Economy Edition: जीडीपी घटी और बेरोजगारी बढ़ी, जानिए क्या है इन दोनों का कनेक्शन
इकॉनमी एडिशन: बेरोजगारी को लेकर जो सवाल प्रधानमंत्री मोदी कांग्रेस के नेतृत्व वाली UPA सरकार से पूछा करते थे, वही सवाल उनकी सबसे बड़ी चुनौती बन गया है. एबीपी न्यूज़ खास एडिशन में जानिए GDP और Unemployment का कनेक्शन क्या है और कैसे बेरोजगारी का सीधा संबंध मंदी से है.

नई दिल्ली: कुछ दिनों पहले ही हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावी नतीजों ने ये साफ कर दिया कि सिर्फ राष्ट्रवाद के जरिये ही चुनाव नहीं जीता जा सकता है बल्कि पार्टियों को लोगों के रोजगार और जमीनी मुद्दों की बात करनी होगी. देशभर में मंदी को लेकर बहस चल रही है लेकिन इन दोनों राज्यों के चुनाव में ये मुद्दा गायब रहा. देश की जीडीपी घट रही और बेरोजगारी बढ़ रही है. इस पर कुछ भी बोलने से सरकार लगातार बचती दिख रही है. एबीपी न्यूज़ के इकॉनमी एडिशन में आज जानिए कि आखिर जीडीपी और बेरोजगारी का क्या कनेक्शन है?
Centre For Monitoring Indian Economy के आंकड़े के मुताबिक हरियाणा में सितंबर 2019 में बेरोजगारी की दर 20.3 प्रतिशत हो गई जो सितंबर 2018 में 17.2 प्रतिशत थी. महाराष्ट्र में बेरोजगारी दर सितंबर 2019 में 5.7 प्रतिशत हो गई जबकि एक साल पहले सितंबर 2018 में 4 प्रतिशत थी, यानी रोजगार के बिना राष्ट्रवाद का मुद्दा ज्यादा नहीं चल सकता. रोजगार सिर्फ चुनाव जीतने का साधन नहीं अर्थव्यस्था का आधार भी है.
जो सवाल प्रधानमंत्री मोदी कांग्रेस के नेतृत्व वाली UPA सरकार से पूछा करते थे, वही सवाल उनकी सबसे बड़ी चुनौती बन गया है. अक्टूबर 2018 में बेरोजगारी दर 6.83% थी. जो फरवरी 2019 में 7.20%, जून 2019 में 7.87% और अक्टूबर 2019 में 8.1% पर पहुंच गई है. शहरों में बेरोजगारी दर 8.5% है तो गांव में 7.9% है. बेरोजगारी को लेकर ही विपक्ष मोदी सरकार को सबसे ज्यादा घेरता रहा है, लेकिन बात चुनाव से आगे निकल गई है.

बेरोजगारी में इजाफे का सीधा संबंध मंदी से है. इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि डिमांड सप्लाई के नियम से लोगों की आय बढ़ना रुक जाती है. जिसका सीधा असर लोगों की क्रय शक्ति पर पड़ता है. जिससे सरकार को कम टैक्स मिलता है और सरकार कम रोजगार के मौके मुहैया करवा पाती है.
जानकार रोजगार के संकट के लिए मोदी सरकार के कई फैसलों को जिम्मेदार ठहराते हैं जिसमें नोटबंदी सबसे आगे है. नोटबंदी , जीएसटी, एनबीएफसी का शौक लगने से हमारा ग्रोथ रेट जो 8 फ़ीसदी से बढ़ सकती थी वह अब 5% पर आ गई है. टैक्स टेररिज्म का डर निवेशकों में है , भारत के व्यापारियों में भी है जो दबी जुबान से बोल रहे हैं. सीएमआई के आंकड़ों के मुताबिक जो निवेश होता था वह सिर्फ 10 फ़ीसदी रह गया है.
बेरोजगारी के इस शोर में CMIE के आंकड़े भी बहुत कुछ कहानी बयां करते हैं. जो कहते हैं कि इस साल देश में मई से अगस्त के दौरान 40 करोड़ 49 लाख लोग काम कर रहे हैं जबकि पिछले साल इस दरमियान 40 करोड़ 24 लाख लोग काम कर रहे थे यानि एक साल में 25 लाख नये रोजगार मिले हैं. गौर करने वाली बात ये है कि लो स्किल्ड जॉब में वृद्धि हुई है. लेकिन स्किल्ड जॉब नहीं बढ़े हैं.
सवाल ये है कि इस तस्वीर को कैसे बदला जा सकता है. तो इसके लिए बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है. पड़ोसी देश बांग्लादेश से भारत काफी कुछ सीख सकता है जिसने तरक्की करके अपने नौजवानों के लिए रोजगार के ज्यादा अवसर पैदा किए हैं.

2017 में भारत और बांग्लादेश की विकास दर लगभग एक जैसी थी. 2017 में भारत की विकास दर 7.2% और बांग्लादेश की 7.3% थी. 2019 में भारत की विकास दर 6.5% थी और बांग्लादेश 8.1% हो गया.
रोजगार पैदा करने का एक और तरीका है निर्यात आधारित अर्थव्यस्था...यानी भारत जमकर मेक इन इंडिया के रास्ते पर चले और मैन्यूफैक्चिरिंग सेक्टर को बढ़ाकर अपने बनाये सामान दुनिया को निर्यात करे.
Source: IOCL
























