों में जो बिजली आती है, वह AC करंट होती है जबकि एलईडी बल्ब DC पर चलते हैं. यह डिब्बी न सिर्फ AC करंट को DC में बदलती है. बल्कि अपनी चिप के जरिए करंट को रोक-रोक कर आगे भेजती है. जितनी बार करंट रुकता और चलता है, उतनी ही बार हमें झालर लपलपाती हुई दिखाई देती है.

तारों को अलग तरीके से जोड़ा जाता है
अगर आप किसी झालर को ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि उसमें सिर्फ एक नहीं बल्कि तीन या चार तार आपस में लिपटे होते हैं. एक झालर के सारे बल्ब एक ही लाइन में नहीं जुड़े होते बल्कि उन्हें अलग-अलग ग्रुप यानी चैनल्स में बांटा जाता है. मसलन पहला, चौथा और सातवां बल्ब एक तार से जुड़ा होगा जबकि दूसरा, पांचवां और आठवां बल्ब दूसरे तार से.
इसे सीरीज और पैरेलल कनेक्शन का मिक्सचर कहते हैं. जब कंट्रोलर बॉक्स की चिप पहले तार में करंट छोड़ती है और दूसरे में रोक देती है. तो आधी लाइटें जलती हैं और आधी बुझ जाती हैं. जब यही काम सेकंड के सौवें हिस्से में बार-बार होता है. तो हमारी आंखों को ऐसा लगता है जैसे रोशनी एक जगह से दूसरी जगह दौड़ रही है. इसी वायरिंग की वजह से अगर बीच का एकाध बल्ब खराब भी हो जाए. तो पूरी झालर बंद होने से बच जाती है.

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बिना डिब्बी वाली झालर
कई बार आपने ऐसी झालरें भी देखी होंगी जिनमें कोई कंट्रोलर बॉक्स नहीं होता, फिर भी वे लपलपाती हैं. ऐसी झालरों में एक खास तरह का मास्टर बल्ब या बाई-मेटैलिक स्ट्रिप का इस्तेमाल होता है. जब इसमें करंट जाता है, तो इसके अंदर की पत्ती गर्म होकर मुड़ जाती है, जिससे कनेक्शन कट जाता है और लाइट बुझ जाती है. ठंडा होते ही पत्ती वापस जुड़ती है और लाइट फिर जल उठती है. हालांकि अब यह पुरानी टेक्नोलॉजी हो चुकी है.
मार्केट में आ गई स्मार्ट लाइट्स
आजकल मार्केट में स्मार्ट और पिक्सल एलईडी झालरों का बोलबाला है. इनमें हर एक एलईडी बल्ब के अंदर अपनी खुद की एक माइक्रोचिप होती है. यह लाइटें सीधे आपके स्मार्टफोन के ऐप, ब्लूटूथ या वाई-फाई से कनेक्ट हो जाती हैं. आप फोन पर जो गाना बजाएंगे, यह झालरें उसी म्यूजिक की बीट पर लपलपाएंगी.
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