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भारत के स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम को मिली मान्यता, अमेरिका, चीन और रूस के बाद ऐसा करने वाला चौथा देश बना

भारत अब अमेरिका (‘जीपीएस’), रूस (‘ग्लोनेस’) और चीन (‘बेईदाऊ’) के साथ उन चुनिंदा देशों में शुमार हो गया है जिन्होनें सैटेलाइट की मदद से खुद का नेविगेशन सिस्टम तैयार कर लिया है.इंडियन रिजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (आईआरएनएसएस) यानि नेवआईसी देशभर में सीमाओं से करीब 1500 किलोमीटर दूर तक पूरी तरह से सटीक जानकारी देता है—हालांकि इसका एक्सटेंडेड सर्विस एरिया भी है.

नई दिल्ली: नेविगेशन के क्षेत्र में भारत ने एक नया मुकाम हासिल किया है. भारत अब उन चार चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल हो गया है जिन्होने अपना खुद का नेविगेशन सिस्टम ईजाद कर लिया है. इसरो द्वारा तैयार किए गए ‘नेवआईसी’ सिस्टम को इंटरनेशनल मेरीटाइम ऑर्गेनाइजेशन (आईएमओ) ने मान्यता दे दी है.

इंडियन स्पेस रिर्सच ऑर्गेनाइजेशन (इसरो) के मुताबिक, आईएमओ नेवआईसी को वर्ल्ड़वाइड रेडियो नेविगेशन सिस्टम (डब्लूडब्लूआरएनएस) के तौर पर मान्यता दे दी है. ये मान्यता नबम्बर के महीने में आईएमओ के एक 102वें सेशन में दी गई थी. इसरो के मुताबिक, आईएमओ की मेरीटाइम सेफ्टी कमेटी ने नेवआईसी को सभी ऑपरेशन्ल जरूरतों पर खरा पाते हुए समंदर में नेविगेशन करने में मदद करने की हरी झंडी दे दी है.

इसके तहत नेवआईसी 55 डिग्री ईस्ट लॉन्गिटियूड से 50 डिग्री नार्थ लेटिट्यूड, 110 डिग्री ईस्ट लॉन्गिट्यूड और 5 डिग्री साउथ लेटिट्यूड के क्षेत्र में नेविगेशन में मदद कर सकता है. आईएमओ के इस विशेष अधिवेशन में भारत की तरफ से डायरेक्टरेट जनरल ऑफ शिपिंग, जहाजरानी और बंदरगाह मंत्रालय सहित इसरो की टेक्निकल टीम मौजूद थी.

इस मान्यता मिलने के बाद भारत अब अमेरिका (‘जीपीएस’), रूस (‘ग्लोनेस’) और चीन (‘बेईदाऊ’) के साथ उन चुनिंदा देशों में शुमार हो गया है जिन्होनें सैटेलाइट की मदद से खुद का नेविगेशन सिस्टम तैयार कर लिया है और दुनियाभर में मान्यता भी मिल गई है. इसरो के मुताबिक, नेवआईसी को मान्यता मिलने से समंदर में नेविगेशन में तो मदद मिलेगी ही साथ ही सर्व और जेओडेसी (भूमंडल नापने) इत्यादि में भी मदद मिल सकेगी. इसके अलावा जमीन और हवा में नेविगेशन के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है. इसके अलावा व्हीकल-ट्रैकिंग और फ्लीट मैनजेमेंट, ड्राइवर्स यानि वाहन-चालकों के लिए विजुयल एंड वॉयस नेवीगेशन और प्रेसाइस-टाइमिंग के लिए.

आपको बता दें कि इंडियन रिजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (आईआरएनएसएस) यानि नेवआईसी देशभर में सीमाओं से करीब 1500 किलोमीटर दूर तक पूरी तरह से सटीक जानकारी देता है—हालांकि इसका एक्सटेंडेड सर्विस एरिया भी है. आईआरएनएसएस दो तरह से अपनी सेवाएं प्रदान करेगा. पहला जीपीएस की तरह स्टैंर्डड पोजिशनिंग सिस्टम जिसे कोई भी यूज़र इस्तेमाल कर सकता है. और दूसरा रेस्ट्रिक्टेड-सर्विस की तरह. इसरो का दावा है कि ये सिस्टम प्राइमरी सर्विस एरिया में 20 मीटर तक सही जानकारी देता है.

इसरो का दावा है कि इस नेवआईसी के लिए कुल आठ सैटेलाइट इस्तेमाल की जाती हैं. साथ ही एक प्राईवेट कंपनी को नेवआईसी चिप बनाने की जिम्मेदारी दी गई है जो मोबाइल हैंडसैट कंपनियों को ये चिप मुहैया कराईगी ताकि नए मोबाइल फोन नेवआईसी का इस्तेमाल कर सकें. इससे नेवआईसी हर हैंडसेट, एप्लीकेशन और प्रोसेसर्स में एक स्टैंडर्ड फीचर की तरह हो. इससे स्मार्टफोन्स की जियो-लोकेशन क्षमता भी कवरेज एरिया में बढ़ जाएगी.

नीरज राजपूत देश के जाने-माने डिफेंस-जर्नलिस्ट और वॉर-लेखक हैं. पत्रकारिता में करीब ढाई दशक का अनुभव रखते हैं और प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व डिजिटल मीडिया तीनों में गहरी पकड़ है.

वर्तमान में वे ABP नेटवर्क से जुड़े हैं, जहाँ युद्ध, रक्षा, नेशनल सिक्योरिटी और जियो-पॉलिटिक्स से संबंधित विषयों को कवर करते हैं. ABP लाइव पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम ‘गेम-चेंजर’ के प्रस्तुतकर्ता भी हैं.

रूस-यूक्रेन युद्ध पर उन्होंने पहली हिंदी पुस्तक "ऑपरेशन Z लाइव" लिखी, जो बेस्टसेलर सूची में भी शामिल हुई और पाठकों द्वारा खूब सराही गई.

रिपोर्टिंग का दायरा
- दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र सियाचिन से लेकर आतंकवाद प्रभावित जम्मू-कश्मीर और चीन सीमा पर तिब्बत के पठार तक
- पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयर-स्ट्राइक से लेकर पनडुब्बी के जरिए समुद्र के भीतर तक
- ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उनके एक्सक्लूसिव खुलासे और सटीक विश्लेषणों की व्यापक सराहना हुई
- यूक्रेन-रूस युद्ध क्षेत्र में मारियुपोल, डोनेत्स्क और लुहांस्क जैसे एक्टिव वॉर-जोन से रिपोर्टिंग. इसी अनुभव पर आधारित उनकी पुस्तक प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई
- दुनिया की सबसे संवेदनशील सीमाओं में से एक उत्तर-दक्षिण कोरिया की DMZ
- ⁠अमेरिका के सबसे बड़े सैन्य अड्डों में से एक JBLM, और शीत युद्ध के दौरान "गैर-मौजूद" माने जाने वाले रूसी सैन्य अड्डों से भी ग्राउंड रिपोर्टिंग. 
- ⁠वे उन चुनिंदा रक्षा जुड़े पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने भारत के पहले स्वदेशी अटैक हेलिकॉप्टर LCH-प्रचंड के कॉकपिट में उड़ान भरी है. इसके अलावा फ्रांस में राफेल लड़ाकू विमान निर्माण सुविधा से भी उन्होंने विशेष रिपोर्टिंग की.

भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय द्वारा आयोजित प्रतिष्ठित 'Defence Correspondent Course' के Alumni हैं.

पूर्व कार्य अनुभव
- STAR NEWS में लगभग 6 वर्षों तक चीफ रिपोर्टर (क्राइम) के तौर पर कार्य किया और लोकप्रिय क्राइम शो 'सनसनी' से जुड़े रहे
- पत्रकारिता की शुरुआत अंग्रेजी दैनिक नेशनल हेराल्ड से की
- इसके बाद B.A.G. Films के साथ जुड़कर STAR NEWS के लिए क्राइम शो बनाए
- SAHARA TV में भी लगभग 2 वर्षों तक कार्यरत रहे

रक्षा और सुरक्षा के मामलों पर उनकी पकड़, ग्राउंड-जीरो रिपोर्टिंग और गहन विश्लेषण उन्हें देश के सबसे भरोसेमंद डिफेंस जर्नलिस्ट्स में स्थापित करती है.

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