करूर की TVK रैली में भगदड़ मामले में कोर्ट ने विजय को दी बड़ी राहत, नौकरियों के विवाद पर जानें क्या कहा
करूर की TVK रैली में मारे गए 41 लोगों के परिवारों को सरकारी नौकरी देने के विजय सरकार के फैसले पर कोर्ट ने रोक लगाने से इनकार कर दिया है. कोर्ट ने इसे लेकर एक अहम फैसला सुनाया है.

मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने विजय सरकार को बड़ी राहत दी है. करूर की TVK रैली में मारे गए 41 लोगों के परिवारों को सरकारी नौकरी देने के तमिलनाडु सरकार के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है. हालांकि कोर्ट ने निर्देश दिया है कि ये नियुक्तियां पूरी तरह से अस्थायी होंगी और मामले के अंतिम नतीजे पर निर्भर करेंगी.
जस्टिस सीवी कार्तिकेयन और शक्तिवेल की बेंच ने कहा कि वे इस स्टेज पर सरकार के पॉलिसी फैसले में दखल नहीं देना चाहते. साथ ही बेंच ने कहा कि ये नियुक्तियां कोर्ट के फाइनल ऑर्डर के अधीन होंगी और निर्देश दिया कि लाभार्थियों को पहले महीने की सैलरी मिलने से पहले ही इन याचिकाओं पर सुनवाई हो जाए. अब मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई को होगी.
कोर्ट ने खुद से तमिलनाडु पब्लिक सर्विस कमीशन (TNPSC) को भी एक पक्ष बनाया और CBI को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया, जो सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में करूर भगदड़ की जांच कर रही है. नाम तमिलर काची के नेता थीरन थिरुमुरुगन और मनिथानेया जननायगा काची के पदाधिकारी सीनी अहमद की तरफ से दायर याचिकाओं में सरकार के उस प्रस्तावित फैसले पर रोक लगाने की मांग की गई थी, जिसके तहत पीड़ित परिवारों में से हर परिवार के 1 सदस्य को सरकारी नौकरी दी जानी थी.
याचिकाकर्ताओं के क्या हैं आरोप?
उन्होंने तर्क दिया कि इस तरह की नियुक्तियों से TNPSC और दूसरी कानूनी प्रक्रियाओं के जरिए होने वाली भर्ती प्रक्रिया को दरकिनार किया जाएगा, सरकारी नौकरी में समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन होगा और एक गलत मिसाल कायम होगी.
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि CBI जांच चल रही है, इसलिए पीड़ितों के परिवारों को सरकारी नौकरी देने से अहम गवाह प्रभावित हो सकते हैं और जांच की निष्पक्षता पर असर पड़ सकता है. उन्होंने कहा कि कुंबाकोणम स्कूल में आग लगने की घटना, धर्मपुरी बस जलाने का मामला और थूथुकुडी स्टरलाइट फायरिंग जैसी पिछली त्रासदियों में पीड़ितों के परिवारों को सरकारी नौकरी नहीं दी गई थी. ऐसी किसी भी योजना के लिए कानूनी आधार होना चाहिए.
कोर्ट ने क्या कहा?
मामले को लेकर जजों ने याचिकाकर्ताओं की आपत्तियों पर सवाल उठाए और पूछा, "जिन लोगों की जान गई, उनके परिवारों को सरकारी नौकरी देने में क्या गलत है? क्या प्रभावित परिवारों को आर्थिक मदद की जरूरत नहीं है?" याचिकाकर्ताओं ने जब इस मामले में राजनीति का का जिक्र किया, तो बेंच ने चेतावनी दी कि यह कोई राजनीतिक या सार्वजनिक मंच नहीं है. वकीलों से कहा कि वे अपनी दलीलें कानूनी मुद्दों तक ही सीमित रखें.
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