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Kashmir News: माता खीर भवानी मेले में गूंजी कश्मीरी पंडितों की मांग, सरकार से लगाई घर वापसी की गुहार

Kashmir News In Hindi: नरेंद्र मोदी सरकार को कश्मीरी पंडितों की घर वापसी से जुड़े पुराने वादों की याद दिला रहे हैं. विशेष रूप से ऐसे लोग, जो अब अपने मूल स्थान पर वापस लौटना चाहते हैं.

देशभर से आए कश्मीरी पंडित समाज के लोग कश्मीर घाटी के गांदरबल जिले के तुलमुल्ला गांव स्थित अपनी इष्ट देवी माता राग्न्या देवी, जिन्हें माता खीर भवानी के नाम से भी जाना जाता है, के मंदिर में पहुंचकर पूजा-अर्चना कर रहे हैं. श्रद्धालु एक बार फिर अपने वतन कश्मीर लौटने और वहीं स्थायी रूप से बसने की कामना कर रहे हैं. साथ ही वे केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को कश्मीरी पंडितों की घर वापसी से जुड़े पुराने वादों की भी याद दिला रहे हैं. विशेष रूप से ऐसे लोग, जो अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं और जीवन के शांतिपूर्ण दौर में अपने मूल स्थान पर लौटना चाहते हैं, इस इच्छा को खुलकर व्यक्त कर रहे हैं.

देशभर से आए श्रद्धालुओं में 60 वर्षीय कल्पना बांगरू भी शामिल हैं. वह पलायन के दर्दनाक दिनों को याद नहीं करना चाहतीं, लेकिन उन दिनों को याद करती हैं जब कश्मीर में हालात सामान्य थे. उन्हें माता खीर भवानी के आशीर्वाद और केंद्र सरकार के वादों पर भरोसा है कि एक दिन उनका परिवार फिर से कश्मीर में बस सकेगा. उन्होंने बताया कि उनका परिवार श्रीनगर के हब्बा कदल इलाके में रहता था और आज भी जब वे मेले में आते हैं तो वापस लौटने का मन नहीं करता. उनका कहना है कि कश्मीर उनका अपना है और कश्मीरी पंडितों के बिना कश्मीर अधूरा है, इसलिए सरकार उन्हें उसी स्थान पर दोबारा बसाए जहां से वे विस्थापित हुए थे.

अन्य कश्मीरी पंडितों को भी घाटी लौटने के लिए किया जा रहा प्रेरित

ऐसा नहीं है कि केवल बुजुर्ग ही घर वापसी की उम्मीद लेकर आए हों. 30 वर्षीय आयुष, जो प्रधानमंत्री पुनर्वास योजना के तहत कुछ वर्ष पहले कश्मीर में सरकारी नौकरी पर आए थे, लगातार अन्य कश्मीरी पंडितों को भी घाटी लौटने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. उनका कहना है कि वे बदले हुए हालात और जमीनी सच्चाई से परिचित हैं तथा इस बार माता के जलकुंड के रंग को शुभ संकेत मानते हुए आशावान हैं कि सभी कश्मीरी पंडित एक दिन वापस लौटेंगे. उनके अनुसार कश्मीरी पंडित अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं और 1990 के आतंकवाद के दौर में भी यह यात्रा कभी पूरी तरह नहीं रुकी. उनका विश्वास है कि माता के आशीर्वाद से सब कुछ अच्छा होगा.

इस वर्ष माता खीर भवानी का मेला 22 और 23 जून को श्रीनगर से लगभग 35 किलोमीटर दूर गांदरबल जिले के तुलमुल्ला गांव स्थित मंदिर परिसर में आयोजित हुआ, जहां कई वर्षों बाद बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे. कश्मीरी पंडितों के लिए यह मंदिर अत्यंत आस्था का केंद्र है, जहां माता भवानी के जल स्वरूप की पूजा की जाती है. मान्यता है कि यहां स्थित पवित्र जल हनुमान जी लंका से अपने कमंडल में लाए थे और समय-समय पर इसके रंग में परिवर्तन होता रहता है.

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'आयोजन कश्मीरी पंडितों को उनकी जड़ों से जोड़ने का माध्यम'

अपने परिवार के साथ मेले में पहुंचीं नीरू त्राकरू का कहना है कि यह आयोजन कश्मीरी पंडितों को उनकी जड़ों से जोड़ने और नई पीढ़ी को अपनी विरासत से परिचित कराने का माध्यम है. उनका मानना है कि वापस आना संभव है, लेकिन बिना घर और बुनियादी सुविधाओं के स्थायी रूप से बसना कठिन है. उन्होंने सरकार से कम से कम एक छोटा घर, रसोई या थोड़ी सी जमीन उपलब्ध कराने की अपील की, ताकि वे अपने जीवन के अंतिम वर्ष शांति से अपने वतन में बिता सकें.

मंदिर के जलकुंड को लेकर भी कश्मीरी पंडितों में गहरी आस्था है. मान्यता है कि यदि जल का रंग काला या लाल हो तो कठिन समय या अनिष्ट का संकेत माना जाता है, जबकि हरा, सफेद या नीला रंग शुभ माना जाता है. इस बार जलकुंड का रंग सफेद बताया जा रहा है, जिसे सुख, शांति और विकास का प्रतीक माना जा रहा है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यह आने वाले समय में कश्मीर और वहां के सभी लोगों के लिए सकारात्मक संकेत है. कल्पना बांगरू ने भी कहा कि इस बार जल का रंग अच्छे दिनों का संदेश दे रहा है और माता सभी पर प्रसन्न हैं.

सरकार से अपेक्षाओं को लेकर कई श्रद्धालुओं में निराशा

हालांकि आस्था के साथ-साथ सरकार से अपेक्षाओं को लेकर कई श्रद्धालुओं में निराशा भी दिखाई देती है. बडगाम के काजीबाग से 1990 में विस्थापित होकर जम्मू पहुंचीं 55 वर्षीय अंजलि भट्ट का कहना है कि पिछले 35 वर्षों में किसी भी सरकार ने कश्मीरी पंडितों की स्थायी वापसी के लिए ठोस कदम नहीं उठाए. उनके अनुसार हर साल मेला लगता है, घर वापसी की बातें होती हैं, लेकिन आयोजन समाप्त होते ही मुद्दा ठंडे बस्ते में चला जाता है. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी अपेक्षा जताई कि यदि सरकार चाहे तो विस्थापित कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास की दिशा में प्रभावी कदम उठाए जा सकते हैं.

1990 से पहले इस मेले में लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते थे, लेकिन आतंकवाद के दौर में यहां आने वालों की संख्या काफी कम हो गई थी. पिछले कुछ वर्षों में एक बार फिर मेले में रौनक लौटने लगी है और इसके साथ कश्मीरी पंडितों की घर वापसी की चर्चा भी तेज हुई है. श्रीनगर निवासी रमेश कौल का कहना है कि अब नया हिंदुस्तान और नया कश्मीर बन रहा है, जहां शांति और विकास दिखाई देता है. उनका मानना है कि यदि सरकार चाहे तो विस्थापित कश्मीरी पंडितों को दोबारा बसाना भी संभव है.

पूजा में उपयोग वाली कई सामग्री स्थानीय मुस्लिम करते हैं तैयार

खीर भवानी मंदिर की एक और विशेषता यहां दिखाई देने वाली हिंदू-मुस्लिम एकता है. श्रद्धालुओं के अनुसार पूजा में उपयोग होने वाली कई सामग्री स्थानीय मुस्लिम समुदाय तैयार करता है और चढ़ावे के लिए लाया जाने वाला दूध भी उन्हीं के माध्यम से उपलब्ध कराया जाता है. मंदिर आने वाले कई भक्त आज भी कश्मीर में हिंदू और मुस्लिम समुदायों के साथ मिलकर शांतिपूर्ण जीवन जीने की इच्छा व्यक्त करते हैं. विस्थापित कश्मीरी रमेश टिकू का कहना है कि नया कश्मीर विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है और अधिकांश कश्मीरी मुसलमान भी शांति और प्रगति के साथ रहना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि कानून व्यवस्था मजबूत है और जो भी अशांति फैलाने की कोशिश करेगा, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी. उनके शब्दों में, 'यह नया हिंदुस्तान है और यहां शरारत करने वालों को सजा जरूर मिलेगी.'

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