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कोरोना वायरस: बिहार के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकता है संक्रमण, सीएम नीतीश ने प्रधानमंत्री से मांगी मदद

बिहार में जानलेवा कोरोना वायरस का प्रसार तेज़ी से फैल रहा है. इसे लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पीएम मोदी से मदद मांगी है.

पटनाः जनसंख्या की दृष्टि से बिहार भारत का तीसरा सबसे बड़ा राज्य है. राज्य का जनसंख्या घनत्व 1102 है जो कि राष्ट्रीय औसत 382 की तुलना में काफी अधिक है. जनसंख्या घनत्व अधिक होने के कारण महामारी से निपटने में और ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही है. इस बात को आज खुद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पीएम नरेन्द्र मोदी के साथ हुए कांफ्रेंस में कहा.

जनसख्या घनत्व के साथ राज्य के सामाजिक-आर्थिक संकेतक कमजोर बने हुए हैं और स्वास्थ्य ढांचा सीमित है. डब्ल्यूएचओ के अनुसार हर 1,000 व्यक्ति पर एक डॉक्टर होना चाहिए जबकि बिहार में प्रति 1,000 लोगों पर 0.39 डॉक्टर उपलब्ध है और केवल 0.11 बेड. सबसे कम डॉक्टर-मरीज अनुपात और प्रति रोगी अस्पताल के कम से कम बेड की वजह से बिहार कोविड-19 संकट से निपटने के लिए बुरी स्थिति में है.

82 हजार से ज्यादा संक्रमित

जुलाई माह में बिहार में कोरोना संक्रमण के मामले तेजी से बढ़े हैं, अब तक राज्य में 82 हजार 741 कोरोना पॉजिटिव मरीज हैं जिनमें एक्टिव मरीज 28 हजार 151 हैं, 54 हजार 139 मरीज स्वस्थ होकर अपने घर जा जा चुके हैं. अब तक 450 लोगों की मौत हो चुकी है. राज्य का रिकवरी रेट 65.43 प्रतिशत है. पहले से जांच की संख्या अधिक होने से पॉजिटिव केसेज 7.5 प्रतिशत से घटकर 5 प्रतिशत पर आ गए हैं. राज्य का मृत्यु दर 0.54 प्रतिशत है. अब तक कुल 10 लाख 97 हजार 252 लोगों के कोरोना संक्रमण की जांच की जा चुकी है.

जिस तरह से महामारी बिहार में फैल रही है, ये चिंता का समय है. बिहार ने 14.7 दिनों का दोहरीकरण रिकॉर्ड किया है जबकि राष्ट्रीय औसत 23.6 दिन है. ऐसी बातें लगातार सामने आ रही हैं कि जो लोग परीक्षण में पॉजिटिव आए हैं, उन्हें अस्पताल में बेड खोजने के लिए संघर्ष करना पड़ा है; जिन आम लोगों में गंभीर लक्षण विकसित हुए हैं, वे मेडिकल सुविधा तक पहुंचने में असमर्थ हैं, उन्हें समय पर वेंटिलेटर नहीं प्राप्त हो पाया या प्लाज्मा दान नहीं प्राप्त कर पाए.

सुरक्षा नियमों का पालन नहीं कर रहे लोग

इसके साथ सबसे बड़ी चुनौती ये आ रही है कि लोग भी कोरोना से सुरक्षा के नियम का गंभीरता से पालन नहीं कर रहे. एक और बड़ी बात ये है कि स्वयं स्वास्थ्य कर्मी भी संक्रमित होने के डर से कई बार सही सेवा नहीं प्रदान कर पा रहे. साथ ही कांटेक्ट ट्रेसिंग की प्रक्रिया बहुत हद तक सीमित है.

हालांकि हाल के दिनों में इसमें कुछ हद तक सुधार हुआ है और टेस्टिंग की संख्या बढ़ाई गई है. सरकार ने स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव को बदला है और कोविड प्रबंधन को उच्च प्राथमिकता दी है पर प्राप्त रिपोर्ट और आंकड़े चेतावनी की घंटी बजाते हैं.

ये कहा जा रहा है कि बिहार में देश में सबसे कम परीक्षण दर है - प्रति मिलियन लोगों पर 7,917 परीक्षण जबकि राष्ट्रीय औसत 18,086 है. अन्य राज्यों की तरह, बिहार आरटी-पीसीआर परीक्षणों के बजाय एंटीजन परीक्षणों में लगा है. आरटीपीसीआर संक्रमण पहचानने का एक अधिक सटीक तरीका है.

कोरोना संक्रमण जांच की संख्या में लगातार इजाफा

बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे कहते हैं कि पूरे देश में बिहार, यूपी के बाद दूसरा सबसे ज्यादा प्रतिदिन टेस्टिंग कराने वाला राज्य बना है. वे बताते हैं कि नए आने वाले कोरोना संक्रमण के मामलों में 24 फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की गई है.

आज प्रधानमंत्री द्वारा कोविड-19 की अद्यतन स्थिति को लेकर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से हुई समीक्षा बैठक में सीएम नीतीश कुमार ने कहा कि सरकार प्रतिदिन कोरोना संक्रमण जांच की संख्या बढ़ाने के लिए लगातार काम कर रही है. अब प्रतिदिन 75 हजार 346 जांच की जा रही है. 6100 जांच आरटीपीसीआर मशीन द्वारा की जा रही है, जिसमें सरकारी जांच केन्द्रों पर 4900 और निजी जांच केन्द्रों पर 1200 जांच किए जा रहे हैं. 4400 जांच ट्रू-नेट मशीन द्वारा की जा रही है और 65 हजार जांच रैपिड एंटीजन किट्स के द्वारा की जा रही है.

उन्होंने कहा कि प्राइमरी हेल्थ सेंटर तक जांच की व्यवस्था की गई है. सभी कंटेनमेंट जोन में 100 प्रतिशत जांच करायी जा रही है. बाढ़ राहत केन्द्रों और सामुदायिक रसोइ केन्द्रों पर भी सभी लोगों की कोरोना संक्रमण की जांच करायी जा रही है.

सरकारी मेडिकल कॉलेजों में आरटीपीसीआर जांच की व्यवस्था 

5 सरकारी मेडिकल कॉलेजों में आरटीपीसीआर जांच की व्यवस्था की जा रही है, जिससे जांच की संख्या 2300 और बढ़ जाएगी. शीघ्र ही 10 आरटीपीसीआर मशीन और आरएन एक्सट्रक्टर मशीन की खरीद की जाएगी, जिससे 5 हजार जांच की क्षमता और बढ़ेगी. उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि दो कोवास-8800 मशीन बिहार को उपलब्ध करायी जाये जिससे प्रतिदिन जांच की संख्या 7200 और बढ़ जायेगी.

इस तरह आरटीपीसीआर जांच 20 हजार 600 प्रतिदिन कर पाएंगे. उन्होंने कहा कि 10 लीटर अथवा अधिक की क्षमता वाले 5000 ऑक्सीजन कान्सेन्ट्रेटर की आपूर्ति की जाये जिससे ऑक्सीजन युक्त बेडों की संख्या शीघ्र बढ़ायी जा सके. केन्द्र सरकार से यह भी आग्रह किया कि 3000 हाई फ्लो नेजल कैनुला उपलब्ध करायी जाए जिससे गंभीर लक्षण वाले मरीजों को भी ऑक्सीजन की उपलब्धता आसानी से हो सके. इससे मरीजों को 40-60 लीटर प्रति मिनट ऑक्सीजन दिया जा सकता है.

प्रतिदिन 1 लाख से अधिक कोरोना संक्रमण की जांच का लक्ष्य

मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार का लक्ष्य प्रतिदिन 1 लाख से अधिक कोरोना संक्रमण की जांच का है. बिहार में हम सभी लोगों की टेस्टिंग कराना चाहते हैं, जिससे कोरोना संक्रमितों की पहचान कर उनका बचाव किया जा सके. मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए त्रि-स्तरीय इलाज की व्यवस्था की गई है. 310 कोविड केयर सेंटर, 150 डेडिकेटेड कोविड हेल्थ सेंटर और 10 मेडिकल कॉलेजों में डेडिकेटेड कोविड हेल्थ अस्पताल कार्यरत हैं.

अभी 32 हजार 124 बेड उपलब्ध हैं, जिनकी संख्या बढ़ाकर 70 हजार करने की कोशिश की जा रही है. 10 हजार 482 ऑक्सीजन युक्त बेड उपलब्ध हैं, जिसमें 2482 ऑक्सीजन गैस पाइप के माध्यम से तथा 8 हजार ऑक्सीजन सिलिंडर के माध्यम से बेडों तक ऑक्सीजन की आपूर्ति की जा रही है. पीएम केयर फंड के माध्यम से 500 बेड के दो कोविड अस्पतालों का निमार्ण पटना के पास बिहटा और मुजफ्फरपुर में कराया जा रहा है.

निःशुल्क मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध करायी जा रहीः नीतीश कुमार

मुख्यमंत्री ने कहा कि होम आइसोलेशन में रहने वाले लोगों को निःशुल्क मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध करायी जा रही हैं. उन्हें टेली मेडिसिन और मेडिकल किट्स भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं. कॉल सेंटर के माध्यम से मरीजों के दैनिक स्वास्थ्य की जानकारी ली जा रही है. मुख्यमंत्री ने ये भी कहा कि कोरोना संक्रमण पूरी दुनिया में फैला हुआ है और ये कब तक चलेगा यह कहा नहीं जा सकता है.

ऐसे में बिहार को महामारी से निपटने के लिए उपलब्ध एकमात्र सफल मॉडल का पालन करना चाहिए. परीक्षण बढ़ाएँ, संक्रमित और उनके संपर्कों को सख्ती से ट्रेस करें; संक्रमित लोगों को अलग करें और उनका इलाज करें; स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे में सुधार; और सामजिक दूरी के नियमों का सख्ती से पालन. 65 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के लोगों, 10 वर्ष से कम उम्र के बच्चे-बच्चियों, गर्भवती महिलाओ एवं अन्य गंभीर बीमारी से ग्रस्त व्यक्तियों को जरुरी होने पर ही बाहर निकलने की सलाह दी जा रही है अन्यथा उन्हें घर में ही रहने को कहा जा रहा है.

स्वास्थ्य विभाग के 2018-19 के वार्षिक प्रतिवेदन में इस बात का जिक्र है कि राज्य में स्वास्थ्य सम्बन्धी नए भवनों की परम आवश्यकता है. यह लिखा है कि: “स्वास्थ्य विभाग के प्रयास से एवं भवन निर्माण विभाग, बिहार राज्य भवन निर्माण निगम, बिहार चिकित्सा सेवाएं एवं आधारभूत संरचना निगम लिमिटेड, टीसीआइएल इत्यादि के सहयोग से आधारभूत संरचना में सुधर आया है, परन्तु अभी भी बहुत आगे जाने की आवश्यकता है, ताकि निर्धारित मानकों के अनुरूप स्वास्थ्य संबंधी संरचनाओं का निर्माण किया जा सके एवं स्वास्थ्य सुविधाएं जन-जन उपलब्ध कराया जा सके.”

सरकार खुद ही मान रही है कि उसकी स्वास्थ्य अधिसंरचना कितनी कमजोर है ऐसे में भयावह महामारी से लड़ने की उसकी तैयारी तो सवालों के घेरे में होगी ही.

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