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Same Sex Marriage: सुप्रीम कोर्ट को बदलाव और निरंतरता के बीच का रास्ता ढूंढना होगा

Same Sex Marriage: याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट में जहां भी पति और पत्नी का इस्तेमाल किया गया है वहां व्यक्ति' का इस्तेमाल किया जाए.

Same Sex Marriage: विवाह हमारी सामाजिक व्यवस्था का आधारशिला है, कोई भी मिलन विवाह से अधिक गहरा नहीं है, क्योंकि यह प्रेम, निष्ठा, भक्ति, बलिदान और परिवार के उच्चतम आदर्शों का प्रतीक है. यह बात न्यायमूर्ति एंथनी एम केनेडी ने यूएस सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले में जून 2015 में कही थी. कोर्ट ने अपने फैसले में समलैंगिक विवाह को वैध करार देते हुए इसे कानूनी गारंटी प्रदान की थी.

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मंजूरी देने की मांग करने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की है. समलैंगिक जोड़े और एलजीबीटीक्यू प्लस कार्यकर्ता उनके पक्ष में ठोस तर्क दे रहे हैं. उनका दावा है कि वे न केवल संविधान के अनुच्छेद 14 में सूचीबद्ध समानता के अधिकार से वंचित हैं, बल्कि अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार से भी बाहर है. 

पुरुष' और 'महिला' की जगह 'व्यक्ति' का किया जाए इस्तेमाल

याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने तर्क दिया है कि विवाह न कि केवल एक पुरुष और महिला का मिलन है, बल्कि दो लोगों का मिलन है. कानून में बदलाव यह दर्शाने के लिए होना चाहिए कि समान लिंग के जोड़े भी विवाह कर सकते हैं. कुछ याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने पिछले सप्ताह चीफ जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ के समक्ष कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट (एसएमए) में जहां कहीं भी 'पति' और 'पत्नी' का इस्तेमाल किया गया है वहां इसे जेंडर न्यूट्रल बनाया जाए और 'पुरुष' और 'महिला' की जगह 'व्यक्ति' का इस्तेमाल किया जाए.  

हालांकि, जमीयत-उलेमा-ए-हिंद की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि यह एक वैध विवाह है, मान लीजिए कि विवाह टूट जाता है और उन्होंने एक बच्चे को गोद ले लिया है. क्या होने वाला है? पिता कौन होगा? महिला कौन है? गुजारा भत्ता किसे मिलेगा? ये उस घोषणा के गंभीर सामाजिक परिणाम होंगे. सिब्बल ने जोर देकर कहा कि अन्य देशों में जहां समलैंगिक विवाह को मान्यता दी गई है, उन्होंने पूरे कानूनी ढांचे को बदल दिया, या तो आप इसे एक रूप में लें, या इसे बिल्कुल न लें.

विरोध करने वाले अन्य लोगों का तर्क दिए जाने हैं बाकी 

सुनवाई के दौरान, चीफ जस्टिस ने कहा कि 2018 में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर करके, यह निहित रूप से विचार किया गया था कि विवाह जैसे स्थिर रिश्ते समान-लिंग वाले व्यक्तियों के बीच हो सकते हैं. हालांकि अब तक की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट से की गई टिप्पणियों ने समलैंगिक विवाह की संभावना के लिए सकारात्मकता का संकेत दिया है. इसके अलावा केंद्र और केंद्र और इसका विरोध करने वाले अन्य लोगों का तर्क दिए जाने बाकी हैं.

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि इसका अन्य कानूनों पर अप्रत्याशित परिणामी प्रभाव भी हो सकता है. सरकार ने तर्क दिया है कि राज्य सरकार और केंद्र शासित प्रदेशों को मामले में एक पक्ष बनाया जाना चाहिए. साथ ही, समलैंगिक विवाह के बाद धार्मिक नेताओं की प्रतिक्रिया आएगी, भेदभाव में वृद्धि की संभावना, कार्य स्थलों पर भेदभाव की आशंका है. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को यह सुनिश्चित करना होगा कि समलैंगिक जोड़े किसी भी प्रकार के भेदभाव के शिकार नहीं होंगे. उनकी सामाजिक स्वीकार्यता एक व्यावहारिक वास्तविकता बनेगी और कानून की नजर में उनकी समान गरिमा होगी.

अशांत विवाहित जीवन का बच्चे पर पड़ सकता है नकारात्मक प्रभाव

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने गुरुवार 20 अप्रैल को कहा कि क्या होता है जब कोई हेट्रोसेक्सुअल कपल होता है और बच्चा घरेलू हिंसा देखता है, क्या वह बच्चा सामान्य माहौल में बड़ा होगा, एक पिता के शराबी बनने और घर वापस आने व उसकी पिटाई करने से क्या होता है? हर रात मां के साथ मारपीट और शराब के लिए पैसे मांगना, विषमलैंगिक जोड़ों के लिए इतना कुछ, कोई निरपेक्षता नहीं है. इसलिए, विषमलैंगिक जोड़ों को पूर्ण क्यों कहा जाए, यदि वे सामाजिक-आर्थिक दबावों से प्रतिरक्षित नहीं हैं, और साथ ही अशांत विवाहित जीवन का बच्चे पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है.

शीर्ष अदालत ने कहा कि संयोग से, भले ही कोई युगल समलैंगिक संबंध में हो, फिर भी उनमें से कोई एक गोद ले सकता है. ऐसा कहा जाता है कि यह तर्क कि यह बच्चे पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा करेगा, इस तथ्य से झूठा है कि आज कानून के रूप में यह खुला है. यह सिर्फ इतना है कि बच्चा माता-पिता दोनों के पितृत्व के लाभों को खो देता है. फिर, विषमलैंगिक जोड़ों और समान लिंग वाले जोड़ों को समान क्यों नहीं माना जाता है. राज्य सरकारें इस मामले में पक्षकार नहीं हैं. उम्मीद है कि अगले सप्ताह जब शीर्ष अदालत सुनवाई शुरू करेगी तो तस्वीर स्पष्ट होगी.

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