Explained: महिला आयोग, सरकार और सुप्रीम कोर्ट तक! राष्ट्रीय पुरुष आयोग क्यों नहीं बनने देना चाहते?
National Commission For Men: यह मांग नई नहीं है, लेकिन अभी तक सिर्फ मांग ही बनी हुई है. इसके रास्ते में कानूनी, राजनीतिक और सामाजिक अड़चनें हैं. तो क्या महिला आयोग को कमजोर किए बिना पुरुष आयोग बनेगा?

देश में महिला आयोग (NCW) बने हुए 30 से ज्यादा साल हो गए हैं. बच्चों के लिए NCPCR है, अल्पसंख्यकों के लिए NCM है, पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए अलग-अलग आयोग हैं, लेकिन पुरुषों के लिए कोई राष्ट्रीय आयोग नहीं है. यह सवाल पिछले कई सालों से उठ रहा है. कोर्ट में PIL दायर हुईं, संसद में बिल पेश हुआ, बाइकर्स ने 16,000 किलोमीटर की रैली निकाली, लेकिन आयोग अब तक नहीं बन पाया है. आखिर क्यों, क्या हैं अड़चनें और अगर यह आयोग बन जाता है तो क्या फायदे होंगे...
राष्ट्रीय पुरुष आयोग बनने की कब-कब उठी मांग?
2023 में शुरू हुई राष्ट्रीय पुरुष आयोग बनाने की मांग:
- सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई. याचिका में कहा गया कि शादीशुदा पुरुषों में आत्महत्या के बढ़ते मामलों को देखते हुए राष्ट्रीय पुरुष आयोग बनाया जाए. याचिका में NCRB के आंकड़ों का हवाला दिया गया. 2021 में 33.2% पुरुषों ने पारिवारिक समस्याओं के चलते आत्महत्या की, जबकि महिलाओं में यह आंकड़ा 4.8% था. सुप्रीम कोर्ट ने यह याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता 'एकतरफा तस्वीर' पेश कर रहे हैं. कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर किसी पुरुष के साथ कोई अन्याय हो रहा है तो वह पुलिस में शिकायत दर्ज कराए, आयोग बनाने की कोई जरूरत नहीं है.
- दूसरी बड़ी कोशिश 2025 में हुई. राज्यसभा सांसद डॉ. अशोक कुमार मित्तल ने 5 दिसंबर 2025 को 'नेशनल कमीशन फॉर मैन बिल 2025' पेश किया. यह एक प्राइवेट मेंबर बिल था यानी सरकार की तरफ से नहीं, बल्कि एक सांसद ने इसे पेश किया.
- तीसरी कोशिश 2025 में 80 से ज्यादा बाइकर्स ने 16,000 किलोमीटर की रैली निकाली, जिसका नाम था 'राइड फॉर मैंस कमीशन 2.0.' उनका कहना था कि पुरुषों की मानसिक स्वास्थ्य, बढ़ती आत्महत्याएं, घरेलू हिंसा और कानूनों के दुरुपयोग को नजरअंदाज किया जा रहा है.
- चौथी बार 2026 में मामला गर्म हुआ, जब पुणे के 26 वर्षीय केतन अग्रवाल की हत्या का मामला सामने आया. आरोप है कि उसकी मंगेतर और उसके दोस्त ने मिलकर उसकी हत्या की. इस केस ने एक बार फिर से सवाल उठाया, 'क्या पुरुष भी पीड़ित हो सकते हैं?' मित्तल ने X पर लिखा, 'केतन का केस याद दिलाता है कि पुरुष भी पीड़ित हो सकते हैं. उन्हें भी संस्थागत सहारा, कानूनी सुरक्षा और एक मंच चाहिए.'
इसके बावजूद क्यों नहीं बन पा रहा आयोग?
यह कानून बनने में 5 बड़ी अड़चनें हैं:
- कानूनी आधार का अभाव: सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में साफ कह दिया, 'पुरुष आयोग बनाने का कोई कानूनी आधार नहीं है.' कोर्ट ने यह भी कहा कि मौजूदा कानूनी व्यवस्था में पुरुषों को न्याय मिल सकता है, इसलिए अलग से आयोग की जरूरत नहीं. हालांकि, इस फैसले की काफी आलोचना हुई. आलोचकों का कहना है कि जब महिला आयोग, बाल आयोग, अल्पसंख्यक आयोग बन सकते हैं, तो पुरुष आयोग क्यों नहीं?
- प्राइवेट मेंबर बिल: मित्तल का बिल प्राइवेट मेंबर बिल है. भारत में आजादी के बाद से सिर्फ 14 प्राइवेट मेंबर बिल कानून बन पाए हैं. 1970 के बाद से कोई भी प्राइवेट मेंबर बिल दोनों सदनों से पास नहीं हो पाया है, यानी सरकार की तरफ से कोई पहल न हो, तो यह बिल कानून नहीं बन सकता.
- सरकार की दिलचस्पी नहीं: अब तक केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर कोई गंभीर पहल नहीं की है. न तो कोई सरकारी बिल आया है और न ही कोई कमेटी बनी है. महिला आयोग 1992 में बना था, तब से लेकर अब तक कोई भी सरकार पुरुष आयोग बनाने के पक्ष में नहीं आई.
- सामाजिक और राजनीतिक धारणा: समाज में एक धारणा है कि पुरुष 'उत्पीड़क' हैं और महिलाएं 'पीड़ित'. इस धारणा की वजह से पुरुषों की पीड़ा को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है. जब पुरुष घरेलू हिंसा का शिकार होता है या उसके खिलाफ झूठा मुकदमा दर्ज होता है, तो उसे सहानुभूति नहीं मिलती. कई एक्टिविस्टों का कहना है, 'पुरुषों की समस्याओं को लेकर कोई बात ही नहीं करता.'
- महिला आयोग और महिला संगठनों का विरोध: महिला आयोग और कई महिला अधिकार संगठनों को डर है कि अगर पुरुष आयोग बना तो महिलाओं के लिए बने कानूनों को कमजोर किया जा सकता है. इनका कहना है कि भारत में अभी भी महिलाओं के खिलाफ अपराध और भेदभाव बहुत ज्यादा है, इसलिए पहले उनकी सुरक्षा मजबूत होनी चाहिए.
राष्ट्रीय पुरुष आयोग विधेयक 2025 में क्या है?
मित्तल के बिल में 4 बड़े प्रस्ताव है, जिन्हें सवालों से समझते हैं:
1. क्या काम करेगा आयोग?
- पुरुषों के अधिकारों और कल्याण की रक्षा करना
- पुरुषों की शिकायतों की जांच करना
- मौजूदा कानूनों और नीतियों की समीक्षा करना
- पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य, आत्महत्या, घरेलू हिंसा और वर्क लोड पर स्टडी करना
- कानूनी सहायता, काउंसलिंग और पुनर्वास मुहैया कराना
2. किस तरह की होगी संरचना?
- अध्यक्ष और उपाध्यक्ष नियुक्त होंगे. इन्हें कानून, लोक प्रशासन, जेंडर स्टडीज, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान या सामाजिक कामों में कम से कम 15 साल का अनुभव हो
- अनुसूचित जाति/जनजाति से कम से कम एक सदस्य अनिवार्य
- 40 साल से कम उम्र का कम से कम एक सदस्य अनिवार्य
- जांच के दौरान सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां गवाह बुलाना या दस्तावेज मांगना
3. स्कूलों-कॉलेजों में क्या करेगा?
- CBSE, NCERT और UGC के साथ मिलकर जेंडर सेंसिटिविटी, हेल्दी मैस्क्युलिनिटी और इमोशनल इंटेलिजेंस पर प्रोग्राम चलाना
- मानसिक स्वास्थ्य और गैर-हिंसा को बढ़ावा देना
4. क्या महिलाओं के अधिकार कमजोर होंगे?
बिल में साफ लिखा है कि इसके किसी भी प्रावधान को महिलाओं के अधिकारों को कम करने के तौर पर नहीं समझा जाएगा. यानी महिला आयोग यथावत रहेगा और पुरुष आयोग अतिरिक्त सहारा होगा.
अगर आयोग बन गया तो क्या फायदे होंगे?
पुरुष आयोग की अध्यक्ष बरखा त्रेहन के मुताबिक, आयोग बनने के 5 बड़े फायदे होंगे:
- झूठे मुकदमों से बचाव: कई पुरुषों का आरोप है कि दहेज प्रताड़ना और घरेलू हिंसा जैसे कानूनों का गलत इस्तेमाल उनके खिलाफ किया जाता है. एक आयोग इन शिकायतों की निष्पक्ष जांच कर सकता है.
- पुरुषों की आत्महत्याओं पर रोक: NCRB के आंकड़े बताते हैं कि पुरुषों की आत्महत्या की दर महिलाओं से कई गुना ज्यादा है. एक आयोग मानसिक स्वास्थ्य काउंसलिंग, हेल्पलाइन और जागरूकता अभियान चलाकर इस दर को कम कर सकता है.
- घरेलू हिंसा के पुरुष पीड़ितों को आवाज: कानून के मुताबिक घरेलू हिंसा सिर्फ महिलाओं पर होती है. लेकिन कई पुरुष भी घरेलू हिंसा का शिकार होते हैं, लेकिन उनके पास कोई कानूनी सहारा नहीं है. यह आयोग उनकी आवाज बन सकता है.
- कानूनों में लैंगिक संतुलन: मौजूदा कानूनी व्यवस्था में कई कानून सिर्फ महिलाओं के पक्ष में हैं. एक पुरुष आयोग कानूनों की समीक्षा करके जेंडर न्यूट्रल कानूनों की सिफारिश कर सकता है.
- डेटा और रिसर्च: अभी तक पुरुषों की समस्याओं पर कोई व्यवस्थित डेटा नहीं है. यह आयोग रिसर्च और डेटा कलेक्ट करके सरकार को नीतियां बनाने में मदद कर सकता है.
आखिरकार क्या यह बिल कानून बनेगा?
इस बिल के पास होने की संभावना कम ही है. यह एक प्राइवेट मेंबर बिल है. सरकार की तरफ से कोई समर्थन नहीं है. सुप्रीम कोर्ट पहले ही इसे खारिज कर चुका है और महिला संगठनों का विरोध है. हालांकि, केतन अग्रवाल केस ने एक बार फिर इस बहस को गर्म कर दिया है. सोशल मीडिया पर #NationalCommissionForMen ट्रेंड कर रहा है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर सरकार इसे गंभीरता से लेती है और कोई सरकारी बिल लाती है, तभी यह संभव है.























