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संसद ने दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता दूसरा संशोधन विधेयक को दी मंजूरी

राज्यसभा ने इस विधेयक को कुछ दिन पहले मंजूरी दी थी. सोमवार को लोकसभा ने भी विधेयक को मंजूरी दे दी.

नई दिल्ली: संसद ने सोमवार को ‘दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (दूसरा संशोधन) विधेयक, 2020’ को मंजूरी दे दी. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के तहत कर्ज भुगतान में चूक करने वाली कंपनियों तथा व्यक्तिगत गारंटी देने वालों के खिलाफ साथ-साथ दिवाला कार्रवाई चल सकती है. राज्यसभा ने इस विधेयक को कुछ दिन पहले मंजूरी दी थी. सोमवार को लोकसभा ने भी विधेयक को मंजूरी दे दी.

सरकार आईबीसी में संशोधन के लिए जून में अध्यादेश लेकर आई थी. इसके तहत यह प्रावधान किया गया था कि कोरोना वायरस महामारी की वजह से 25 मार्च से छह महीने तक कोई नई दिवाला कार्रवाई शुरू नहीं की जाएगी. देश में कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए 25 मार्च को ही लॉकडाउन लगाया गया था.

लोकसभा में विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए वित्त मंत्री सीतारमण ने स्पष्ट किया कि 25 मार्च से पहले कर्ज भुगतान में चूक करने वाली कंपनियों के खिलाफ दिवाला प्रक्रिया के तहत कार्रवाई जारी रहेगी. उन्होंने कहा कि इस संशोधन से ऐसी कंपनियों को राहत नहीं मिलेगी.

वित्त मंत्री ने कहा, ‘‘विभिन्न सत्रों के बीच यदि जमीनी स्थिति की मांग होती है, तो अध्यादेश लाने की जरूरत पड़ती है. एक जिम्मेदार सरकार का दायित्य अध्यादेश का इस्तेमाल कर यह दिखाना होता है कि वह भारत के लोगों के साथ है.’’ वित्त मंत्री ने कहा कि महामारी के कारण बनी स्थिति की वजह से समय की मांग थी कि तत्काल कदम उठाए जाएं और उसके लिए अध्यादेश का तरीका चुना गया.

मंत्री के जवाब के बाद लोकसभा ने ध्वनिमत से ‘दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (दूसरा संशोधन) विधेयक, 2020’ को मंजूरी दे दी. सीतारमण ने कहा कि कोविड-19 की वजह से कंपनियों को संकट से जूझना पड़ रहा है.

वित्त मंत्री ने कहा, ‘‘ऐसे में हमने आईबीसी की धारा 7, 9, 10 को स्थगित करने का फैसला किया. इससे हम असाधारण परिस्थितियों की वजह से दिवाला होने जा रही कंपनियों को बचा पाए.’’ उल्लेखनीय है कि आईबीसी की धारा 7, 9 और 10 किसी कंपनी के वित्तीय ऋणदाता, परिचालन के लिए कर्ज देने वालों को उसके खिलाफ दिवाला ऋणशोधन अक्षमता प्रक्रिया शुरू करने से संबंधित है. वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया कि आईबीसी का मकसद कंपनियों को चलताहाल बनाए रखना है, उनका परिसमापन करना नहीं है.

विधेयक पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए कांग्रेस के ए अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि 2016-17 में 37 आवेदन स्वीकार किये गये थे लेकिन लिक्विडेशन एक भी नहीं हुआ. 2021 तक केवल 3,991 आवेदन स्वीकार किये गये जिनमें 2,108 अभी भी लंबित हैं. यह राजग सरकार के काम का प्रमाण है.

भाजपा के निशिकांत दुबे ने कहा कि यह ऐसा कानून आया है जिसने इस देश में अलग तरह का माहौल खड़ा किया. उन्होंने कहा कि 2004 से 2014 तक देश को बैंकिंग प्रणाली को लेकर परेशान किया गया और देश में एनपीए कांग्रेस की देन है. उन्होंने कहा कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) की वसूली दर 42 प्रतिशत से अधिक है जबकि कांग्रेस के समय किये गये ऐसे विभिन्न उपायों में भरपाई तीन से 14 प्रतिशत तक थी.

बीजद के पिनाकी मिश्रा ने विधेयक का समर्थन करते हुए कहा कि जब तक बुनियादी ढांचा पर्याप्त नहीं होगा, तब तक लाभ नहीं मिलेगा.

बीएसपी के श्याम सिंह यादव ने कहा कि कुछ कंपनियों का उद्देश्य कंपनी बनाकर शेयरों में हेरफेर करके दिवालिया घोषित करना और फायदा उठाने का बन गया है, ऐसे लोग राष्ट्रविरोधी होते हैं जो गरीबों का शोषण करते हैं. उन्होंने कहा कि इन कंपनियों पर जितनी नकेल कसी जाए, वह जनता और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए बेहतर होगा. यादव ने चुनावी बांड में पारदर्शिता लाने की जरूरत बताई.

एनसीपी की सुप्रिया सुले ने कहा कि ऐसे समय में यह विधेयक स्वागत योग्य है. महामारी के समय हमें दबाव झेल रहीं कंपनियों को उबारना होगा. कांग्रेस के मनीष तिवारी ने कहा कि सरकार को ध्यान देना चाहिए कि इस समय जनता के हाथ में पैसा हो.

तेलुगूदेशम पार्टी के जयदेव गल्ला और शिवसेना के अरविंद सावंत ने भी विधेयक का समर्थन किया.

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