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महिलाओं को ‘पैर की जूती’ समझने वाले ही तीन तलाक के पक्ष में: साध्वी निरंजन ज्योति

लखनऊ: केन्द्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने आज कहा कि महिलाओं को ‘पैर की जूती’ समझने वाले लोग ही तीन तलाक के पक्ष में है जबकि बीजेपी ऐसी अमानवीय क्रूर परंपराओं के खिलाफ है.

प्रतीकात्मक तस्वीर प्रतीकात्मक तस्वीर

कोई भी पर्सनल लॉ संविधान के ऊपर नहीं

साध्वी ने बीजेपी की परिवर्तन यात्रा के तहत बदायूं में कहा, ‘‘भारतीय जनता पार्टी तीन तलाक और हलाला जैसी महिला विरोधी कुप्रथाओं के विरूद्घ है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया है. कोर्ट ने कहा है कि यह मुस्लिम महिलाओं के प्रति क्रूरता है तथा कोई भी पर्सनल लॉ संविधान के ऊपर नहीं है.’’

उन्होंने कहा, ‘‘बीजेपी शुरू से ही मुस्लिम बहनों को न्याय दिलाने के लिए प्रतिबद्घ है. बीजेपी हाईकोर्ट द्वारा दी गई राय के साथ में है. महिलाओं को पैर की जूती समझने वाले लोग तीन तलाक के पक्ष में है. बीजेपी का तीन तलाक और हलाला जैसी अमानवीय क्रूर परम्पराओं के विरूद्घ स्पष्ट विचार हैं.’’

मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में या पर्सनल लॉ बोर्ड के

बीजेपी के प्रदेश मीडिया प्रभारी हरिश्चंद्र श्रीवास्तव के मुताबिक साध्वी ने कहा कि एसपी-बीएसपी-कांग्रेस को भी तुष्टीकरण की राजनीति छोडकर इस विषय पर स्पष्ट नीति के साथ सामने आना चाहिए कि वह मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में है या पर्सनल लॉ बोर्ड के.

केन्द्रीय मंत्री संतोष गंगवार ने मीरगंज विधानसभा क्षेत्र में विरोधी दलों पर हमला बोलते हुए कहा कि 15 साल से प्रदेश की जनता धोखा खा रही है. पहले टिकट बेचे जाते हैं, फिर जनता को सपने बेचे जाते हैं. ठगों से प्रदेश को मुक्त कराने के लिए ही परिवर्तन यात्रा हो रही है.

महिलाओं को ‘पैर की जूती’ समझने वाले ही तीन तलाक के पक्ष में: साध्वी निरंजन ज्योति

मुस्लिम महिला लॉ बोर्ड ने किया तीन तलाक पर कोर्ट की टिप्पणी का स्वागत

सरकार और ऑल इंडिया मुस्लिम वुमन पर्सनल लॉ बोर्ड ने आज तीन तलाक पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी को स्वागत योग्य कदम बताकर उसकी सराहना की, वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इसे खारिज करते हुए कहा कि हाईतम कोर्ट अंतिम फैसला सुनाएगा. ‘तीन तलाक’ पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी की सराहना करते हुए बीजेपी ने आज कहा कि मुद्दे पर उसके रख की पुष्टि हुई है और इस प्रथा का समर्थन कर रहे राजनैतिक दलों से कहा कि ‘‘वे समाज को धर्म के नाम पर बांटने से बचें.’’

बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव सिद्धार्थ नाथ सिंह ने कहा, ‘‘लैंगिक समानता की बीजेपी की विचारधारा की कोर्ट की टिप्पणी से पुष्टि होती है जिसने तीन तलाक को असंवैधानिक और महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन बताया है. एक प्रगतिशील समाज को प्रतिगामी धार्मिक प्रथा पर नहीं छोड़ा जा सकता.’’

उन्होंने कहा, ‘‘बीजेपी कोर्ट के फैसले का स्वागत करती है और उन राजनैतिक दलों को भी चेतावनी देती है जिन्होंने अपने राजनैतिक फायदे के लिए तीन तलाक का समर्थन किया है. उनके लिए समय आ गया है कि वे धर्म के नाम पर समाज को बांटने से बचें. कोई भी पर्सनल लॉ संविधान द्वारा व्यक्ति को प्रदत्त अधिकारों पर प्रभावी होने का दावा नहीं कर सकता.’’

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शाह बानो मामले की राह पर नहीं जाना चाहिए तीन तलाक का मुद्दा

शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने आगाह किया कि तीन तलाक का मुद्दा वोट बैंक की राजनीति की वजह से शाह बानो मामले की राह पर नहीं जाना चाहिए. ठाकरे ने कहा कि टिप्पणी का सम्मान किया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा, ‘‘इसका देश के लिए काफी महत्व है. वोट बैंक की राजनीति की वजह से मुद्दे (तीन तलाक) को शाह बानो मामले की राह नहीं बढ़ना चाहिए.’’ टिप्पणी का स्वागत करते हुए सूचना एवं प्रसारण मंत्री एम वेंकैया नायडू ने कहा कि महिलाओं को न्याय मिलना चाहिए और हर कोई इसपर सहमत है.

ऑल इंडिया मुस्लिम वुमन पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर ने इससे पहले समान नागरिक संहिता पर आपत्ति जताई थी. हालांकि, आज उन्होंने कहा कि तीन तलाक की प्रथा अनुचित है. उन्होंने कहा, ‘‘यह एक अत्याचार है--अल्लाह का कोई भी कानून अत्याचार बर्दाश्त नहीं करता है.’’

महिलाओं के मनोबल को ऊपर उठाने में मदद

अंबर ने उम्मीद जताई कि मुस्लिम महिलाएं संविधान के साथ-साथ इस्लामिक कानूनों के आधार पर न्याय पाएंगी. महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा राज ने कहा, ‘‘कोई भी महिलाओं की व्यथा को नहीं समझता. आज हाईकोर्ट ने स्वागत योग्य कदम उठाया है. यह महिलाओं के मनोबल को ऊपर उठाने में मदद करेगा.’’ हालांकि, एआईएमपीएलबी ने लगता है कि हाईकोर्ट की टिप्पणी को खारिज कर दिया है.

इसके सदस्य कमाल फारूकी ने कहा कि तीन तलाक का मामला पहले ही सुप्रीम कोर्ट के समक्ष है ‘‘इसलिए वह फैसला होगा.’’ उन्होंने कहा कि तीन तलाक का मुद्दा सिर्फ मुस्लिमों तक सीमित नहीं है. उन्होंने कहा, ‘‘यह उन सभी धार्मिक इकाइयों का सवाल है जिन्हें संविधान के तहत अपनी आस्था और धर्म का पालन करने का अधिकार दिया गया है.’’

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बिना किसी भेदभाव के किया जाना चाहिए महिलाओं के साथ न्याय

केंद्रीय मंत्री नायडू ने कहा कि संविधान सर्वोच्च है और देश की महिलाओं के साथ न्याय बिना किसी भेदभाव के किया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा, ‘‘यह स्थापित कानून है. संविधान सर्वोच्च है. धर्म एक मान्यता है. संविधान के तहत बनाए गए कानून का सबको पालन करना चाहिए. मैं हाईकोर्ट की टिप्पणी से आह्लादित महसूस कर रहा हूं. मैं खुश हूं क्योंकि देश की महिलाओं के साथ न्याय होना चाहिए और कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए.’’

गृह राज्य मंत्री किरण रिजीजू ने कहा कि यह ‘‘टिप्पणी स्वागत योग्य’’ है.

जदयू प्रवक्ता के सी त्यागी ने हाईकोर्ट की टिप्पणी का स्वागत करते हुए सरकार को इसके आलोक में समान नागरिक संहिता लाने के प्रति आगाह किया. त्यागी ने कहा, ‘‘हम कोर्ट की टिप्पणी का सम्मान करते हैं. कोई भी धार्मिक मान्यता संविधान के उपर नहीं है. लेकिन हमारा संविधान हमें हमारे धर्म के अनुसार अपने धार्मिक रस्म का पालन करने की अनुमति देता है. हम इसका सम्मान करते हैं और तीन तलाक के आलोक में हम सरकार को चेतावनी देते हैं कि वे अल्पसंख्यक समुदाय पर समान नागरिक संहिता को नहीं थोपें.’’

अन्याय है महिलाओं और पुरुषों के बीच भेदभाव

बीजेपी सांसद साक्षी महाराज ने कहा कि भारत सबसे बड़ा लोकतंत्र है और महिलाओं और पुरुषों के बीच भेदभाव अन्याय है. उन्होंने कहा, ‘‘मैं हाईकोर्ट के प्रति आभार प्रकट करना चाहता हूं कि उसने इस तरह की टिप्पणी की है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा है कि तीन तलाक का अंत करने का समय आ गया है. मेरा मानना है कि किसी भी परिस्थिति में तलाक, तलाक, तलाक बोलना और तलाक हासिल करना स्वीकार्य नहीं है.’’ यह पूछे जाने पर कि क्या यह राजनैतिक मुद्दा बनेगा, उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी इसे राजनैतिक मुद्दा नहीं बनाना चाहती क्योंकि उसका उद्देश्य ‘सबका साथ, सबका विकास’ है.

बीजेपी सांसद मीनाक्षी लेखी ने कहा कि यह ‘शानदार’ टिप्पणी है और इस बात पर गौर किया कि लड़ाई मुस्लिम समुदाय की कुछ महिलाएं लड़ रही हैं, जो तीन तलाक के खिलाफ हैं.

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मुस्लिम महिला कार्यकर्ताओं ने किया इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का स्वागत

देश में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की पैरोकारी करने वाली प्रमुख कार्यकर्ताओं ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले का स्वागत किया जिसमें कोर्ट ने मुस्लिम समाज में मौजूद तीन तलाक की प्रथा को ‘नृशंस’ और ‘अपमानजनक’ करार दिया है.

भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सह-संस्थापक जकिया सोमान ने कहा, ‘‘हम इस आदेश का स्वागत करते हैं. तीन तलाक न सिर्फ असंवैधानिक है, बल्कि कुरान के खिलाफ भी है. इसे हर हाल में खत्म किया जाना चाहिए.’’ उन्होंने कहा, ‘‘हम हमेशा से कहते आ रहे हैं कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड मनमाने ढंग से काम करने वाली पुरूषवादी संस्था है जो अनुचित प्रथा और परंपराओं को संरक्षण दे रही है. यह बोर्ड मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं करता.’’

मुस्लिम महिला अधिकार कार्यकर्ता और स्तंभकार नाइश हसन ने कहा, ‘‘यह फैसला स्वागत योग्य है और मुस्लिम महिलाओं की आवाज को मजबूती देने वाला है. हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि कोई समाज संविधान और कानून से चलेगा, न कि पर्सनल लॉ बोर्ड से. हाईकोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं को संघर्ष की ताकत दी है.’’ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि इस तरह से ‘‘तुरंत तलाक’’ देना ‘‘नृशंस’’ और ‘‘सबसे ज्यादा अपमानजनक’’ है जो ‘‘भारत को एक राष्ट्र बनाने में ‘बाधक’ और पीछे ढकेलने वाला है.’’ न्यायमूर्ति सुनीत कुमार की एकल पीठ ने पिछले महीने अपने फैसले में कहा, ‘‘भारत में मुस्लिम कानून पैगम्बर या पवित्र कुरान की भावना के विपरीत है और यही भ्रांति पत्नी को तलाक देने के कानून का क्षरण करती है.’’

तीन बार तलाक कहना ‘‘क्रूरता’’ है: हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने टिप्पणी की है कि तीन बार तलाक कहना ‘‘क्रूरता’’ है और इससे न्यायिक अंतरात्मा ‘‘परेशान’’ है. कोर्ट ने पूछा कि क्या मुस्लिम महिलाओं की यातना खत्म करने के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ में संशोधन किया जा सकता है. इस प्रथा पर प्रहार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा है कि इस तरह से ‘‘तुरंत तलाक’’ देना ‘‘सबसे ज्यादा अपमानजनक’’ है जो ‘‘भारत को एक राष्ट्र बनाने में ‘बाधक’ और पीछे ढकेलने वाला है.’’

न्यायमूर्ति सुनीत कुमार की एकल पीठ ने पिछले महीने अपने फैसले में कहा, ‘‘जो सवाल कोर्ट को परेशान करता है वह यह है कि क्या मुस्लिम पत्नियों को हमेशा इस तरह की स्वेच्छाचारिता से पीड़ित रहना चाहिए? क्या उनका निजी कानून इन दुर्भाग्यपूर्ण पत्नियों के प्रति इतना कठोर रहना चाहिए? क्या इन यातनाओं को खत्म करने के लिए निजी कानून में उचित संशोधन नहीं होना चाहिए? न्यायिक अंतरात्मा इस विद्रूपता से परेशान है.’’

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उन्होंने कहा, ‘‘भारत में मुस्लिम कानून पैगम्बर या पवित्र कुरान की भावना के विपरीत है और यही भ्रांति पत्नी को तलाक देने के कानून का क्षरण करती है.’’ कोर्ट ने टिप्पणी की, ‘‘आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष देश में कानून का उद्देश्य सामाजिक बदलाव लाना है. भारतीय आबादी का बड़ा हिस्सा मुस्लिम समुदाय है, इसलिए नागरिकों का बड़ा हिस्सा और खासकर महिलाओं को निजी कानून की आड़ में पुरानी रीतियों और सामाजिक प्रथाओं के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता.’’

भारत के एक सफल देश बनने में बाधा

कोर्ट ने कहा, ‘‘भारत प्रगतिशील राष्ट्र है, भौगोलिक सीमाएं ही किसी देश की परिभाषा तय नहीं करतीं. इसका आकलन मानव विकास सूचकांक सहित कई अन्य पैमाने पर किया जाता है जिसमें समाज द्वारा महिलाओं के साथ होने वाला आचरण भी शामिल है. इतनी बड़ी आबादी को निजी कानून के मनमानेपन पर छोड़ना प्रतिगामी है, समाज और देश के हित में नहीं है. यह भारत के एक सफल देश बनने में बाधा है और पीछे की तरफ धकेलता है.’’

कोर्ट ने कहा, ‘‘इस्लाम में तलाक केवल अति आपात स्थिति में ही देने की अनुमति है. जब मेल..मिलाप के सारे प्रयास विफल हो जाते हैं तो दोनों पक्ष तलाक या खोला के माध्यम से शादी खत्म करने की प्रक्रिया की तरफ बढ़ते हैं.’’ कोर्ट ने पांच नवम्बर को दिए गए फैसले में कहा, ‘‘मुस्लिम पति को स्वेच्छाचारिता से, एकतरफा तुरंत तलाक देने की शक्ति की धारणा इस्लामिक रीतियों के मुताबिक नहीं है. यह आम तौर पर भ्रम है कि मुस्लिम पति के पास कुरान के कानून के तहत शादी को खत्म करने की स्वच्छंद ताकत है.’’

कोर्ट ने कहा, ‘‘पूरा कुरान पत्नी को तब तक तलाक देने के बहाने से व्यक्ति को मना करता है जब तक वह विश्वासनीय और पति की आज्ञा का पालन करती है.’’ इसने कहा, ‘‘इस्लामिक कानून व्यक्ति को मुख्य रूप से शादी तब खत्म करने की इजाजत देता है जब पत्नी का चरित्र खराब हो, जिससे शादीशुदा जिंदगी में नाखुशी आती है. लेकिन गंभीर कारण नहीं हों तो कोई भी व्यक्ति तलाक को उचित नहीं ठहरा सकता चाहे वह धर्म की आड़ लेना चाहे या कानून की.’’ कोर्ट ने 23 सालीय महिला हिना और उम्र में उससे 30 साल बड़े पति की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की.

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