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दिल्ली में करवट बदल रही है उत्तराखंड की सियासत, क्या बदल जाएगा सीएम का चेहरा?

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ पार्टी और विधानमंडल दल में बगावत जैसा संकट गहरा गया है. अब इस तूफ़ान को थामने के लिए आज दिल्ली में जद्दोजहद जारी है.

देहरादून: उत्तराखंड में सियासत एक बार फिर करवट ले रही है. नेतृत्व परिवर्तन को लेकर उपजे असंतोष को लेकर दिल्ली से देहरादून तक घटनाक्रम तेजी के साथ घटित हो रहा है. मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को दिल्ली बुला लिया गया है. विगत शनिवार को अचानक बुलाई गयी कोर कमिटी की बैठक में पर्यवेक्षक के रूप में छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री का देहरादून पहुंचकर रायशुमारी करना और नौ मार्च तक चलने वाले बजट सत्र को छह मार्च को ही स्थगित कर देने जैसी घटना से लगी सियासी आग में दिल्ली में घट रहा घटनाक्रम घी का काम कर रहा है.

दरअसल, मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ पार्टी और विधानमंडल दल में बगावत जैसा संकट गहरा गया है. मंत्री और विधायक लम्बे समय से पिछले तीन साल से आरोप लगा रहे हैं कि अफसरशाही जन प्रतिनिधियों की नहीं सुनती और विधायकों का सम्मान भी नहीं मिल रहा है. मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र के अलावा विधायक केंद्रीय नेतृत्व को दिल्ली जाकर कई बार अपना दुखड़ा बता चुके है लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई.

जब सुनवाई नहीं हुई तो असंतुष्ट मंत्रियों और विधायकों ने परेशान होकर मई या जून माह में सामूहिक रूप से विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफ़ा देने की योजना बनाई तो केंद्रीय हाई कमान सोचने के लिए विवश हो गया. इस तूफ़ान को थामने के लिए अचानक कोर कमेटी की बैठक बुलाकर पर्यवेक्षक के रूप में रमन सिंह को भेजा गया. अब इस तूफ़ान को थामने के लिए आज दिल्ली में जद्दोजहद जारी है.

किस तरफ करवट लेगी उत्तराखंड की सियासत

उत्तराखंड में अब सियासत को लेकर कई अटकलें लग रही हैं.ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मुख्यमंत्री का चेहरा बदलेगा या असन्तुष्टों को कैबिनेट में स्थान देकर तूफ़ान थम जाएग. या फिर पूरी कैबिनेट का रिशफल होगा.

यदि कैबिनेट विस्तार हुआ तो कौन हैं दावेदार?

उत्तराखंड में अगर कैबिनेट का विस्तार होता है तो कुमाऊं से पुष्कर सिंह धामी, बलवंत सिंह भौर्याल, राजेश शुक्ला, चंद्रा पंत, बिशन सिंह चुफाल, चन्दन रामदास दावेदार हैं. जबकि गढ़वाल से मुन्ना सिंह चौहान, महेंद्र भट्ट, स्वामी यतीश्वरानंद, गणेश जोशी, हरबंश कपूर समेत कई अन्य नाम चर्चा में हैं.

अगर नेतृत्व परिवर्तन हुआ तो ये हो सकती है तस्वीर

सांसदों में से हुआ तो?

बीजेपी के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी और राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी

पक्ष में

प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के निकट होना साफ़ सुथरी राजनीतिक छवि होना दिल्ली में रहकर उत्तराखंड के लिए निरंतर काम करना सभी वर्गों में स्वीकार्यता होना

विपक्ष में

विधानसभा का सदस्य न होना पूर्व में सांसद के अलावा कोई पोर्टफोलियो न संभालना

अजय भट्ट, सांसद नैनीताल लोकसभा

पक्ष में

उत्तराखंड में पहली सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी संभल चुके हैं

विपक्ष में

नैनीताल लोकसभा सीट खाली होगी और उप चुनाव कराना होगा. नैनीताल तीन चौथाई सीट किसान बाहुल्य है, उप चुनाव रिस्क हो सकता है.

यदि कोई विधायकों में से बनता है तो?

सतपाल महाराज, अभी कैबिनेट मंत्री हैं

पक्ष में

केंद्र से लेकर राज्य सरकार में मंत्री का अनुभव विधानसभा का उपचुनाव नहीं लड़ना पड़ेगा पौड़ी से सांसद भी रह चुके हैं

विपक्ष में

मूलत: भाजपाई न होना प्रशासनिक क्षमता का अभाव होना

धनसिंह रावत, राज्यमंत्री

पक्ष में

मूलत: भाजपाई और संघ की पृष्ठभमि से होना संगठन का अनुभव के साथ पकड़ होना

विपक्ष में

इस समय सरकार में सबसे कनिष्ठ मंत्री होना राज्यमंत्री के रूप में कोई उल्लेखनीय छाप न छोड़ना

उत्तराखंड के सीएम के रूप में एक दावेदार महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी भी हैं. उनका राजनीतिक तजुर्बा सर्वाधिक है लेकिन उम्रदराज होना उनके पक्ष में नहीं जा रहा है.

यह भी पढ़ें-

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