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कर्नाटक के 'कुरुक्षेत्र' में कांग्रेस के पांच 'पाण्डवों' ने मिलकर दे दी बीजेपी को पटखनी

मजबूत रणनीति की वजह से ही कांग्रेस अंतिम वक्त में बाजी फिसलने नहीं दी और मुद्दों पर डटी रही. कांग्रेस को जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले इन्हीं 5 रणनीतिकारों के बारे में जानते हैं.

बीजेपी और जेडीएस के दबदबे को ध्वस्त करते हुए कांग्रेस ने कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2023 में एकतरफा जीत दर्ज की है. 2019 के लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारी कांग्रेस के लिए इसे शानदार वापसी के तौर पर भी देखा जा रहा है. 

आक्रामक प्रचार और सटीक रणनीति से कांग्रेस ने 2004 के बाद सभी रिकॉर्ड को तोड़ते हुए करीब 140 सीटें जीत ली है. प्रचार के लिए कांग्रेस ने जहां सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल, प्रियंका, डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया को मोर्चे पर लगाया था. 

वहीं 5 ऐसे नेता भी थे, जो पर्दे के पीछे से जीत की रणनीति तैयार कर रहे थे. रणनीति के तहत ही भ्रष्टाचार के खिलाफ कैंपेन चलाया गया था, जिसे पूरे चुनाव में सबसे अधिक कारगर माना गया. कांग्रेस के ये चुनावी रणनीतिकार काउंटर अटैक करने में भी सबसे आगे रहे. 

मजबूत रणनीति की वजह से ही कांग्रेस अंतिम वक्त में बाजी फिसलने नहीं दी और मुद्दों पर डटी रही. इस स्टोरी में कांग्रेस को जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले इन्हीं 5 रणनीतिकारों के बारे में जानते हैं...

1. रणदीप सिंह सुरजेवाला- कांग्रेस ने साल 2020 में केसी वेणुगोपाल की जगह रणदीप सिंह सुरजेवाला को कर्नाटक का प्रभारी महासचिव नियुक्त किया था. उस वक्त कर्नाटक में सरकार जाने के बाद कांग्रेस के भीतर आंतरिक गुटबाजी चरम पर थी. 

प्रभारी बनने के बाद सुरजेवाला ने सबसे पहले इसे खत्म किया. इसकी झलक भारत जोड़ो यात्रा के बाद चुनाव में भी दिखी. सुरजेवाला ने सिद्धारमैया और शिवकुमार गुट को हर जगह जोड़े रखा. टिकट वितरण की लड़ाई को भी बंद कमरे में ही सुलझा दिया.

चुनाव के दौरान सुरजेवाला वक्त-वक्त पर दोनों के साथ की तस्वीर शेयर कर एकजुटता का संदेश देते रहते हैं. सुरजेवाला की यह रणनीति काम कर गई. 

रणनीति तैयार करने के साथ ही सुरजेवाला बीजेपी पर सबसे अधिक हमलावर रहते हैं. कर्नाटक कांग्रेस के लिए मीडिया और सोशल मीडिया पर भी मोर्चा संभाले रहते हैं. 

चंडीगढ़ में जन्मे 55 साल के सुरजेवाला 1996 में पहली बार तब सुर्खियों में आए थे, जब उन्होंने कद्दावर नेता और मुख्यमंत्री रहे ओम प्रकाश चौटाला को नरवाना सीट से चुनाव हरा दिया.

सुरजेवाला हरियाणा विधानसभा में 4 बार विधायक रहे हैं. 2022 में कांग्रेस ने उन्हें राजस्थान से राज्यसभा में भेजा. सुरजेवाला कांग्रेस मीडिया के प्रभारी भी रह चुके हैं. 

सुरजेवाला 2000-2005 तक युवा कांग्रेस के अध्यक्ष भी रह चुके हैं. वकालत की पढ़ाई कर चुके सुरजेवाला भूपिंद्र सिंह हुड्डा कैबिनेट में ऊर्जा और पीडब्ल्यूडी जैसे महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री भी रहे हैं. 

2. एमबी पाटील- कांग्रेस का इस बार चुनावी कैंपेन आक्रामक रहा. कांग्रेस ने चुनावी कैंपेन में कई प्रयोग किए. राहुल गांधी अंतिम दौर में बसों में लोगों से बात करते नजर आए, जिसकी खूब चर्चा हुई.

कांग्रेस ने इस बार डोर टू डोर कैंपेन, जनसभा और रोड-शो पर विशेष फोकस किया. अंतिम वक्त में सोनिया गांधी की रैली भी कराई गई. दो बड़े लोकल लीडर सिद्धारमैया और शिवकुमार को जोन के हिसाब से कैंपेन का सौंपा गया.

शिवकुमार को बेंगलुरु और ओल्ड मैसूर जोन की कमान मिली थी, जबकि सिद्धारमैया कल्याण कर्नाटक और सेंट्रल कर्नाटक में डटे रहे. कांग्रेस को इसका फायदा मिला है और इन इलाकों में बड़ी जीत हासिल की है.

कांग्रेस के आक्रामक और धारदार कैंपेन के पीछे एमबी पाटील की रणनीति काम कर रही थी. लिंगायत समुदाय से आने वाले कांग्रेस के कद्दावर नेता मल्लेगौड़ा बसनगौड़ा पाटिल (एमबी पाटिल) कैंपेन कमेटी के चेयरमैन हैं.

कैंपेन के साथ ही दूसरे दलों के नेताओं को भी साधने का काम पाटील को ही मिला था. पूर्व सीएम जगदीश शेट्टार से निगोसिएशन का काम पाटील ने ही किया था और उन्हें कांग्रेस में लाने में बड़ी भूमिका निभाई थी.

पाटील कर्नाटक सरकार में गृह, जल संसाधन जैसे अहम विभागों के मंत्री रहे हैं. वे 1998 से 1999 तक लोकसभा के सांसद भी रहे हैं. पाटील ने अपनी राजनीतिक करियर की शुरुआत 1991 में की थी. 

कर्नाटक विधानसभा में 5 बार विधायक रहने वाले पाटील सिद्धारमैया और कुमारस्वामी सरकार में मंत्री रहे हैं. पार्टी के भीतर उन्हें सिद्धारमैया का करीबी भी माना जाता है. इसी वजह से कुमारस्वामी सरकार में उन्हें गृह जैसा महत्वपूर्ण विभाग मिला था. 

इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले एमबी पाटील को राजनीतिक विरासत में मिली है. उनके पिता बीएम पाटील कर्नाटक के बड़े राजनेता थे. 

3. सुनील कानुगोलू- अखिल भारतीय स्तर पर कांग्रेस के चुनावी रणनीतिकार सुनील कानुगोलू भी पूरे चुनाव तक कर्नाटक में ही डेरा डाले रहे. कानुगोलू और उनकी टीम ने सर्वे तैयार करने से लेकर कैंपेन, उम्मीदवारों का चयन और जीत की रणनीति तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभाई.

कानुगोलू की टीम सभी सीटों पर फीडबैक के आधार पर अपनी रिपोर्ट तैयार की, जिससे जीत के लिए रणनीति बनाने का काम आसान हुआ. कानुगोलू और उनकी टीम ने एंटी इनकंबेंसी को भुनाने की रणनीति भी तैयार की. इसके अलावा मेनिफेस्टो बनाने भी प्रमुख भूमिका निभाई.

चुनाव प्रचार अभियान के अंतिम समय में कांग्रेस ने अखबारों में बीजेपी सरकार का रेट कार्ड पब्लिश किया था. इस आइडिया के पीछे भी कानुगोलू की ही रणनीति थी.

अमेरिका से एमबीए की पढ़ाई कर 2009 में कानुगोलू भारत लौटे थे. इसके कुछ साल बाद नरेंद्र मोदी के साथ जुड़ गए. यहां पर प्रशांत किशोर की टीम सिटीजन फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस (CAG) से जुड़े. 

किशोर के बीजेपी से संबंध तोड़ने के बाद भी कानुगोलू का संपर्क नरेंद्र मोदी के साथ बना रहा. उन्हें एसोसिएशन ऑफ ब्रिलियंट माइंड्स का प्रमुख बनाया गया, जो बीजेपी के लिए रणनीति तैयार करने का काम करती है.

कानुगोलू 2017 में बीजेपी के लिए उत्तर प्रदेश में चुनावी रणनीति तैयार की. रिजल्ट मुफीद रहा और कानुगोलू की खूब चर्चा हुई. इसके बाद कानुगोलू कई पार्टियों के साथ रणनीतिकार के तौर पर जुड़े.

कानुगोलू पंजाब चुनाव 2022 में शिरोमणि अकाली दल के लिए रणनीति बना चुके हैं. राजनीतिक जानकारों के मुताबिक 2022 में प्रशांत किशोर से बात नहीं बनने के बाद कांग्रेस ने कानुगोलू से संपर्क साधा.

कानुगोलू कांग्रेस के 2024 टास्क फोर्स के मेंबर भी हैं. यह फोर्स 2024 चुनाव के लिए रणनीति तैयार करने का काम करेगी.

4. शशिकांत सेंथिल- कांग्रेस ने कर्नाटक चुनाव में एक-एक सीट पर अपनी रणनीति को अंजाम तक पहुंचाने के लिए बेंगलुरु में वार रूम बनाया था. कांग्रेस का यह वार रूम रणनीति बनाने के साथ ही समन्वय का काम भी करता था. 

वार रूम के जरिए ही एक-एक सीट पर चल रहे प्रचार अभियान का जायजा लिया जाता था और इसकी फीडबैक रिपोर्ट बड़े नेताओं को सौंपी जाती थी, जिससे रणनीति को और मजबूत किया जा सके. 

कर्नाटक कांग्रेस के वार रूम में फैक्ट चेक करने वाले लोगों को भी तैनात किया गया था, जिससे बीजेपी नेताओं के बयान और भाषणों को तुरंत काउंटर किया जा सके. साथ ही वार रूम में हेल्पलाइन भी 24x7 काम कर रहा था, जिससे फील्ड में तैनात उम्मीदवारों की समस्याओं को तुरंत हल किया जा सके.

कांग्रेस ने वार रूम का प्रभार अपने नेता और पूर्व आईएएस अधिकारी शशिकांत सेंथिल को सौंपा था. सेंथिल कर्नाटक कैडर के 2009 बैच के अधिकारी थे. 2019 में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ उन्होंने अपना इस्तीफा दे दिया था. 

इस्तीफा के वक्त सेंथिल दक्षिण कन्नड़ के उपायुक्त थे. 2020 में उन्होंने तमिलनाडु में प्रदेश प्रभारी दिनेश गुंडू राव के सामने कांग्रेस की सदस्यता ली थी. जुलाई 2022 में कांग्रेस ने सेंथिल को कर्नाटक चुनाव में वार रूम प्रभारी घोषित किया था.

44 वर्षीय सेंथिल मूल रूप से तमिलनाडु के रहने वाले हैं. कांग्रेस में शामिल होने वक्त सेंथिल ने पत्रकारों को बताया था कि बीजेपी कर्नाटक में हिंदुत्व के नाम पर लोगों को बांट रही थी, इसलिए मैंने आईएएस की नौकरी छोड़ दी.

वार रूम में सेंथिल के सहयोग के लिए कांग्रेस ने सूरज हेगड़े और मेहरोज खान को तैनात किया था. हेगड़े कर्नाटक कांग्रेस में उपाध्यक्ष और मेहरोज महासचिव पद पर तैनात हैं.

5. जी परमेश्वर- कर्नाटक चुनाव में इस बार कांग्रेस का मेनिफेस्टो खूब सुर्खियों में रहा. 62 पेज का यह मेनिफेस्टो ने मुकाबले को दो-तरफा बनाने में कारगर भूमिका निभाई. बजरंग दल पर बैन का वादा कांग्रेस के लिए लाभदायक रहा और पार्टी को मुस्लिमों का एकजुट वोट मिला. 

बजरंग दल पर बैन के साथ ही कांग्रेस मेनिफेस्टो की 5 गारंटी की भी खूब चर्चा हुई. जीत के बाद राहुल गांधी ने इसे तुरंत लागू करने की बात कही. मेनिफेस्टो बनाने में कर्नाटक कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जी परमेश्वर ने बड़ी भूमिका निभाई. परमेश्वर मेनिफेस्टो कमेटी के चेयरमैन हैं.

सियासी सुर्खियों से दूर रहने वाले जी परमेश्वर कर्नाटक कांग्रेस के अध्यक्ष और पूर्व डिप्टी सीएम रह चुके हैं. कृषि विज्ञान से पीएचडी करने वाले परमेश्वर 1989 में पहली बार विधायक बने.

1992 में वीरप्पा मोइली की सरकार में उन्हें कीट-रेशम विभाग का मंत्री बनाया गया. 1999 में एसएम कृष्णा की सरकार में उनकी पदोन्नति हुई और उच्च शिक्षा विभाग के मंत्री बनाए गए.

2015 में सिद्धारमैया की सरकार में परमेश्वर को गृह जैसा महत्वपूर्ण विभाग मिला. 2018 में कांग्रेस अकेले दम पर सत्ता में नहीं आ पाए तो जेडीएस के साथ समझौता कर लिया. समझौते के तहत कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बने और परमेश्वर उपमुख्यमंत्री.

परमेश्वर को इस बार भी बड़ा पद मिलने की अटकलें लगाई जा रही है. अगर उन्हें कैबिनेट में शामिल नहीं किया जाता है, तो वे विधानसभा के अध्यक्ष बन सकते हैं.

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