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Explained: धर्मेंद्र प्रधान को क्यों नहीं गंवा सकती मोदी सरकार? जबकि एक इस्तीफे पर थम जाएगा CJP आंदोलन

CJP Protest: विपक्ष और आंदोलनकारियों के सामने मोदी सरकार की मजबूरी सिर्फ एक मंत्री को बचाने की नहीं, बल्कि पूरी राजनीतिक रणनीति, संस्थागत सुधारों की साख और प्रशासनिक अधिकार बचाने की है.

भारत में परीक्षा लीक का मुद्दा अब एक सियासी रस्साकशी में बदल चुका है और इस रस्साकशी के केंद्र में हैं केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान. नीट-यूजी विवाद के बाद से विपक्ष और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) लगातार उनके इस्तीफे की मांग पर अड़े हुए हैं. लेकिन मोदी सरकार ने साफ कर दिया है कि वह इस मांग को मानने वाली नहीं है. यह जिद्द सिर्फ एक व्यक्ति को बचाने की नहीं है, बल्कि इसके पीछे बड़ी राजनीतिक, प्रशासनिक और कानूनी मजबूरियां हैं, जो सरकार को पीछे हटने से रोक रही हैं. आइए समझते हैं कि आखिर वो कौन सी मुश्किलें हैं, जिनकी वजह से सरकार धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर झुक नहीं सकती है...

मोदी सरकार के न झुकने की 7 बड़ी वजहें हैं...

1. 'व्यक्ति नहीं, व्यवस्था' का सरकारी रुख

सरकार शुरू से यह कहती आ रही है कि पेपर लीक एक व्यवस्थागत चुनौती है, किसी एक व्यक्ति की गलती नहीं. अगर मोदी सरकार अभी सिर्फ विपक्ष के दबाव में आकर धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा स्वीकार कर लेती है, तो यह अप्रत्यक्ष रूप से इस बात का सबूत हो जाएगा कि सरकार की नीतियां विफल रहीं और मंत्री पर लगे आरोप सही हैं. यह राजनीतिक रूप से सरकार के लिए बहुत बड़ी रियायत होगी और विपक्ष को अगले किसी भी संकट में इसी तरह की मांग उठाने की नैतिक ताकत दे देगी.

2. राजनीतिक समीकरण और चुनावी संदेश

धर्मेंद्र प्रधान बीजेपी के सबसे प्रभावशाली ओबीसी चेहरों में से एक हैं और ओडिशा जैसे महत्वपूर्ण पूर्वी राज्य में पार्टी की जीत के प्रमुख शिल्पी रहे हैं. प्रधान को पद से हटाने का सीधा संदेश पार्टी के बड़े जनाधार वाले वर्ग तक जाएगा, जिससे समर्थकों में गलत संकेत जा सकता है. लोकसभा चुनाव के बाद जिस तरह बीजेपी को बहुमत के लिए सहयोगियों पर निर्भर रहना पड़ा. ऐसे में किसी कद्दावर मंत्री को बलि का बकरा बनाना पार्टी और सरकार की आंतरिक एकजुटता और मनोबल को कमजोर कर सकता है.

3. प्रशासनिक स्तर पर 'फास्ट ट्रैक कोर्ट' और नए कानून की विश्वसनीयता पर संकट

PM मोदी ने खुद इस मामले पर कहा था, 'दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा' और फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन का ऐलान किया. सरकार ने जून 2024 में 'सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम' भी लागू किया, जिसमें पेपर लीक करने वालों के लिए 10 साल तक की सजा और एक करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है.

अगर इस पूरे ढांचे को लागू करने के बाद भी सरकार अपने ही शिक्षा मंत्री को जिम्मेदारी से मुक्त कर देती है या उन्हें इस्तीफा देना पड़ता है, तो यह इन कानूनी और संस्थागत सुधारों की नाकामी का प्रमाण माना जाएगा. सरकार के लिए यह बहुत जरूरी है कि वह यह दिखाए कि उसकी नीतियां ही असली समाधान हैं, न कि किसी व्यक्ति को हटाना.

4. विपक्षी एकता का मनोवैज्ञानिक दबाव

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, विपक्ष लंबे समय बाद किसी मुद्दे पर पूरी तरह एकजुट दिख रहा है. कांग्रेस, TMC, आम आदमी पार्टी, सपा और क्षेत्रीय दलों ने संसद के भीतर और बाहर एक सुर में इस्तीफे की मांग को उठाया है. CJP जैसी संस्थाएं भी कोर्ट में सक्रिय हैं. अगर सरकार इस दबाव में आकर एक बार झुकी, तो आने वाले सत्रों में विपक्ष हर मुद्दे पर मंत्री के इस्तीफे की मांग को अपना पहला और सबसे बड़ा हथियार बना लेगा. इससे सरकार की निर्णय लेने की क्षमता पर स्थायी रूप से असर पड़ सकता है.

5. संसदीय कार्यवाही और बहस का रास्ता रोकना

सरकार चाहती थी कि नीट विवाद पर संसद में रूल 193 के तहत अल्पकालिक चर्चा हो, जहां कोई मतदान या स्थगन प्रस्ताव नहीं होता. लेकिन विपक्ष रूल 60 के तहत स्थगन प्रस्ताव और राज्यसभा में रूल 267 के जरिए पूरे सदन का कामकाज रोककर तत्काल बहस की मांग कर रहा था. विपक्ष का पूरा जोर इस बात पर था कि सरकार को कठघरे में लाया जाए और शिक्षा मंत्री को सीधे जवाब देना पड़े.

सरकार ने यह मोर्चा भी नहीं छोड़ा. स्पीकर और सभापति के नियमों का हवाला देकर इसे टेक्निकल उलझनों उलझाए रखा. अगर इस तरह के सियासी दबाव के बाद भी सरकार इस्तीफे की मांग मान लेती, तो यह संसद में अपने पक्ष को मजबूती से रखने में विफलता का संकेत होता.

6. कोई सीधी कानूनी जिम्मेदारी न होना

CBI या सुप्रीम कोर्ट की निगरानी वाली कमेटी की किसी भी जांच में सीधे तौर पर धर्मेंद्र प्रधान की किसी लापरवाही या संलिप्तता की पुष्टि नहीं की है. पेपर लीक एक आपराधिक साजिश है, जिसमें स्थानीय स्तर पर दलालों, प्राइवेट इंस्टीट्यूट्स और कुछ अधिकारियों की भूमिका सामने आती है. ऐसे में बिना किसी कानूनी आधार के किसी कैबिनेट मंत्री को हटाना सरकार के अपने प्रशासनिक सिद्धांतों के खिलाफ होगा और अन्य मंत्रियों में हलचल पैदा करेगा. इससे यह गलत परंपरा बन सकती है कि सड़क या संसद में हंगामा होते ही मंत्री को बदल दिया जाए.

7. जनभावना और कोर्ट का संतुलित रुख

सुप्रीम कोर्ट ने नीट-यूजी मामले में परीक्षा रद्द करने से इनकार कर दिया था और पेपर लीक को बड़े पैमाने पर फैला हुआ नहीं माना था. हालांकि उसने सिस्टम में सुधार की जरूरत बताई थी. एग्जाम देने वाले छात्रों समेत जनता का एक बड़ा तबका पूरी परीक्षा को रद्द करने या अन्य बड़े फैसलों के पक्ष में नहीं था. ऐसे में कोर्ट के संतुलित रुख के बाद सिर्फ राजनीतिक विरोध के चलते मंत्री को हटाना सरकार के लिए तर्कसंगत नहीं दिखता. यह उसे अपने वोट बैंक में कमजोर भी कर सकता है.

कुल मिलाकर धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांग रहे विपक्ष और CJP के सामने मोदी सरकार की मजबूरी सिर्फ एक मंत्री को बचाने की नहीं, बल्कि अपनी पूरी राजनीतिक रणनीति, संस्थागत सुधारों की साख और प्रशासनिक अधिकार को बचाने की है. यही वजह है कि सरकार इस मामले में पीछे हटने को तैयार नहीं है और इस टकराव के आने वाले दिनों में और तेज होने के पूरे आसार हैं.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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