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UP Election 2022: आजमगढ़ में बसपा को झटका, 4 में से दो विधायकों ने छोड़ा पार्टी का साथ

UP Election 2022: अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में बसपा का भविष्य खतरे में नजर आ रहा है. बता दें कि जिले के 4 विधायकों में से दो ने बसपा का साथ छोड़ा दिया है और एक का निधन हो गया है.

UP Election 2022: यूपी में होने वाले विधानसभी चुनावों के बीच आजमगढ़ जिले में बसपा पर खतरा मंडराता नजर आ रहा है. जिले में लगातार बसपा नेताओं का पार्टी से मोहभंग हो रहा है. 2017 के विधानसभा चुनाव में चार सीटों पर चुनाव जीतने वाली बसपा के पास वर्तमान में एक मात्र विधायक बचा है. पार्टी के सिंबल पर चुनाव लड़ने वाले नेता भी लगातार अपने राजनीतिक भविष्य को देखते हुए दूसरे दलों की तरफ रूख कर रहे हैं. जिले की अतरौलिया विधानसभा सीट से 2017 के चुनाव में बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले बाहुबली अखंड प्रताप सिंह की पत्नी पूर्व ब्लाक प्रमुख वंदना सिंह आज निषाद पार्टी में शामिल हो गई. ऐसे में आने वाले विधानसभा चुनाव में बसपा को जिले में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. 

ये नेता छोड़ चुके हैं बसपा का दामन

जिले में बसपा से मोहभंग होने वाले नेताओं में दीदारगंज विधानसभा से विधायक रहे सुखदेव राजभर का नाम सबसे पहले आता है. हाल ही में सुखदेव राजभर का निधन हो गया. सुखदेव राजभर बसपा के संस्थापक सदस्यों में से थे. बसपा ने सुखदेव राजभर का विधानसभा का अध्यक्ष भी बनाया था. कयास लगाया जा रहा है कि समाजवादी पार्टी सुखदेव राजभर के पुत्र को दीदारगंज विधानसभा क्षेत्र से प्रत्याशी बना सकती है.

वहीं मुबारकपुर विधानसभा क्षेत्र से बसपा से दो बार लगातार विधायक रहे शाह आलम उर्फ गुड्‌डू जमाली जोकि बसपा सुप्रीमो मायावती के काफी करीबी रहे और नेता विधानमंडल दल भी रहे ने भी बसपा का साथ छोड़ दिया. जबकि 2012 में आजमगढ़ की 10 विधानसभा सीटों में से 9 सीट पर समाजवादी पार्टी का कब्जा था लेकिन मात्र एक सीट मुबारकपुर को बसपा के टिकट पर चुनाव जीतकर शाह आलम गुड्डू जमाली ने आजमगढ़ में बसपा का खाता खोला था. गुड्डू जमाली मायावती के काफी करीब थे. उन्होंने अचानक 25 नवंबर को एक पत्र लिखकर नेता विधानमंडल दल व विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. पत्र के माध्यम से उन्होंने पीड़ा व्यक्त की उनकी मुलाकात 21 नवंबर को मायावती से हुई लेकिन वहां कुछ ऐसी बातें हुई जिससे विधायक शाह आलम को झकझोर दिया और 4 दिन बाद 25 नवंबर को उन्होंने विधानमंडल दल एवं विधानसभा की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया.

वहीं सगड़ी विधानसभा से बसपा विधायक वंदना सिंह ने भी हाल ही में बसपा छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया. इस्तीफा देते समय वंदना सिंह ने भी इस बात का उल्लेख किया कि उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने अखिलेश यादव से मुलाकात की और उन्हें इस बात को लेकर पार्टी से निष्कासित कर दिया गया. जबकि ये बात निराधार थी. उन्होंने कई बार कोशिश की कि वो मायावती से मिलकर अपना पक्ष रख सके . लेकिन बसपा सुप्रीमो ने उन्हें मौका नहीं दिया इस बात से दुखी होकर उन्होंने बसपा को छोड़ते हुए भाजपा की सदस्यता ले ली. ऐसे में आने वाले विधानसभा चुनाव में बसपा को जिले में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.

वंदना को मिला टिकट तो बदलेगा अतरौलिया सीट का समीकरण

राजनीतिक रूप से आजमगढ़ जिले की अतरौलिया विधानसभा की सीट महत्वपूर्ण मानी जाती है. इस सीट पर समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता व पूर्व मंत्री बलराम यादव का वर्चस्व रहा है.साल 2012 में उन्होने ये सीट अपने पुत्र संग्राम सिंह यादव के लिए छोड़ दिया संग्राम यादव यहां से पहली बार चुनाव लड़े और विजयी हुए. 2017 के चुनाव में  संग्राम यादव, भाजपा के कन्हैया निषाद और बसपा से पूर्व ब्लाक प्रमुख अंखड प्रताप सिंह चुनावी मैदान में उतरे. पूर्व प्रमुख के चुनावी मैदान में उतरने से चुनाव दिलचस्प हो गया.

संग्राम यादव को मिले इतने वोट

चुनाव परिणाम आने पर संग्राम यादव को 74276 वोट मिले. भाजपा के कन्हैया निषाद को 71809 तो बसपा से पूर्व प्रमुख अंखड प्रताप सिंह 56536 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे. सवर्ण और निषाद बाहुल्य इस सीट पर अखंड प्रताप की सीधी नजर थी. हत्या के एक मामले में जेल में बंद अखंड प्रताप की पत्नी वंदना सिंह उनके जगह पर भाजपा गठबंधन की टिकट पर ताल ठोक सकती हैं. दो माह पूर्व जिले के दौरे पर आए निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉक्टर संजय निषाद ने कहा था कि आजमगढ़ की अतरौलिया ,गोपालपुर और फूलपुर पवई सीट पर वह दावा करेंगे, लेकिन प्राथमिकता की सीट अतरौलिया होगी. अगर गठबंधन में ये सीट उनके खाते में जाती है, तो निषाद पार्टी के जीत की मजबूत संभावना है

संजय निषाद के बहाने दागियों की भाजपा गठबंधन में एंट्री

दागियों की इंट्री को लेकर भाजपा बहुत सतर्क है. ऐसे में वो सहयोगी दलों के सहारे दागियों को गठबंधन का हिस्सा बना रही है. जिससे अब जो भी दागी नेता भाजपा में डायरेक्ट एन्ट्री नहीं पा रहे हैं, दूसरे रास्ते से वो चुनाव के दौरान भाजपा की मदद करेगा. ऐसा ही प्रयोग अतरौलिया विधानसभा सीट पर भी देखने को मिल सकता है.

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