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NCT ACT: एलजी के ‘रहमो करम’ पर ही चलेगी केजरीवाल सरकार

संसद से यह बिल पारित हो जाने के बाद दिल्ली के असली मुखिया सिर्फ उपराज्यपाल ही होंगे. कहने को सरकार तो होगी लेकिन उनके पास ऐसा एक भी अधिकार नहीं बचेगा कि वह अपनी मर्जी के मुताबिक कोई काम कर सकें.

नई दिल्ली: केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने एनसीटी एक्ट में बदलाव करके दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार के पर कतरने का पुख्ता इंतज़ाम कर दिया है. संसद से यह बिल पारित हो जाने के बाद दिल्ली के असली मुखिया सिर्फ उपराज्यपाल ही होंगे. कहने को सरकार तो होगी लेकिन उसके पास ऐसा एक भी अधिकार नहीं बचेगा कि वह अपनी मर्जी के मुताबिक कोई काम कर सके.

राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि ऐसा करके केंद्र सरकार ने एक तरह से दिल्ली विधानसभा और यहां की सरकार को अप्रासंगिक बनाने का प्रयास किया है. चूंकि एलजी केंद्र के ही प्रतिनिधि होते हैं, लिहाजा उन्हें सारी ताकत देने का मतलब है कि अब केंद्र की मर्जी से ही दिल्ली के सारे फैसले होंगे. दिल्ली सरकार का जो भी निर्णय केंद्र को नापसंद होगा, एलजी उस फ़ाइल पर अपना ऐतराज जताते हुए उसे नामंजूर कर देंगे.

जाहिर है कि केंद्र बनाम केजरीवाल सरकार की यह लड़ाई आने वाले दिनों में कानूनी जंग में तब्दील हो सकती है. कानून के जानकारों के मुताबिक संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत राज्य सरकार इस संशोधित कानून को सीधे सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दे सकती है, जरुरी नहीं कि उसे पहले हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़े.

दिल्ली हाइकोर्ट के एडवोकेट और संविधान से जुड़े मामलों के जानकार अनिल अमृत के मुताबिक "अगर केजरीवाल सरकार इस बिल को चुनौती देती है,तब सुप्रीम कोर्ट को संविधान के Article 239 AA की नए सिरे से व्याख्या करनी पड़ेगी. इसके जरिये ही दिल्ली को सीमित अधिकारों के साथ राज्य का दर्जा दिया गया था. उसके बाद ही गवर्नमेंट ऑफ एनसीटी एक्ट,1991 वजूद में आया" तब दिल्ली का विधायी स्वरुप बदल गया.

मेट्रोपोलिटन कॉउंसिल का स्थान विधानसभा ने ले लिया, चीफ एग्जीक्यूटिव कॉउंसलर यानी CEC का पद मुख्यमंत्री हो गया और मेट्रोपोलिटन कॉउंसलर की हैसियत विधायक की हो गई. उसके बाद दिल्ली में 1993 में विधानसभा का पहला चुनाव हुआ. इस चुनाव में दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के वादे के  साथ सत्ता में आई बीजेपी आज तक उसे पूरा नहीं कर पाई. उल्टे अब तो उसने इस विकलांग राज्य की सरकार की बची-खुची ताकत भी छीन ली. जब 1991 में एनसीटी एक्ट बना था, तभी तीन विषयों को इससे बाहर रखकर वे सारे अधिकार केंद्र सरकार के अधीन कर दिए गए थे. ये हैं-पुलिस,भूमि और कानून व्यवस्था.

यह जानना जरूरी है कि केजरीवाल आज जिन अधिकारों के छीन लिए जाने का रोना रो रहे हैं,वे सारे अधिकार 15 बरस तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित ही लेकर आई थीं. साल 2004 में केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली UPA सरकार बनने के बाद उन्होंने प्रशासनिक अधिकार मुख्यमंत्री को दिए जाने को लेकर खूब मशक्कत की. लगातार तीन साल तक केंद्र के पीछे पड़ने और सोनिया गांधी के दखल देने के बाद ही उन्हें ये अधिकार मिल पाए थे.

अनिल अमृत के अनुसार "मोदी सरकार अब उन्हीं अधिकारों को वापस लेने के लिए कानून में संशोधन करने के लिए ही यह बिल लेकर आई है. 1991 में बने कानून की धारा 21 और 24 में बदलाव करके सरकार की परिभाषा को पुनर्भाषित किया गया है. अब 'सरकार' का मतलब सिर्फ 'उपराज्यपाल' होगा." लिहाजा केजरीवाल की नाराज़गी समझी जा सकती है कि जब यहां चुनी हुई सरकार का कोई अस्तित्व ही नहीं बचेगा, तब चुनाव करवाने और विधानसभा होने का भला क्या औचित्य है.

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