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यूपी: 'गुमनामी बाबा' वास्तव में सुभाष चंद्र बोस थे, यह निश्चित नहीं- जांच आयोग

साल 2016 में अखिलेश सरकार के दौरान बने कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि बाबा और नेता जी के बीच कथित तौर पर कुछ समानताएं थीं. नेता जी की तरह ही गुमनामी बाबा भी इंग्लिश, हिंदी और बंगाली पर बेहतरीन पकड़ रखते थे.

लखनऊ: फैजाबाद के गुमनामी बाबा ही वास्तव में सुभाष चंद्र बोस थे या नहीं इस विवाद पर अब विराम लगने वाला है. रहस्यमयी 'गुमनामी बाबा' पर आई न्यायाधीश विष्णु सहाय आयोग की रिपोर्ट को मंगलवार को उत्तर प्रदेश कैबिनेट के सामने पेश किया गया. इसमें कहा गया है कि ऐसा लोकमत है कि वह सुभाष चंद्र बोस थे, लेकिन वास्तव में यह सुनिश्चित करना मुश्किल है कि वे वही थे या नहीं.

उत्तर प्रदेश विधानसभा में पेश किए गए 2016 में गठित आयोग के निष्कर्ष के अनुसार, कथित तौर पर बोस और बाबा के बीच केवल कुछ समानताएं हैं.

इसमें उल्लेख किया गया है कि अंग्रेजी, बंगाली और हिंदी भाषा, जिनके बोस अच्छे जानकार थे, और नेताजी पर लिखी गई किताबें और नेताजी के पसंदीदा लेखकों की किताबों को छोड़कर वहां अन्य चीजें मिली हैं.

सूत्र ने बताया कि रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि गुमनामी बाबा भी इन तीनों भाषाओं के अच्छे जानकार और प्रभावशाली व्यक्ति थे, जिनसे लोग मिलने आते थे.

सूत्र ने कहा, "रिपोर्ट के अनुसार, गुमनामी बाबा अपने फैजाबाद के घर में तब तक रहे, जब तक कि उनके सुभाष चंद्र बोस होने की अफवाहें नहीं उड़ी थी. इसके बाद उन्होंने वह स्थान छोड़ दिया. रिपोर्ट में गुमनामी बाबा के संगीत और सिगार के प्रति प्रेम का भी उल्लेख किया गया है."

इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्देश पर 2016 में समाजवादी पार्टी सरकार द्वारा न्यायाधीश विष्णु सहाय को रिपोर्ट बनाने के लिए नियुक्त किया गया था. अदालत के इस आदेश के पीछे की वजह एक जनहित याचिका थी, जिसमें याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि गुमनामी बाबा ही सुभाष चंद्र बोस थे.

न्यायमूर्ति विष्णु सहाय ने पहले संवाददाताओं को बताया था कि उन्होंने अब तक जिन लोगों का साक्षात्कार लिया था, वे पूर्वकल्पित धारणा के साथ आए थे कि गुमनामी बाबा ही वास्तव में बोस थे.

हालांकि, उन्होंने बताया कि चूंकि 1985 में बाबा की मृत्यु हो चुकी थी और गवाहों ने सिर्फ 2016 और 2017 में अपने बयान दर्ज कराए थे, ऐसे में विश्वसनीय साक्ष्यों को इकट्ठा करना एक चुनौती है.

गुमनामी बाबा पूरे उत्तर प्रदेश में काफी लोकप्रिय थे और वे राज्य के विभिन्न हिस्सों में बहुत ही गोपनीयता के साथ रहते थे. वह ज्यादातर पर्दे के पीछे रहते थे.

उनके मरने के बाद, जब उनके कमरे की तलाशी ली गई तो वहां सैकड़ों चीजे पाई गईं, जिसमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण उनके पत्राचार और लेख थे.

इनमें बहुत सी चीजें सुभाष चंद्र बोस और स्वतंत्रता से पहले उनके जानने वाले लोगों से जुड़ी थीं. उस समय उनके कई अनुयायी मीडिया से मुखातिब हुए और उन्होंने अपनी जानकारी और ज्ञान के अनुसार बाबा को ही सुभाष चंद्र बोस बताया. उन्होंने उनके आदेश पर अपना मुंह बंद कर रखा था.

मामले में अस्थिरता तब ज्यादा आ गई जब सुभाष चंद्र बोस की भतीजी ललिता बोस फैजाबाद पहुंचीं, जहां उस पवित्र व्यक्ति ने आखिरी सांस ली थी और व्यक्तिगत जांच में पाया कि वह उनके चाचा ही थे.

ललिता बोस ने राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह को उचित जांच के आदेश देने के लिए मनाने की कोशिश की, लेकिन कहा जाता है कि मुख्यमंत्री ने उनसे कहा था कि मामला उनके हाथ में नहीं है.

इसके बाद ललिता और दो नागरिकों ने प्रसिद्ध वकील रॉबिन मित्रा के जरिए इलाहाबाद हाई कोर्ट में मुकदमा दायर किया.

हालांकि, 2013 में जांच का आदेश मिला. इसके तीन साल बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पैरवी के बाद न्यायधीश विष्णु सहाय की अध्यक्षता में एक जांच आयोग का गठन किया गया.

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