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मायावती के मन में क्या? अशोक बाहर, आनंद के पर कतरे, अंटू OUT, अगला नंबर किसका!

UP Politics: यूपी में विधानसभा चुनाव से पहले बहुजन समाज पार्टी में शामिल होने वाले नेताओं से ज्यादा निष्कासित होने वालों की लिस्ट बढ़ती जा रही है. आखिर मायावती के मन में क्या है?

उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव अब करीब आ चुका है. सभी राजनीतिक दल अपने कुनबे को बड़ा करने, नए चेहरे जोड़ने और गठबंधन की रणनीति बनाने में लगे हुए हैं. बीजेपी, सपा और कांग्रेस जहां विस्तार की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती बिल्कुल उलटा रुख अपनाए हुए हैं.

वह पार्टी के ऊंचे पदों पर बैठे अपने करीबियों के पर काटने में जुटी हुई हैं. यह सिलसिला इतना तेज और निरंतर है कि राजनीतिक हलकों में सवाल उठने लगा है कि मायावती के मन की माया आखिर क्या है?

आकाश आनंद और उनके ससुर की कहानी

सबसे पहले आकाश आनंद का मामला देखिए. मायावती ने साफ कर दिया कि टिकट फाइनल करने का अधिकार सिर्फ उन्हीं के पास है, आकाश आनंद के पास नहीं. सोशल मीडिया पर पोस्ट डालकर उन्होंने न सिर्फ भतीजे को हद में रहने की नसीहत दी, बल्कि कार्यकर्ताओं और टिकटार्थियों को भी संदेश दिया कि किसी भ्रम में न रहें. इससे पहले आकाश को नेशनल कोऑर्डिनेटर बनाकर ऊंचाई दी गई थी, लेकिन फिर मन घूमा और उन्हें किनारे कर दिया गया.

आकाश के ससुर अशोक सिद्धार्थ, जो कभी बहन जी के बेहद करीबी थे और राज्यसभा सांसद भी बनाए गए, उन्हें भी पार्टी से बाहर कर दिया गया. दिलचस्प बात यह है कि मायावती पहले भी दोनों को बाहर कर चुकी थीं, फिर वापस लाईं और फिर से बाहर का रास्ता दिखा दिया. यह उतार-चढ़ाव साफ बताता है कि मायावती किसी को भी स्थायी शक्ति केंद्र नहीं बनने देना चाहतीं.

अब सतीश चंद्र मिश्रा के परिवार की बात

अब बारी आई सतीश चंद्र मिश्रा के परिवार की. सतीश चंद्र मिश्रा पार्टी के वरिष्ठ नेता और ब्राह्मण चेहरे माने जाते हैं. 11 अगस्त को मायावती ने खुद उनके वकालत के 50 साल पूरे होने पर हार्दिक बधाई दी और उनकी उपलब्धियों की तारीफ की. लेकिन महज दो दिन बाद, 13 अगस्त को उनके भांजे अनंत कुमार मिश्रा उर्फ अंटू मिश्रा को पार्टी से निकाल दिया गया. अंटू मिश्रा 2007 से 2012 तक मायावती सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रह चुके हैं. उन पर पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाया गया. एक तरफ बधाई, दूसरी तरफ निष्कासन-यह विरोधाभास मायावती की शैली का हिस्सा लगता है.

इन्हीं अंटू मिश्रा से जुड़ा साल 2024 का एक वाकया तो ऐसा है कि जो मायावती के सियासी अंदाज की नई कहानी बताता है.  अंटू मिश्रा लोकसभा चुनाव के समय बीजेपी में शामिल होने वाले थे. चर्चे हुए, पर्चे भी छपे, फोटो भी खिंच गई लेकिन दिल्ली हाईकमान से आए एक फोन ने मिश्रा की बीजेपी में ज्वाइनिंग पर जो ब्रेक लगाया उसे वह खुद आजतक नहीं हटा सके. और अब मायावती ने उन्हीं अंटू मिश्रा को बाहर का रास्ता दिखा दिया. 

इन सब फैसलों के पीछे मायावती की रणनीति साफ झलकती है. बसपा हमेशा से उनके एकछत्र नियंत्रण वाली पार्टी रही है. कांशीराम के बाद उन्होंने पार्टी को पूरी तरह अपने हाथ में लिया और किसी भी संभावित चुनौती को जन्म लेने से पहले ही कुचल दिया.

मायावती चाहती क्या हैं?

आकाश आनंद को आगे बढ़ाकर युवा और Gen-Z वोट आकर्षित करने की कोशिश हुई, लेकिन जैसे ही उनकी भूमिका टिकट वितरण या संगठन में बढ़ने लगी, मायावती ने लगाम कस दी. अशोक सिद्धार्थ और अंटू मिश्रा जैसे नेताओं को बाहर करना इस बात का संकेत है कि परिवार या पुरानी नजदीकी कोई गारंटी नहीं है. पार्टी हित और अनुशासन सबसे ऊपर है.2027 के चुनाव को देखते हुए मायावती शायद पार्टी को पूरी तरह 'क्लीन' करना चाहती हैं.

वह नहीं चाहतीं कि अंदरूनी गुटबाजी या व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं चुनावी तैयारी को प्रभावित करें. ब्राह्मण वोट बैंक के लिए सतीश चंद्र मिश्रा अभी भी जरूरी हैं, इसलिए उन पर सीधा वार नहीं किया गया, लेकिन परिवार के अन्य सदस्यों को सबक सिखा दिया गया. इससे कार्यकर्ताओं में यह संदेश जाता है कि बहन जी की मर्जी ही अंतिम है. कोई भी, चाहे कितना भी करीबी क्यों न हो, पार्टी के अनुशासन से ऊपर नहीं हो सकता.

आकाश से अंटू तक सब एक सूत्र में...

मायावती की यह माया दरअसल उनकी राजनीतिक समझ का हिस्सा है. वह जानती हैं कि बसपा की ताकत उनके व्यक्तिगत करिश्मे और कठोर नियंत्रण में है. विस्तार की बजाय संगठन को कसकर रखना, संभावित उत्तराधिकारियों को नियंत्रित रखना और हर बड़े नेता को याद दिलाना कि सत्ता का केंद्र सिर्फ एक है-यही उनकी मौजूदा रणनीति लगती है.

चाहे आकाश आनंद हों, अशोक सिद्धार्थ हों या अंटू मिश्रा, सब एक ही सूत्र में बंधे हैं. मायावती के मन की माया यही है-पार्टी पर पूर्ण नियंत्रण बनाए रखना, चाहे उसके लिए कितनी भी बार मन क्यों न घुमाना पड़े. 2027 का चुनाव बताएगा कि यह रणनीति सफल होती है या नहीं, लेकिन फिलहाल बहन जी का संदेश साफ है बसपा में मायावती ही मायावती हैं.

पत्रकारिता के क्षेत्र में 21 साल से सक्रिय हैं. साल 2004 में स्टार न्यूज़ से जुड़े और इस समय एबीपी न्यूज़ में इनपुट एडिटर हैं. इन्होंने असाइंमेंट हेड और फॉरवर्ड प्लानिंग के काम को अलग-अलग पदों पर रहने के साथ ही बतौर हेड बख़ूबी अंजाम दिया. साल 2022 में डिजिटल मीडिया से भी नाता जोड़ा. 
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