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विशेष: तीस साल बाद बना अद्भूत संयोग, शरद पूर्णिमा के दिन लग रहा है चंद्र ग्रहण

28 अक्टूबर को साल 2023 का अंतिम चंद्र ग्रहण शरद पूर्णिमा के दिन लगेगा. ऐसा अद्भुत संयोग 30 वर्ष बाद बन रहा है. धार्मिक ग्रंथों के जानकार अंशुल पांडे से जानते और समझते हैं ग्रहण के बारे में.

ग्रहण को लेकर प्राचीन मान्यताएं और उनको अपनाने की रीतियां अब क्षीण होती जा रही हैं. आधुनिकता के चक्कर में लोगो ने यह भी भुला दिया है कि इन रिवाजों के पीछे वैज्ञानिकता भी है. बचपन में ग्रहण काल में घर से निकलना वर्जित था, खानपान बन्द रहता था, धर्मसिंधु और निर्णायक सिंधु आदि ग्रंथो में भी इसका वर्णन मिलता हैं. 

ग्रहण के दौरान देवी-देवताओं को छू नहीं सकते थे, मंदिर जाना भी वर्जित था. अनाजों और पानी में तुलसी के पत्ते डाल दिए जाते ताकि वे ग्रहण के कुप्रभाव से बचे रहे. ग्रहण समाप्ति पर पहले घर धोकर नहाया जाता, फिर दान पुण्य करके पुनः दिनचर्या आरम्भ होती. लेकिन अब तो यह रीति धीरे-धीरे कम होती जा रही है. पर शुद्धि तो रखनी चाहिए. ग्रहण चन्द्र पर हो या सूर्य पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता ही है. ग्रहण काल में कम से इतना तो प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए कि वह खान पान से बचे और ग्रहण उतरने पर स्नान अवश्य करे.

शरद पूर्णिमा पर लगेगा चंद्र ग्रहण

इसबार शरद पूर्णिमा काफी खास होगी क्योंकि चंद्र ग्रहण, शरद पूर्णिमा के दिन पड़ रहा है. शरद पूर्णिमा के दिन चंद्र ग्रहण लग रहा है. कई जानकारों के अनुसार, भारत में चंद्र ग्रहण 28 अक्टूबर 2023 को देर रात 01:15 पर शुरू होगा और देर रात 02.24 पर खत्म होगा. चंद्र ग्रहण में सूतक काल 9 घंटे पहले शुरू हो जाता है (कई ज्योतिषों की अलग-अलग समय की गणना है, आप अपने निजी ज्योतिष की भी राय ले सकते हैं). पहले सूतक काल से ही गतिविधियों पर रोक लगा दी जाती थी. पर आज के AI यानि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस वाले युग में गतिविधियों को लगाम देना लोगों को असम्भव लगता है. फिर भी वैज्ञानिकता भी ग्रहण से हम पर होने वाले प्रभाव को मानती है.

चन्द्रग्रहण तब पड़ता है जब पृथ्वी सूर्य और चन्द्रमा के बीच में आ जाती है. फलस्वरूप सूर्य की किरणों का प्रकाश सीधे चन्द्रमा पर न पहुंचकर पृथ्वी की गोले को छूकर चंद्रमा तक पहुंचता है. इस बार पूर्ण चन्द्र ग्रहण नही है. ऐसे समय गर्भवती महिलाओं को बाहर नहीं निकलना चाहिए.  चैन से रहनेवाली बात यह है कि यह ग्रहण तब पड़ रहा है जब अधिकांश लोग निद्रा ले रहे होंगे. 

चंद्र ग्रहण की कहानी स्कंद पुराण महेश्वर खंड अध्याय 12 में वर्णित है. इसके अनुसार, समुद्र मंथन के समय भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लिया था, ताकि अमृत देवताओं को मिले. मोहिनी ने सब दैत्यों को मोहित कर लिया था. दैत्यगण योग माया से मोहित हो चुके थे. वे अधिक समझदार भी नहीं थे. अतः मोहिनी देवी ने जो कुछ कहा, उसे ठीक मानकर उन्होंने सब वैसा ही किया.  रात को सबने बड़ी प्रसन्नता के साथ जागरण किया और उषाकाल आते ही प्रातःस्नान किया. समस्त आवश्यक कृत्य पूरा करके राजा बलि आदि असुर अमृतपान करने के लिए आये और क्रमशः पंगत लगाकर बैठ गए. बलि, वृषपर्वा, नमुचि, शंख, बुद्बुद, सुदंष्ट्र, संहाद, कालनेमि, विभीषण, वातापि, इल्वल, कुम्भ, निकुम्भ, प्रघस, सुन्द, उपसुन्द, निशुम्भ, शुम्भ तथा अन्यान्य दैत्य- दानव एवं राक्षस क्रमशः पंक्ति लगाकर बैठे.

उस समय मोहिनी देवी हाथ में सुधा-कलश लिए अपनी उत्तम कान्ति से बड़ी शोभा पा रही थीं. इसी समय सम्पूर्ण देवता भी हाथों में भोजन-पात्र लिये असुरों के समीप आए. उन्हें देखकर मोहिनी देवी ने असुरों से कहा- 'इन्हें आपलोग अपने अतिथि समझें . ये धर्म को ही सर्वस्व मानकर करने वाले हैं. इनके लिए यथाशक्ति दान देना चाहिये. जो लोग अपनी शक्ति के अनुसार दूसरों का उपकार करते हैं, उन्हें ही धन्य मानना चाहिए. वे ही सम्पूर्ण जगत के रक्षक तथा परम पवित्र हैं. जो केवल अपना ही पेट भरने के लिए उद्योग करते हैं, वे क्लेश के भागी होते हैं.'

मोहिनी देवी के यों कहने पर असुरों ने इन्द्रादि देवताओं को भी अमृत पीने के लिए बुलाया. तब सभी देवता सुधा पान के लिये वहां बैठे. उनके बैठ जाने पर सम्पूर्ण धर्मों को जानने वाली और देवताओं का स्वार्थ सिद्ध करने वाली मोहिनी देवी ने यह उत्तम बात कही- 'वैदिकी श्रुति कहती है कि सबसे पहले अतिथियों का सत्कार होना चाहिये. अब आप ही लोग बतावें- महाभाग राजा बलि आदि स्वयं कहें, मैं पहले किनको अमृत परोसूं?' बलि ने उत्तर दिया- 'देवि! तुम्हारी जैसी रुचि हो, वैसे ही करो.' पवित्रात्मा राजा बलि के द्वारा इस प्रकार सम्मान दिए जाने पर मोहिनी देवी ने परोसने के लिये अमृत का कलश हाथ में उठा लिया और पहले देवताओं के समुदाय को ही शीघ्रतापूर्वक अमृत देना आरम्भ किया.

भगवान विष्णु के रूप में मोहिनी देवी अपने सुधा-सदृश हासरसामृत की ही भांति उस अमृत- रस को भी देवताओं के आगे बारंबार उड़ेलने लगीं. उनके दिए हुए सुधारस को सम्पूर्ण देवताओं, देवेश्वरों, लोकपालों, गन्धर्वों, यक्षों और अप्सराओं ने खूब छककर पिया. उस समय राहु नामक दैत्य अमृत पीने के लिये देवताओं की पंक्तिमें जा बैठा. उसने ज्यों ही अमृत पीने की इच्छा की, सूर्य और चन्द्रमा ने अमित तेजस्वी भगवान विष्णु को इसकी सूचना दे दी. तब भगवान ने विकृत एवं विकराल शरीर वाले राहु का मस्तक काट डाला. उसका कटा हुआ मस्तक आकाश में उड़ गया और धड़ पृथ्वी पर गिर पड़ा.

उस समय सौ करोड़ मुख्य-मुख्य दैत्य गर्जते तथा महान् बल-पराक्रम वाले देवताओं को युद्ध के लिये ललकारते हुए आगे बढ़े. महाकाय राहु चन्द्रमा को अपना ग्रास बनाकर इन्द्र के पीछे दौड़ा. वह सम्पूर्ण देवताओं पर ग्रास लगाता जा रहा था. राहु यद्यपि एक ही था, तथापि वह सर्वत्र पहुंचा हुआ दिखाई देता था. यह देख देवता भय से विह्वल हो चन्द्रमा को आगे करके बड़ी उतावली के साथ भागे और पृथ्वी छोड़कर स्वर्गलोक में चले गये. वे स्वर्ग में ज्यों ही पहुंचे, त्यों ही राहु भी महान् वेग से उनके आगे आकर खड़ा हो गया। वह चन्द्रमा को निगल जाना चाहता था. यह देख चन्द्रमा ने भय से व्याकुल होकर भगवान शंकर की शरण में जाने का विचार किया.

वे मन-ही-मन शिवजी का स्मरण करके स्तुति करने लगे- 'देवेश ! आप हमारे रक्षक हों, वृषभध्वज ! मुझे संकट से  उबारें. शरणागत की रक्षा करने वाले श्रीपार्वतीपते! अपनी शरण में आए हुए मेरी रक्षा करें.' उनके इस प्रकार स्तुति करनेपर सबका कल्याण करने वाले भगवान् सदाशिव वहीं प्रकट हो गये और चन्द्रमा से बोले- 'डरो मत.' यों कहकर उन्होंने चन्द्रमा को अपने जटा जूट के ऊपर रख लिया. तब से चन्द्रमा उनके मस्तक पर श्वेत कमल पुष्पव की भांति शोभा पा रहे हैं.

चन्द्रमा की रक्षा होने के पश्चात् राहु भी वहां आ पहुंचा और भगवान् शिव की स्तुति करने लगा- 'शान्त स्वरूप भगवान शिव को नमस्कार है. आप ही ब्रह्म और परमात्मा हैं. आपको नमस्कार है. लिंग रूपधारी महादेव! जगत्पते! मैं आपको नमस्कार करता हूं. आप सम्पूर्ण भूतों के निवास स्थान, दिव्य प्रकाश स्वरूप तथा सब भूतों के पालक हैं. आपको नमस्कार है. महादेव! आप समस्त जगत की आनन्द प्राप्ति के कारण हैं. आपको प्रणाम है. मेरा भक्ष्य चन्द्रमा इस समय आपके समीप आया है. उसे आप मुझे दे दीजिए.'

राहु की इस प्रार्थना से भगवान सोमनाथ बहुत सन्तुष्ट हुए और उन्होंने राहु से इस प्रकार कहा- 'मैं सम्पूर्ण भूतों का आश्रय हूं, देवता और असुर सबको मैं प्रिय हू.' भगवान शिव के यों कहने पर राहु भी उन्हें प्रणाम करके उनके मस्तक में स्थित हो गया. तब चन्द्रमा ने भय के मारे अमृत का स्राव किया. उस अमृत के सम्पर्क से राहु के अनेक सिर हो गए इसलिए बदला लेने की दृष्टि से राहु हमेशा चंद्र देव पर ग्रहण लगाता है.

चंद्र ग्रहण के काल में सनातन ग्रंथो के अनुसार और वैज्ञानिको के अनुसार उस काल में खान पान का सेवन ना करें. आर्यभट्ट ने अपनी पुस्तक में चंद्र ग्रहण के बारे में विस्तृत रुप से चर्चा की है. सूर्य सिद्धांत (छाद्यछादकयोर्निर्णय 9 अनुसार):–

अत्रोपपत्ति:। चन्द्रो दर्शान्ते सूर्यादधो भवतीति चन्द्र: सूर्यस्य आच्छादक: । बुध शुक्रयोस्तु मण्डलाल्पत्वात्‌ न आच्छादकत्वम्‌ । चन्द्रस्य अधो ग्रहाभावात्‌ षड्भान्तरे भूम्या प्रतिबद्धा: सूर्यकिरणा: चन्द्रगोले न पतन्ति । अतो निष्परभस्य चन्द्रस्य भूभायां प्रवेश इति चन्द्रस्य भूभाच्छादिका ॥ 9 ॥

अर्थ: - सूर्य से नीचे स्थित चन्द्रमा मेघ की तरह सूर्य का आच्छादक होता है. पूर्वाभिमुख भ्रमण करता हुआ चन्द्रमा भूच्छाया में प्रवेश करता है. जिससे चन्द्र ग्रहण होता हैं. फिर आगे के श्लोक में कहते हैं: – ग्रहणे चन्द्रस्य वर्णज्ञानम्‌ के श्लोक संख्या 23 में कहते हैं की, चन्द्रग्रहण में चन्द्रबिम्ब का आधे से अल्प ग्रास होने पर ग्रस्तभाग धूम्रवर्ण का, अर्धाधिक ग्रस्त होने पर ग्रस्तभाग कृष्णवर्ण का, मोक्षाभिमुख अर्थात्‌ पादोनबिम्ब से अधिक ग्रास होने पर कृष्णताम्रवर्ण तथा सम्पूर्ण ग्रहण होने पर कपिलवर्ण (हल्का पीत वर्ण) होता है. सूर्यग्रहण में सूर्य का ग्रास सदैव कृष्णवर्ण ही होता है. आप सभी को डरने की जरूरत नहीं हैं क्योंकि जब ग्रहण लग रहा होगा तब अधिकांश भारतवासी निद्रा में होंगे.

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[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.]

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