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गुजरात चुनाव: PM मोदी के डिजिटल इंडिया में गुजरात के 'नो सिग्नल गांव'

एक तरफ देश में 4G, कैशलेस इकॉनमी, ई पेमेंट, ई गवर्नेंस, एम गवर्नेंस की बातें हो रही है. ऐसे में क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि देश के कई इलाके ऐसे हैं जहाँ मोबाइल का नेटवर्क भी नहीं आता.

अहमदाबाद: एक तरफ देश में 4G, कैशलेस इकॉनमी, ई पेमेंट, ई गवर्नेंस, एम गवर्नेंस की बातें हो रही है. ऐसे में क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि देश के कई इलाके ऐसे हैं जहाँ मोबाइल का नेटवर्क भी नहीं आता. आप कहेंगे इतने बड़े देश में तो ऐसा हो ही सकता है. लेकिन अगर हम आपसे कहें कि हम PM मोदी के गुजरात की बात कर रहे हैं तो आपको यकीन नहीं होगा. जी हां चिराग तले अंधेरे की ये कहानी है गुजरात के नर्मदा जिले की जहाँ 50 से ज्यादा गांवों में मोबाइल नेटवर्क नहीं आता.

गुजरात विधानसभा चुनाव की लड़ाई इस बार जितनी जमीन पर लड़ी जा रही है उससे कहीं ज्यादा मोबाइल और सोशल मीडिया पर लड़ी जा रही है. लेकिन इसी गुजरात के कुछ इलाके ऐसे भी हैं जहाँ इंटरनेट तो छोड़िए मोबाइल का नेटवर्क तक नहीं आता. हैरानी की बात ये है कि जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर बाहर निकलते ही आपके मोबाइल का सिग्नल गायब हो जाता है.

गुजरात के दक्षिण पूर्व का सीमावर्ती जिले नर्मदा के मुख्यालय राजपिपला से महज 25 किलोमीटर दूर हाई-वे के आसपास कई आदिवासी बहुल गांव हैं. आदिवासी बहुल होने के बावजूद इधर के इलाके के लोगों की जीवनशैली आधुनिक और मुख्यधारा के करीब है. लेकिन इनकी तरक्की में एक बड़ी रुकावट है. यहां मोबाइल का नेटवर्क नहीं आता. अगर आप ये समझ रहे हैं कि 4G के जमाने में हम इंटरनेट की बात कर रहे हैं तो आप गलत हैं. हम 2G की बात कर रहे हैं. यानी इस इलाके में आप रहते हैं, काम करने आते हैं या इधर से गुजर रहे हैं तो आपके मोबाइल पर सिग्नल नहीं आएगा.

ये समस्या आसपास के कई-कई किलोमीटर तक है. इधर ना तो निजी कम्पनी और ना ही सरकारी कम्पनी के मोबाइल टॉवर लगे हैं. डिजिटल इंडिया की बात करने वाले प्रधानमंत्री के राज्य में गांवों में मोबाइल नेटवर्क भी ना आता हो ये बात वाकई चौंकाने वाली है. ये दिक्कत एक दो नहीं 50 से ज्यादा गांवों में है. मोबाइल नेटवर्क की तलाश में एबीपी न्यूज़ की टीम हाई-वे से अंदर गागर गांव पहुंची.

गांव में छतों पर DTH के एंटीना नजर आए. इससे दो बातें साफ थीं, पहली ये कि लोगों के पास क्रय शक्ति है और दूसरा ये कि DTH का सिग्नल पहुंच रहा है. लेकिन मोबाइल नेटवर्क गांव तक नहीं पहुंच रहा. हालांकि नेटवर्क ना होने के बावजूद गांव में ज्यादातर लोगों के पास मोबाइल फोन था. ग्रेजुएट बेरोजगार दिलीप वसावा का फेसबुक अकाउंट भी है. लेकिन नेटवर्क ना होने की वजह से ये गांव आते ही ये दुनिया से कट जाते हैं. वसावा को लगता है कि नेटवर्क आए तो रोजगार के नए रास्ते भी खुलेंगे.

किसी भी इमरजेंसी जरूरत के लिए इन्हें शहर भागना पड़ता है या फिर फोन को लेकर डूंगर पर. डूंगर यानी गांव की ऊंची जगह. गांव में ऐसे ही एक डूंगर पर मोबाइल सिग्नल पकड़ने के जगह बनी हुई है और खूंटा गड़ा हुआ है. आप अंदाज लगाइए कि सूचना क्रांति के दौर में जब देश में कैशलेस पेमेंट की बात हो रही है ये लोग मुसीबत के वक्त में मोबाइल से एक एम्बुलेंस तक नहीं बुला पाते. पंचायत कार्यालय का इस्तेमाल गोदाम की तरह किया जा रहा है. हर सरकारी काम के लिए कई शहर या फिर कई किलोमीटर दूर दूसरे गांव जाना पड़ता है. नेटवर्क के लिए लोग जिला मुख्यालय में आंदोलन तक कर चुके हैं.

गागर के बाद एबीपी न्यूज़ की टीम आमली गांव पहुंची. मोबाइल टावर के ना होने से होने वाली दिक्कत में बारे में पूछने की देर थी कि लोगों ने झड़ी लगा दी. मोबाइल नेटवर्क इनकी सबके बड़ी मांग है. दरअसल मोबाइल टॉवर ना लगने की बड़ी वजह ये है कि ये इलाके वन क्षेत्र में आते हैं. नेटवर्क ना होने की वजह से जो परेशानी लोग रोज झेलते हैं वो चुनाव के वक्त प्रशासन के लिए भी चुनौती है. ऐसे हालत में चुनाव के दौरान संचार के लिए प्रशासन वायरलेस के भरोसे है. जिलाधिकारी के मुताबिक इस तरह के लगभग 100 मतदान केंद्र हैं जहां मोबाइल कनेक्टिविटी नहीं है.

मोबाइल नेटवर्क लाने के लिए DM साहब भी कोशिश कर रहे हैं. वो खुद स्वीकार कर रहे हैं कि मुनाफे के चक्कर में मोबाइल कम्पनियां टॉवर नहीं लगाती. मोबाइल कनेक्टिविटी ना होने से तमाम सरकारी योजनाओं को लागू करने में भी दिक्कत आ रही है. ये इलाके कहने को वन क्षेत्र जरूर हैं लेकिन बड़ी आबादी रहती है. जंगल भी घना नहीं है. सबसे महत्वपूर्ण बात है कि इसी इलाके में सरदार सरोवर बांध है और सरदार पटेल की भव्य प्रतिमा बन रही है जिसके तैयार होने पर इलाके में पर्यटन में काफी इजाफा होगा. पिछले दिनों PM जब सरदार सरोवर बांध का उद्घाटन करने आए तो सरकारी अमले के लिए अस्थाई तौर पर मोबाइल टावर लगाए गए.

अगर विकास की बात करें तो गांवों में पक्की सड़क से लेकर 24 घन्टे की बिजली की सुविधा है. गांव-गांव में स्कूल है. ज्यादातर लोग मेहनत मजदूरी करके पेट पालते हैं और प्रगतिशील हैं. लेकिन सरकारी नियम कायदे और मोबाइल कंपनियों की मुनाफाखोरी के चक्कर में एक बेहद जरूरी सुविधा से वंचित हैं. इस इलाके में बुनियादी जरूरत की लगभग सभी चीजें मौजूद हैं ऐसे में हम नहीं कह सकते कि इलाका सरकार की प्राथमिकता में शामिल नहीं है. लेकिन मोबाइल नेटवर्क ना होने की वजह से जाहिर तौर पर डिजिटल इंडिया की रेस में ये इलाके पिछड़ रहे हैं. जाहिर सी बात है ये तस्वीर चिराग तले अंधेरे की है, जिसे बदलने की जरूरत है.

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