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चुनाव में बीजेपी की पसमांदा स्ट्रैटजी पर कहीं पलीता न लगा दे सच्चर रिपोर्ट का दांव?

संसद में सच्चर कमेटी की सिफारिश को लागू करने की मांग को लेकर एक प्राइवेट बिल लाया गया है. सांसद अब्दुल वहाब ने कहा कि सबका साथ और सबका विकास तभी होगा, जब सच्चर कमेटी की रिपोर्ट लागू की जाएगी.

चुनावों से बीजेपी पसमांदा मुसलमानों के मुद्दे उठाकर विपक्ष को हैरान कर दिया है. यूपी में यह दांव कारगर रहा तो बीजेपी का प्रदेश में लोकसभा की सभी 80 सीटें जीतने के ख्वाब पूरा हो सकता है. लेकिन इस बीच सच्चर कमेटी की रिपोर्ट लागू करने की मांग विपक्ष की ओर से चली गई है. यह मांग बीजेपी की पसमांदा स्ट्रैटजी में पलीता लगा सकती है. 

बजट के पहले सत्र के दौरान एक ओर राष्ट्रपति के अभिभाषण पर संसद के भीतर खूब हंगामा हुआ. वहीं दूसरी ओर राज्यसभा में पेश एक प्राइवेट बिल भी सुर्खियों में है. यह प्राइवेट बिल सच्चर कमेटी की सिफारिश को लागू करने के संबंध में है.

ऊपरी सदन में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के सांसद अब्दुल वहाब ने प्राइवेट बिल के जरिए सच्चर कमेटी की सिफारिश लागू करने की मांग की है. कांग्रेस, सीपीएम, राजद और तृणमूल ने भी वहाब का समर्थन करते हुए सिफारिश को लागू करने के लिए एक कमेटी बनाने पर जोर दिया. 

विपक्ष का तर्क है कि पिछले कुछ सालों से मुसलमानों पर अत्याचार भी बढ़ा है और देश का विकास तभी होगा, जब मुसलमानों का भी विकास होगा. विपक्षी नेताओं ने कर्नाटक हिजाब विवाद का भी इस दौरान जिक्र किया. 

सांसद अब्दुल वहाब की दलील
राज्यसभा में बोलते हुए सांसद वहाब ने कहा कि मुस्लिमों की स्थिति दलित और आदिवासियों से भी बदतर है. सच्चर कमेटी और उसके बाद बनी रंगनाथ मिश्र और अमिताभ कुंडु कमेटी ने भी इसे माना है. 

मुस्लिमों के घर पर आज भी बुल्डोजर चलाए जा रहे हैं. सबका साथ सबका विकास अगर सरकार चाहती है तो सच्चर कमेटी की सिफारिश को लागू करे. 

उन्होंने आगे कहा कि देश में मुसलमानों की आबादी 14 फीसदी से अधिक हैं, लेकिन उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रतिनिधित्व बहुत कम है. सरकार सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश से तहकीकात करवा कर सिफारिश को अमल में लाएं. 

सच्चर रिपोर्ट का जिन्न फिर क्यों निकला?
लोकसभा चुनाव 2024 में अब 380 दिन से भी कम का वक्त बचा है. ऐसे में विपक्ष मुसलमानों के मुद्दे पर बीजेपी को घेरने में जुटी है. विपक्ष की कोशिश है कि मुसलमान का वोट कम से कम बंटे. 

यूपी के रामपुर में उपचुनाव के बाद से ही बीजेपी मुसलमानों के पसमांदा और बोहरा वोटरों में सेंध लगाने की कोशिश में जुट गई है. बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सभी समुदाय को साथ लेकर चलने की अपील की थी.

यूपी, असम, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे कई राज्यों में पसमांदा समुदाय की आबादी अधिक है, जहां चुनाव में पसमांदा वोटर्स प्रभावी रहते हैं. ऐसे में विपक्ष को डर है कि अगर पसमांदा टूटा तो मुसलमानों को वोटों में भी बिखराव हो जाएगा. 

पसमांदा कौन हैं, बीजेपी क्यों जोड़ना चाहती है?
भारतीय राजनीति में 1998 में सबसे पहले पसमांदा शब्द की गूंज सुनाई पड़ी. पत्रकार से राजनेता बने अली अनवर ने पसमांदा समाज का एक संगठन बनाकर अपनी मांग को जोरशोर से उठाया. पसमांदा मुसलमान के पिछड़े और दलित जातियों के के समूह को कहा जाता है

भारत में मुसलमानों को मुख्य रूप से अशरफ (ऊंची जाति) और अजलफ (पिछड़े) और अरजल (दलित) में बांटा गया है. अली अनवर के मुताबिक मुसलमान में पसमांदा की आबादी करीब 85 फीसदी है.

साल 1998 में पहली बार 'पसमांदा मुस्लिम' का इस्तेमाल किया दया था. जब पूर्व राज्यसभा सांसद अली अनवर अंसारी ने पसमांदा मुस्लिम महाज का गठन किया था. उसी समय ये मांग उठी थी कि सभी दलित मुसलमानों की अलग से पहचान हो और उनको ओबीसी के अंर्तगत रखा जाए.

बीजेपी पसमांदा को साथ लाने के लिए संपर्क की रणनीति अपना रही है. इसके तहत पार्टी के नेता पसमांदा समुदाय के लोगों से मुलाकात करेंगे और सरकार के जनकल्याणकारी योजनाओं को बताएंगे.

यूपी चुनाव के बाद बीजेपी ने योगी कैबिनेट में पसमांदा समुदाय से आने वाले दानिश आजाद अंसारी को मंत्री बनाया. एक रिपोर्ट के मुताबिक यूपी में बीजेपी की अल्पसंख्यक इकाई करीब 12-15 पसमांदा संगठनों के साथ मिलकर काम कर रही है.

इसी तरह का मॉडल पार्टी अन्य राज्यों में भी लागू करने की कोशिश में है. पार्टी की एक और रणनीति महापुरुषों के नाम पर पसमांदा मुसलमानों को साधने की है. 

बीजेपी एमलएसी संजय पासवान ने बिहार में हाल ही में पसमांदा समुदाय के नेता अब्दुल कयूम अंसारी के पुण्यतिथि पर एक विशाल कार्यक्रम का भी आयोजन किया था.

लोकसभा की 80 सीटें, जहां मुसलमान सबसे अधिक
2011 जनगणना के मुताबिक भारत में 14 फीसदी मुसलमान से ज्यादा मुसलमान हैं. यूपी, असम, बिहार, पश्चिम बंगाल और झारखंड में मुसलमानों की आबादी सबसे अधिक है. 

एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में 543 लोकसभा सीटों में से 80 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम आबादी 20 फीसदी से अधिक है. वहीं जिन 5 राज्यों में मुस्लिम आबादी सबसे अधिक है, वहां लोकसभा की लगभग 190 सीटें हैं. 

सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में क्या कहा था?
अक्टूबर 2005 में मनमोहन सिंह ने मुसलमानों के आर्थिक, समाजिक और शैक्षणिक हालातों पर रिपोर्ट तैयार करने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस राजेंद्र सच्चर की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया था. कमेटी ने 2006 में अपनी रिपोर्ट केंद्र को सौंप दी थी. 

सच्चर कमेटी में सात सदस्यों को शामिल किया गया था. कमेटी ने रिपोर्ट में कहा था कि भारत में मुसलमान समुदाय आर्थिक, सामाजिक और शिक्षा के क्षेत्र में अन्य समुदायों के मुकाबले काफी पिछड़ा. समुदाय के अधिकांश आबादी के पास शिक्षा के अवसरों की कमी है.

इसके अलावा सरकारी और निजी उद्योगों में भी मुसलमानों की भागीदारी कम है. इस रिपोर्ट को सरकार ने संसद में पेश किया और कई सिफारिशों को लागू करने का ऐलान किया था. 

सच्चर कमेटी की रिपोर्ट पर विवाद भी
2013 में गुजरात की नरेंद्र मोदी सरकार ने सच्चर कमेटी की रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए इसे असंवैधानिक बताया था. सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर गुजरात सरकार ने कहा था कि कमेटी में सिर्फ मुसलमानों की हालात के बारे में बताया गया है. बाकी अल्पसंख्यक समुदाय के बारे में रिपोर्ट में जिक्र नहीं किया गया है. 

2021 में सनातन वैदिक संस्था ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर इस रिपोर्ट को असंवैधानिक ठहराने की मांग की. याचिका में कहा गया कि कमेटी नियुक्ति के वक्त प्रधानमंत्री ने मंत्रिमंडल की अनुशांसा का जिक्र नहीं किया. वहीं कमेटी गठन का अधिकार अनुच्छेद 340 के तहत राष्ट्रपति को होता है, जो नहीं किया गया. ऐसे में रिपोर्ट को अवैध ठहराया जाए. 

सच्चर कमेटी की सिफारिश में क्या था?
1. लोक प्रतिनिधित्व में हिस्सेदारी बढ़े- सच्चर कमेटी ने अपनी सिफारिश में निर्वाचन में मुसलमानों के हिस्सेदारी बढ़ाने पर जोर दिया. कमेटी ने कहा कि सरकार चुनावी क्षेत्रों को नए सिरे से परिसीमन कराएं और इसमें मुस्लिम बहुल क्षेत्रों पर खास फोकस करें. 

साथ ही कमेटी ने कहा कि दलित आदिवासियों की तरह मुस्लिम बहुल सीटों को भी आरक्षित किया जाए, जिससे हिस्सेदारी तेजी से बढ़ सके. रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 1947 से 2014 तक करीब 7500 सांसद बने, जिसमें से सिर्फ 400 सांसद मुसलमान थे.

2. शिक्षा और नौकरी के लिए अलग सेटअप- सच्चर कमेटी ने रिपोर्ट में कहा कि मुसलमानों के शिक्षा और नौकरी में भागीदारी बढ़ाने के लिए अलग सेटअप तैयार किया जाए. मैट्रिक तक की पढ़ाई के लिए 3 स्कॉलरशीप की व्यवस्था कराई जाए. मदरसा में पढ़ने वाले बच्चे कैसे तकनीकी से जुड़े इस पर भी काम किया जाए.

साथ ही सरकारी नौकरी में भागीदारी बढ़ाने के लिए अरजल को दलित मुसलमान का क्राइटेरिया में रखकर उसके लिए आरक्षण का भी इंतजाम किया जाए. समिति ने वक्फ को भी मजबूत करने की सिफारिश की. 

3. बिजनेस को बढ़ावा देने के लिए सुविधा तैयार करें- सच्चर कमेटी ने अपनी सिफारिश में कहा कि जो मुसलमान बिजनेस कर रहे हैं और उद्यमी बनना चाहते हैं तो सरकार उसके लिए भी नई व्यवस्था बनाएं.

इसके तहत मुस्लिम इलाकों में बैंक खोलने और मुसलमानों को लोन आसानी से मुहैया कराने की व्यवस्था बनाने की सिफारिश की गई थी. 

सच्चर रिपोर्ट कैसे बढ़ा सकती है बीजेपी की मुश्किलें
सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में मुसलमानों को हिस्सेदारी देने, आरक्षण देने जैसी सिफारिशें की गई है. देश में एक तरफ जातीय जनगणना के साथ ही ओबीसी आरक्षण की भी मांग उठ रही है. ऐसे में अगर सच्चर कमेटी की सिफारिश लागू करने की मांग भी तेज होती है, तो सरकार के सामने मुश्किल खड़ी हो सकती है.

अब्दुल वहाब ने मांग की है कि  2024 तक  रिपोर्ट लागू की जाए. उनकी इस मांग कांग्रेस सहित ज्यादातर विपक्षी पार्टियों ने समर्थन किया है. बीजेपी सरकार से सामने यह एक बड़ा सवाल बन सकता है क्योंकि यूपी में सभी 80 सीटें जीतने के लिए पार्टी पसमांदा मुसलमानों को साधने की कोशिश कर रही है.

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