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'मुस्लिमों को इबादतगाह के बदले...', भोजशाला मामले को लेकर HC के फैसले पर जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष ने जताई आपत्ति

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष ने MP हाई कोर्ट के फ़ैसले पर गहरी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय को उनके स्थापित इबादतगाह के बदले कोई वैकल्पिक जमीन आवंटित करने का सुझाव भी चिंताजनक है.

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के हालिया फ़ैसले पर गहरी चिंता जताई है जिसमें कमाल मौला मस्जिद को मंदिर घोषित किया गया है. उन्होंने कहा कि इस फ़ैसले से न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता, अल्पसंख्यकों के अधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता, सांप्रदायिक सौहार्द और देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को लेकर गंभीर परिणाम होंगे.

क्या बोले सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी?

एक बयान में जमाअत के अध्यक्ष ने कहा, “यह फ़ैसला संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत दिए गए धार्मिक अधिकारों की सुरक्षा के संबंध में महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल खड़े करता है. दशकों तक, भोजशाला परिसर एक ऐसे प्रबंधन के तहत संचालित होता रहा, जिसने दोनों समुदायों को अपनी-अपनी धार्मिक प्रथाओं का पालन करने की अनुमति दी. एक समुदाय के स्थापित इबादत के अधिकारों को हटाकर दूसरे समुदाय को प्राथमिकता देना न केवल एक लंबे समय से चली आ रही व्यवस्था को बाधित करता है, बल्कि सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान के सिद्धांत को भी कमज़ोर करने का जोखिम पैदा करता है. इस तरह के घटनाक्रमों को अत्यंत सावधानी के साथ देखा जाना चाहिए और भारत जैसे बहुलवादी एवं विविध समाज में अपेक्षित नाजुक संतुलन को ध्यान में रखा जाना चाहिए.”

हुसैनी ने आगे कहा कि मुस्लिम समुदाय को उनके स्थापित इबादतगाह के बदले कोई वैकल्पिक ज़मीन आवंटित करने का सुझाव भी चिंताजनक है. धार्मिक अधिकारों को महज़ भौतिक स्थान या विस्थापन के सवालों तक सीमित नहीं किया जा सकता, क्योंकि इबादतगाह ऐतिहासिक निरंतरता, पहचान और सामूहिक स्मृति से गहरे तौर पर जुड़े होते हैं. ऐसा दृष्टिकोण जो किसी एक समुदाय को ऐतिहासिक रूप से साझा या विवादित स्थल से विस्थापित करता प्रतीत हो, अलगाव और अन्याय की भावना को जन्म देता है. 

इबादतगाह अधिनियम 1991 का दिया हवाला

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष ने कहा कि इस मामले को अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि इसे एक व्यापक रुझान के हिस्से के तौर पर देखा जाना चाहिए जिसमें धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों को फिर से उठाया जा रहा है. इबादतगाह (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 की अनदेखी की जा रही है, जिसका उद्देश्य पूजा स्थलों के उस धार्मिक स्वरूप को बनाए रखना था, जैसा कि वे स्वतंत्रता के समय मौजूद थे. ऐतिहासिक विवादों को फिर से खुलने से रोकने के लिए, 1991 के अधिनियम का उसकी मूल भावना के अनुरूप पालन किया जाना चाहिए. 

उन्होंने आगे कहा कि इस मामले को संवैधानिक नैतिकता, निष्पक्षता और सभी समुदायों के लिए न्याय के प्रति प्रतिबद्धता के साथ सुलझाया जाना चाहिए. न्यायपालिका को न केवल अपने कार्यों में निष्पक्ष होना चाहिए, बल्कि उसे निष्पक्ष दिखना भी चाहिए. दुर्भाग्यवश हाल की घटनाएं इसके विपरीत एक धारणा बना रही हैं, जिससे इस अत्यंत महत्वपूर्ण संस्था से जुड़ी विश्वसनीयता, गरिमा और जन-विश्वास के कमज़ोर पड़ने का खतरा उत्पन्न हो गया है. 

'पीड़ित मुस्लिम समुदाय कानून का सहारा लेगा' 

हुसैनी ने कहा कि पीड़ित मुस्लिम समुदाय सभी कानूनी उपायों का सहारा लेगा जिसमें अपील की संभावना भी शामिल है ताकि संविधान के दायरे में रहते हुए उनकी सभी चिंताओं को ठीक से सुना और उनका समाधान किया जा सके. सभी नागरिकों, विशेष रूप से अल्पसंख्यकों के अधिकारों और गरिमा की रक्षा करना राष्ट्र की लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष भावना को बनाए रखने के लिए अनिवार्य है.

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