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Chhattisgarh Election 2023: नारायणपुर विधानसभा सीट पर आज भी गूंज रहे ये मुद्दे, जानें- क्या हैं सियासी समीकरण और इतिहास

छत्तीसगढ़ का नारायणपुर विधानसभा काफी पिछड़ा हुआ क्षेत्र माना जाता है. छत्तीसगढ़ का अबुझमाड़ इसी विधानसभा में मौजूद है. यहां के ग्रामीण आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है

Chhattisgarh Election: छत्तीसगढ़ का नारायणपुर विधानसभा काफी पिछड़ा हुआ क्षेत्र माना जाता है. छत्तीसगढ़ का अबुझमाड़ इसी विधानसभा में मौजूद है. यहां के ग्रामीण आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है.

इस विधानसभा में नक्सलियों का पैंठ मजबूत होने की वजह से आज भी अबूझमाड़ के कई इलाके में प्रशासन की पहुँच नही है.  साल 2007  में 11 मई को नारायणपुर जिला का गठन किया  गया.  नारायणपुर बस्तर संभाग का ही एक जिला है, नारायणपुर शहर इस जिले का प्रशासनिक मुख्यालय है.  इस जिले के अंतर्गत 366 गांव आते है. जिले का क्षेत्रफल 20.98 कि.मी है. और यह जिला कोंडागाँव, अंतागढ़, और बीजापुर जिले से घिरा हुआ है.

इस विधानसभा में दो तहसील है नारायणपुर और ओरछा, आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र होने की वजह से नारायणपुर विधानसभा सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है, आदिवासियों की बहुसंख्या, प्राकृतिक संसाधनों और प्राकृतिक सुंदरता से  नारायणपुर पूरी तरह से  समृद्ध है.  यह जिला घने जंगल, पहाड़, नदियां, झरने, प्राकृतिक गुफाओं से घिरा हुआ है, यहां की आदिवासी  कला और संस्कृति बस्तरिया के मूल्यवान प्राचीन गुण हैं.

विधानसभा से जुड़े आंकड़े
नारायणपुर विधानसभा की जनसंख्या 1लाख 40 हजार 206 है, जिसमें पुरुष की संख्या  70 हजार 189 और महिला की संख्या 58 हजार379 है, वहीं  इस विधानसभा में 70% से ज्यादा आदिवासी लोग निवासरत है, जिनमें  गोंड जनजाति, माड़ीया, मुरिया, धुरवा, भत्रा, हलबा जनजाति मौजूद है. इस विधानसभा में कुल मतदाताओं की संख्या - 1 लाख 79 हजार 17 है.जिसमे महिला मतदाता - 92 हजार 154 और पुरुष मतदाता - 86 हजार 863 है. मतदान केन्द्र की संख्या - 262 है.

राजनीतिक इतिहास
नारायणपुर को साल 2007 में जिला का दर्जा प्राप्त हुआ और 2008 के विधानसभा चुनाव में नारायणपुर भानपुरी विधानसभा से अलग हुआ, इससे पहले नारायणपुर का इलाका भानपुरी विधानसभा में शामिल था, लेकिन 2008 के विधानसभा चुनाव में नारायणपुर अलग विधानसभा बनने से यहाँ से भाजपा के कद्दावर नेता कहे जाने वाले केदार कश्यप ने कांग्रेस के प्रत्याशी  रजनु नेताम को 21 हजार वोटों के अंतर से चुनाव हराया और इस सीट से चुनाव जीतकर केदार कश्यप भाजपा शासनकाल में पीएचई विभाग के मंत्री बनाए गए.

जिसके बाद 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा से प्रत्याशी केदार कश्यप को 54 हजार 874 वोट प्राप्त हुए , वही कांग्रेस के प्रत्याशी चंदन कश्यप को 42 हजार 74 वोट मिले थे, केदार कश्यप 12 हजार 800 वोटों के अंतर से चुनाव जीते, और दूसरे कार्यकाल में भी मंत्री रहे.. 2013 में कुल 6 प्रत्याशी मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे थे.


2018 विधानसभा चुनाव में बीजेपी से केदार कश्यप और  एक बार फिर कांग्रेस से चंदन कश्यप को टिकट मिला, कांग्रेस से चंदन कश्यप को 58 हजार 652 वोट मिले,भाजपा  से केदार कश्यप को  56 हजार 5 वोट मिले, चंदन कश्यप ने बीजेपी के प्रत्याशी केदार कश्यप को 2 हजार 647 वोटों से हराया ..2018 विधानसभा चुनाव में कुल 8 प्रत्याशी मैदान में उतरे थे.

राजनीति समीकरण
नारायणपुर विधानसभा 2008 के चुनाव  से 2018 के चुनाव तक दो बार भाजपा के विधायक और एक बार कांग्रेस  के प्रत्याशी ने इस सीट से चुनाव जीता, हालांकि  इस विधानसभा को भाजपा का गढ़ कहा जाता है, भाजपा शासनकाल में नारायणपुर जिले को शहरी इलाके में डवलप किया गया, स्ट्रक्चर निर्माण के साथ सड़कों का जाल बिछाया गया ,इसके अलावा नक्सलियों को बैकफुट लाने के लिए पुलिस कैंप खोले गए, वहीं नारायणपुर विधानसभा से भाजपा से दो बार चुनाव लड़े केदार कश्यप 2008  के विधानसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ में पीएचई मंत्री  बनाए गए.

 
2013 के चुनाव में भी केदार कश्यप स्कूल शिक्षा मंत्री बनाए गए
हालांकि 2018 के चुनाव  में मंत्री रहे केदार कश्यप  को हार का सामना करना पड़ा ,और  कांग्रेस के  चंदन कश्यप  चुनाव जीते और उन्हें वर्तमान में बस्तर हस्तशिल्प बोर्ड का अध्यक्ष भी बनाया गया है, वरिष्ठ पत्रकार और जानकार इमरान खान बताते हैं कि कांग्रेस के कार्यकाल में भी नारायणपुर विधानसभा के अबूझमाड़ में काफी काम हुए हैं यहां के किसानों को मसाहती पट्टा वितरण किया गया है ,वहीं  मोबाइल टावर और ओरछा जैसे इलाके में इंटरनेट की भी सुविधा दी गई है,

दोनों ही सरकारें नारायणपुर का विकास किया है, लेकिन नक्सलियो के बढ़ते गतिविधियों के चलते इस बार चुनाव लड़ने के साथ ही चुनाव जीतना काफी चुनौतीपूर्ण होगा, हर चुनाव में इस इलाके में भी चुनावी प्रचार प्रसार करना काफी चुनौतीपूर्ण होता है, हालांकि कुछ महीनों में होने वाले 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर होने की संभावना जताई जा रही है ,चूंकि अब तक  2008 में बीजेपी 2013 में बीजेपी और 2018 के चुनाव में कांग्रेस ने इस सीट से चुनाव जीता है, वहीं आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा कांग्रेस के प्रत्याशियों के बीच कांटे की टक्कर होने की संभावना जताई जा रही हैं ,और माना यह भी जा रहा है कि एक बार फिर से भाजपा से केदार कश्यप  और कांग्रेस से चंदन कश्यप को दोबारा टिकट दिया जा सकता है....

विधानसभा का इतिहास 
नारायणपुर विधानसभा को 2008 तक  भानपुरी विधानसभा के नाम से जाना जाता था , 2003 के विधानसभा चुनाव में नारायणपुर का इलाका भानपुरी विधानसभा के अंतर्गत था, 2003 के विधानसभा चुनाव में भानपुरी से केदार कश्यप ने चुनाव जीता था, जिसके बाद 2007 में नारायणपुर को जिला बनाया गया और 2008 में भानपुरी का इलाका  और नारायणपुर को मिलाकर विधानसभा बनाया गया.. इस विधानसभा में भी नक्सलवाद की जड़े काफी मजबूत है,  चुनाव के दौरान कई बार नक्सलियो ने बड़ी वारदातों को अंजाम  दिया है, भले ही नारायणपुर को नक्सलमुक्त करने साल दर साल सुरक्षा बलों के कैम्पो में इजाफा हुआ  है बावजूद इसके अबुझमाड़ का इलाका नक्सल समस्या से जूझ रहा है,  जानकार मनीष गुप्ता बताते हैं कि नारायणपुर के ग्रामीण इलाकों में  बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या  है, इसके अलावा अबुझमाड़ का इलाका आजादी के 75 साल भी मूलभूत समस्याओं से जूझ रहा है, पहुँच विहीन इलाको ने शिक्षा के साथ स्वास्थ्य सुविधाओं को बेपटरी कर रखा है....

स्थानीय मुद्दे 

1. नारायणपुर विधानसभा में सबसे बड़ा मुद्दा और समस्या धर्मांतरण का है ,आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र होने की वजह से यहां धर्मांतरण के मामले को लेकर हिंसात्मक  घटना हो चुकी है , यही वजह है कि भाजपा के वर्तमान जिला अध्यक्ष धर्मांतरण के मुद्दे पर  जेल में सजा काट रहे हैं, इस विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा भी धर्मांतरण है, वही आदिवासी समाज का  कहना है कि नारायणपुर  विधानसभा में लगातार धर्मांतरण के मामले बढ़ रहे हैं और सरकार भी इसे रोक पाने में नाकामयाब साबित हो रही है....

2. वही नारायणपुर विधानसभा में दूसरा सबसे बड़ा मुद्दा है बेरोजगारी, यहां के ग्रामीणों के लिए आय  का मुख्य साधन जंगलो में पाए जाने वाले वनोंपज है, जिसकी बिक्री कर यहां के रहवासी रोजमर्रा की जिंदगी जी रहे हैं, पूरे विधानसभा में एक भी फैक्ट्री और  बड़ी कंपनी नहीं है, लिहाजा नारायणपुर के शहरी इलाकों के साथ-साथ ग्रामीण अंचलों के लोग की  वनोपज पर ही आधारित है, हालांकि यहां के ग्रामीणों की स्किल डेवलपमेंट के लिए सरकार जरूर प्रयास कर रही है, लेकिन बेरोजगारी की समस्या बनी हुई है..

3. इसके अलावा नारायणपुर के अबूझमाड़ इलाके में मूलभूत सुविधाओं की कमी यहां की ग्रामीणों की सबसे बड़ी समस्या है, बारिश के मौसम में अंदरूनी ग्रामीण अंचलों के लोग शहरी इलाकों से पूरी तरह से कट जाते हैं, अबूझमाड़ इलाके  में ना ही  नदी पर पुल बना है और ना ही सड़क और ना ही इन गांवो तक बिजली पहुंची है,  लिहाजा आजादी के 75 साल बाद भी यहां के ग्रामीण मूलभूत  सुविधा नहीं होने से कई समस्याओं से जूझ रहे हैं..

4.इसके अलावा आजादी के 75 साल बाद भी नारायणपुर के अबूझमाड़ इलाके में सर्वे का काम नहीं हो पाया है, इस क्षेत्र की कितनी आबादी है इसकी भी जानकारी प्रशासन के पास नहीं है ,यहां के ग्रामीणों को स्वास्थ सुविधाओं के लिए करीब 40 किलोमीटर पैदल चलकर नारायणपुर शहर आना पड़ता है.

5. ग्रामीण क्षेत्रों के अलावा शहरी क्षेत्रों में भी कई मुद्दे हैं, क्षेत्रवासियों का कहना है कि जिला बने 16 साल बीत चुके हैं लेकिन जिस तरह से नारायणपुर शहर का विकास होना है वैसा नहीं हो पाया है, शहरी क्षेत्रों में भी सड़क, बिजली ,पेयजल की समस्या बनी हुई है ,यही नहीं सड़कों के चौड़ीकरण का काम सालो से रुका हुआ है, इसके अलावा लंबे समय से तहसीलो को बढ़ाने  की मांग की जा रही है, लेकिन इस जिले में केवल दो तहसील हैं और इन दोनों तहसीलो में विकास का  काम ठप है.

यह भी पढ़े: Chhattisgarh Election 2023: छत्तीसगढ़ में किसके चेहरे पर चुनाव लडे़गी बीजेपी और कांग्रेस? हो गया फैसला! जानें- किस पर लगेगा दांव

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