मेकेदातु विवाद पर CM विजय ने लिखा PM को लेटर, की ये बड़ी मांग
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने केंद्र के दावे पर चुनौती देते हुए कहा, सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले के तहत निचले बहाव वाले राज्यों की सहमति की स्पष्ट रूप से आवश्यकता नहीं है.

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा है. उन्होंने कावेरी नदी पर कर्नाटक के प्रस्तावित मेकेदातु बांध का विरोध किया है. साथ ही उन्होंने केंद्र के दावे पर चुनौती देते हुए कहा, सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले के तहत निचले बहाव वाले राज्यों की सहमति की स्पष्ट रूप से आवश्यकता नहीं है.
विजय का पत्र जल शक्ति राज्य मंत्री राज भूषण के एक बयान के बाद आया है. राज्यसभा में मंत्री ने कहा था कि 16 फरवरी 2018 के फैसले में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है. इसके तहत कर्नाटक को कावेरी नदी पर कोई ढांचा बनाने से पहले तमिलनाडु, केरल या पुड्डुचेरी की मंजूरी लेना पड़े. दरअसल इस सवाल का जवाब सदन में पीएमके सांसद अंबुमणि रामदास के एक सवाल के जवाब में दिया गया था.
विजय ने अपने पत्र में कहा, 'जल शक्ति राज्यमंत्री का यह निराशाजनक जवाब ऐसा लगता है , जैसे निचले बहाव वाले राज्यों की सहमति के संबंध में मौजूदा कानूनी स्थिति और स्थापित कानून को ध्यान में रखे बिना दिया गया हो. कर्नाटक राज्य को अन्य सभी संबंधित राज्यों की सहमति और केंद्र सरकार की मंजूरी के बिना उस ऊंचाई तक निर्माण करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है.'
CM विजय ने ट्रिब्यूनल के फैसले का किया जिक्र
विजय ने इस दौरान कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण यानी ट्रिब्यूनल के अंतिम फैसले का भी जिक्र किया. जिसमें क्लॉज XVIII किसी राज्य को अपने क्षेत्रों में पानी के इस्तेमाल को कंट्रोल करने का अधिकार देता है. बर्शतें ऐसा कदम ट्रिब्यून के आदेश के खिलाफ न हो. विजय ने तर्क दिया कि कोई बी ऐसा प्रोजेक्ट जो फैसले के तहत तय किए गए नियंत्रित बहाव को प्रभावित कर सकता है. उसकी जांच यह सुनिश्चित करने के लिए की जाना चाहिए कि वह ऐसे फैसले के अनुरूप है या नहीं.
केंद्र ने राज्यसभा में इसी कलॉज का हवाला देते हुए कहा है कि 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कर्नाटक के लिए कावेरी बेसिन के अन्य राज्यों की सहमति लेना अनिवार्य नहीं था. केंद्र ने कहा कि राज्यों को अपनी सीमाओं के भीतर पानी का इस्तेमाल करने का अधिकार है. जबतक कि उनके कदम ट्रिब्यूनल के निर्देशों के खिलाफ न हों. तमिलनाडु का कहना है कि इस मुद्दे का फैसला केवल 2018 के फैसले में स्पष्ट सहमति वाले क्लॉज को देखकर नहीं किया जा सकता है.
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विजय ने अपने पत्र में केरल की पंबर पनबिजली प्रोजेक्ट के बारे में ट्रिब्यूनल के निर्देशों का जिक्र किया. इसमें पानी का इस्तेमाल सिर्फ 0.1 टीएमसी होना था. ट्रिब्यूनल ने केरल और तमिलनाडु को निर्देश दिया था कि वे पानी छोड़ने के शेड्यूल पर मिलकर सहमति बनाएं ताकि नीचे के राज्यों में सिंचाई का बुरा असर न पड़े.
उन्होंने कहा कि धारा XX यह मानती है कि अवॉर्ड में बदलाव सिर्फ संबंधित राज्यों के बीच सहमति से किए जा सकते हैं. विजय ने पत्र में लिखा कि इसलिए तमिलनाडु का यह मानना है कि प्रस्तावित मेकेदातु परियोजना का मूल्यांकन सिर्फ एक इंजीनियरिंग प्रस्ताव के तौर पर नहीं किया जा सकता. उन्होंने कहा कि परियोजना की कानूनी मंजूरी की जांच सबसे पहले कावेरी ट्रिब्यूनल के अंतिम अवॉर्ड, सुप्रीम कोर्ट के फरवरी 2018 के फैसले और नीचे के राज्यों के अधिकारों के आधार पर की जानी चाहिए.
मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि कर्नाटक ने 2019 में जो विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) सौंपी थी. उसे सेंट्रल वॉटर कमीशन ने ट्रिब्यूनल के अवॉर्ड और लागू गाइडलाइंस का पालन सुनिश्चित करने के लिए संशोधन हेतु वापस भेज दिया था. तमिलनाडु लगातार कर्नाटक के बैलेंसिंग रिजर्वोअर बनाने के प्रस्ताव का विरोध करता रहा है. इधर, कर्नाटक का कहना है कि इस परियोजना का मुख्य मकसद बेंगलुरु की पीने के पानी जरूरतों को पूरा करना और पनबिजली पैदा करना है.
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