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रूस- यूक्रेन युद्ध के बीच सेंट्रल यूरोप में उभरती वर्साय की नई संधि और बदलते भू राजनैतिक संबंध, भारत के लिए संभलकर चलने का वक्त

भारत विश्व स्तर पर अपनी भूमिका बढ़ाने को लेकर भी उत्सुक है. इसके साथ ही वह रूस और अमेरिका के साथ अपने कदम भी फूंक-फूंक कर रखना चाहेगा. यूरोप के बदलते समीकरण के मद्देनजर यह बहुत रोचक स्थिति है.

पिछले ही सप्ताह डेनमार्क, फिनलैंड, नॉर्वे और स्वीडन के वायुसेना प्रमुखों में यह सहमति बनी कि वे किसी भी तरह के रूसी खतरे का मुकाबला करने के लिए अपनी सेनाओं को एकीकृत करेंगे. उनके पास कुल मिलाकर 300 लड़ाकू विमान हैं और चारों ही देश अंततः एक सैन्य बल के तौर पर लड़ना चाहते हैं. यह बहुत ही खास बात है, क्योंकि शायद ही कभी कोई देश अपने सैन्यबल को दूसरे देश के साथ मिलाने को तैयार हो. दरअसल, उत्तरी यूरोप में असुरक्षा का भाव यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद से ही गहराया हुआ है. बदलते हुए हालात में कई दिलचस्प बातों में यह भी एक है, जिससे यहां की जियोपॉलिटिक्स बदलने का काफी चांस है. यह भारत के लिए भी एक मौका है. 

दुनिया 360डिग्री यानी वर्साय की नई संधि 

इन देशों के सैन्यबलों के समन्वय के साथ ही सुरक्षा के और प्रबंधों को भी लेखक सी राजा मोहन ने अपने एक आर्टिकल में 'वर्साय की नई संधि' कहा है. ऐसा इसलिए भी है कि पोलैंड इनकी धुरी जैसा है. शीतयुद्ध के दौरान पोलैंड पूर्वी यूरोपीय देशों के सोवियत ब्लॉक का ही हिस्सा था. तब यहीं वह मशहूर वर्साय की संधि हुई थी, जो पश्चिमी सैन्य संधि, नाटो (उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन) का जवाब देने के लिए बनी थी. सेंट्रल यूरोप में समय का चक्र आज पूरी तरह घूम गया है. जियो-पॉलिटिक्स सिर के बल आकर खड़ी हो गई है. आखिर, 'वर्साय की नई संधि' उसी रूसी पुनरुत्थान को चुनौती देने के लिए बनी है, जिसका वह कभी हिस्सा हुआ करता था. 

भौगोलिक स्तर पर दूर होने के कारण दिल्ली की समझ मॉस्को के बारे में लचीली ही रही है. हालांकि, रूस के पड़ोसी बिल्कुल दूसरी तरह सोचते हैं. आज भले ही चीन और रूस एक-दूसरे के विश्वस्त सहयोगी बने नजर आते हैं, लेकिन चीन का तब भी रूस से विवाद था, जब वहां जार का शासन था और सोवियत संघ के समय भी रहा है. भारत के लिए यह चुनौती और अवसर दोनों ही है कि वह रू-यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में सेंट्रल यूरोप को लेकर अपनी नीति तय करे. सेंट्रल यूरोपीय देशों की चिंता और सोच को समझकर ही भारत को एक दीर्घकालीन रणनीति बनानी चाहिए जो लंबे समय से चल रहे रूस-यूक्रेन युद्ध के साथ ही इसके यूरोप और दुनिया के लिए परिणामों को भी तय करेगा. 

भारत-रूस संबंध नई ऊंचाई पर 

फरवरी, 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध से पहले भारत के कच्चे तेल के आयात में रूस की हिस्सेदारी  एक प्रतिशत से भी कम थी। फिलहाल, भारत के आयात में रूस की हिस्सेदारी 34 प्रतिशत की है. यूक्रेन पर हमले के बाद पश्चिम ने रूस पर प्रतिबंध लगाए, जिसकी वजह से रूसी कच्चा तेल रियायती मूल्य पर उपलब्ध है. भारत इसकी जमकर खरीद कर रहा है. रूस लगातार छठे महीने भारत के लिए तेल का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है. यह तो हुई विशुद्ध अभी के बाजार की बात. इसके अलावा भारत को रूस के साथ जो सामरिक या आर्थिक सहयोग का इतिहास रहा है, उससे भी भारत लगातार अपनी डिप्लोमैटिक पोजीशन को बड़ी खूबी से किसी एक पक्ष में जाने से बचाए हुए है. हालांकि, अमेरिका और उसके सहयोगियों ने कई बार भारत को इसके लिए पूछा भी है, उकसाया भी है. 

दुनिया के कई दूसरे हिस्सों की तरह ही भारत में भी एक वर्ग ऐसा है जो यूक्रेन युद्ध को उस नाटो विस्तार की सहज प्रतिक्रिया मानता है, जिसे टाला जा सकता था. यह बात भले ही पूरी दुनिया या एक आदर्श स्थिति के लिए ठीक हो, लेकिन इसमें सेंट्रल यूरोप के हित और चिंताएं दब जाते हैं. रूसी विस्तारवाद को लेकर सेंट्रल यूरोप की ऐतिहासिक स्मृतियां बिल्कुल तथ्यगत हैं, लगभग ताजा हैं और वह एक जीवंत इतिहास का हिस्सा हैं. आज सेंट्रल यूरोप के देश अपने भाग्य का निर्णय खुद लेना चाहते हैं और बीते कुछ वर्षों में उन्होंने दिखाया है कि उनके पास ऐसा करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति और एजेंसी भी है. यूक्रेन ने एक साल से अधिक समय तक युद्ध को सस्टेन कर यह साबित भी किया है. 

भारत के लिए अवसर 

भारत ने अब तक यूक्रेन पर रूसी हमले की निंदा नहीं की है और यह कहता रहा है कि इस संकट का कूटनीति और बातचीत के माध्यम से हल किया जाना चाहिए. उसी  तरह इसी अप्रैल माह की शुरुआत में रूस ने जब अपनी अद्यतन विदेश नीति का ऐलान किया तो भारत उसकी इस विदेश नीति का अहम साझीदार होने जा रहा है. चूंकि भारत में अभी केंंद्रीय स्तर पर स्थिरता है, घरेलू हालात नियंत्रण में हैं और सबसे बढ़कर अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर मामला ठीक है, तो भारत भी अपनी वैश्विक भूमिका को लेकर कुछ नए दांव सोच सकता है. फिलहाल, भारत जी-20 के साथ ही SCO की भी अध्यक्षता कर रहा है और ये दोनों ही संगठन दुनिया के प्रभावी देशों के साथ तालमेल के लिए बढ़िया मंच और मौका हैं. 

भारत वैश्विक स्तर पर अपनी बात मुखरता और बराबरी से रख भी रहा है, नई रणनीतिक साझेदारियां भी कर रहा हैं. इसके साथ ही वह विश्व-मंच पर अपनी भूमिका तलाशने के लिए भी उत्सुक है, तो उसे आगे बढ़कर इस मौके का फायदा भी उठाना होगा. नाटो और रूस के साथ ही वर्साय की नई संधि के इस त्रिकोण को भी समझना होगा और तब पहलकदमी करनी होगी. कई बार कहा जाता है कि आप अपना स्टैंड इससे तय करते हैं कि आप बैठे कहां हैं? मॉस्को पर सेंट्रल यूरोप के विचार भारत से बिल्कुल अलग तो हैं ही, बल्कि उन पश्चिमी यूरोपीय देशों से भी अलग हैं, जिनकी सरहदें रूस के साथ नहीं लगती हैं. अमेरिका सेंट्रल यूरोप में ऐसी किसी भी नई संधि या सैन्य ढांचे का स्वागत करेगा, जो खुद अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी लें. ये नई सैन्य संधियां नाटो और यूरोपीय यूनियन के परे भी हो सकती हैं. साथ ही एक और जो मुद्दे की बात है, वह यह कि सेंट्रल यूरोप में किसी भी तरह का शक्ति-केंद्र बनना खुद ही पेरिस और जर्मनी के शक्ति-केंद्रों को संतुलित कर देगा. सेंट्रल यूरोप के देश अब फ्रांसीसी आदर्शवाद को तवज्जो नहीं दे रहे, जो रणनीतिक स्वायत्तता की बात करता है, बल्कि वह इंग्लैंड और ब्रिटेन का दखल चाहते हैं, ताकि इस क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित हो. 

भारत में जब से नरेंद्र मोदी केंद्र की सत्ता में हैं, तब से दिल्ली ने यूरोप को एंगेज करने में काफी डिप्लोमैटिक ऊर्जा लगाई है. इसमें सेंट्रल यूरोप और नॉर्डिक देश भी शामिल हैं. इस क्षेत्र की रूढ़िवादी पार्टियों के साथ भी बीजेपी की कुछ वैचारिक समानता देखी जा सकती है. हालांकि, रूस के यूक्रेन के साथ युद्ध ने भारत की सेंट्रल यूरोपीय रणनीति को गड़बड़ा दिया है. भारत का रूस के साथ लंबा रणनीतिक, सामरिक, आर्थिक सहयोग का इतिहास रहा है. दोनों देशों के बीच दीर्घकालीन रणनीतिक साझीदारी चली आ रही है और इसीलिए दिल्ली को अनूठे तरीके से सेंट्रल यूरोपीय देशों के साथ फिर से तालमेल बिठाना होगा जो यूरोप के रणनीतिक मानचित्र को बदलने के रास्ते पर कदम रख चुके हैं. 

मॉस्को के साथ संतुलन बनाते हुए भारत को यह कवायद करनी होगी कि सेंट्रल यूरोप और भारत के बीच पारस्परिक सहयोग के रास्ते खुलें. यह वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को नेतृत्व के स्तर पर भी पुख्ता करेगा और भविष्य के लिए कई दरवाजे भी खोलेगा. 

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