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Delhi Police SWAT Commando Case: कितनी कठिन होती है SWAT कमांडो की ट्रेनिंग, इसके लिए कैसे होता है चयन

Delhi Police SWAT Commando Case: दिल्ली पुलिस की एक SWAT कमांडो की मौत ने पूरे देश में बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं. आइए जानते हैं कि‌ एक SWAT कमांडो की ट्रेनिंग कितनी मुश्किल होती है.

Delhi Police SWAT Commando Case: दिल्ली पुलिस की 27 साल की SWAT कमांडो काजल चौधरी की दुखद मौत की घटना ने बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं. परिवार ने‌ यह आरोप लगाया है कि काजल को उसके पति ने बेरहमी से पीटा है. इसी बीच आइए जानते हैं कि आखिर एक SWAT कमांडो की ट्रेनिंग कितनी मुश्किल होती है और कमांडो बनने के लिए क्या करना पड़ता है. 

कोई सीधी भर्ती नहीं

SWAT यूनिट्स एलीट फोर्स है और बाहर से कोई भी सीधी भर्ती नहीं होती. सिर्फ वही लोग जो पहले से पुलिस फोर्स में काम कर रहे हैं SWAT कमांडो बनने का सपना देख सकते हैं.  उम्मीदवारों को पहले रेगुलर पुलिस ट्रेनिंग को पूरा करना होता है और कुछ साल एक्टिव ड्यूटी में काम करना होता है. 

सर्विस और फिटनेस के आधार पर स्क्रीनिंग 

सिलेक्शन प्रोसेस काफी सख्त स्क्रीनिंग से शुरू होता है. उम्मीदवारों को उनके सर्विस रिकॉर्ड, अनुशासन, फिजिकल कंडीशनिंग और मेडिकल फिटनेस के आधार पर शॉर्टलिस्ट किया जाता है. सिर्फ वही लोग जिनका रिकॉर्ड साफ है और जिनका परफॉर्मेंस लगातार अच्छा रहा है, वह अगले स्टेज में जाते हैं जहां से असली परीक्षा शुरू होती है.

फिजिकल और साइकोलॉजिकल टेस्टिंग 

शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों को कड़ी फिजिकल और साइकोलॉजिकल जांच से गुजरना पड़ता है. इसमें एंडोरेंस रन, लॉन्ग जंप, ऑब्सटेकल कोर्स और स्ट्रेंथ टेस्ट शामिल है. मानसिक मजबूती के जांच भी उतनी ज्यादा जरूरी है. इसमें उम्मीदवारों का मूल्यांकन किया जाता है कि वह दबाव, डर, तनाव और मुश्किल हालातों में फैसला कैसे लेते हैं.

यह ट्रेनिंग काफी ज्यादा मुश्किल होती है. दिल्ली पुलिस SWAT के लिए ट्रेनिंग की अवधि लगभग 10 महीने हैं. इसमें लगभग 9 महीने लगातार बेसिक और एडवांस्ड ड्रिल शामिल होती है. ट्रेनी 20-25 किलो का वजन उठाकर लंबी दूरी की दौड़, रॉक क्लाइंबिंग और यहां तक की पैराशूट से जुड़ी एक्सरसाइज भी करते हैं.

नींद की कमी और बहुत ज्यादा थकान 

इस ट्रेनिंग के सबसे मुश्किल पहलुओं में से एक है कंट्रोल्ड नींद की कमी. ट्रेनी को लंबे समय तक सिर्फ तीन से चार घंटे की ही नींद मिल सकती है. यह उन्हें असल जिंदगी में ऑपरेशंस के दौरान प्रभावी ढंग से काम करने के लिए तैयार करता है. 

आपको बता दें कि इस प्रक्रिया के दौरान सिलेक्शन और ट्रेनिंग के समय में लगभग 70% से 80% उम्मीदवार बाहर हो जाते हैं. केवल एक छोटा सा हिस्सा ही सफलतापूर्वक इस ट्रेनिंग को पूरा कर पाता है.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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