ऊंचाई से गिरने पर कैसे होती है मौत, क्या नीचे गिरने पर हो जाते हैं शरीर के टुकड़े?
ऊंचाई से गिरने पर अचानक गति रुकने और ब्लंट फोर्स ट्रॉमा से अंदरूनी अंग फटने से मौत होती है. अत्यधिक रफ्तार या नुकीली चीजों से टकराने पर ही शरीर टुकड़ों में बंट जाता है.

किसी ऊंची इमारत या पहाड़ी से अचानक गिरने पर इंसान की जान कैसे चली जाती है और उस समय शरीर पर क्या बीतती है, यह सवाल अक्सर लोगों के मन में उठता है. विज्ञान के नजरिए से देखें तो तेज रफ्तार से नीचे गिरकर जमीन से टकराने पर शरीर को जो भीषण झटका लगता है, वही मौत की सबसे बड़ी वजह बनता है. इस दौरान बेहद तेज गति से नीचे आ रहा शरीर जब एक माइक्रोसेकंड में अचानक रुकता है, तो अंदरूनी अंगों और हड्डियों पर इतना भयानक दबाव पड़ता है कि इंसान की मौके पर ही मौत हो जाती है.
अचानक रुकने की गति और शरीर पर जानलेवा असर
जब कोई व्यक्ति अत्यधिक ऊंचाई से नीचे गिरता है, तो उसके शरीर पर मुख्य रूप से दो भौतिक बल काम करते हैं. पहला है ब्लंट फोर्स ट्रॉमा यानी किसी भारी वस्तु या कठोर सतह से लगने वाला भीषण आघात, और दूसरा है डिसेलेरेशन इंजरी यानी अचानक गति का शून्य हो जाना. जब शरीर 100 से 200 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से सीधे कंक्रीट या सख्त जमीन से टकराता है, तो एक सेकंड के हजारवें हिस्से में उसकी गति रुक जाती है. गति में आया यह अचानक बदलाव शरीर के आंतरिक हिस्सों को पूरी तरह तहस-नहस कर देता है.
सिर और रीढ़ की हड्डी पर सबसे घातक चोट
ऊंचाई से गिरते समय अगर प्रभाव सिर या रीढ़ की हड्डी पर पड़ता है, तो मौत बेहद तुरंत और दर्दनाक होती है. खोपड़ी की सख्त हड्डियां जमीन के टकराने का दबाव झेल नहीं पातीं और तुरंत क्रैक हो जाती हैं. इससे दिमाग के मुख्य हिस्से पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाते हैं. रीढ़ की हड्डी टूटने या दिमाग को गहरा नुकसान पहुंचने से दिल की धड़कन और सांसों को नियंत्रित करने वाला केंद्रीय तंत्रिका तंत्र तुरंत काम करना बंद कर देता है. ऐसी स्थिति में इंसान के पास संभलने का एक मौका भी नहीं रहता.
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अंदरूनी अंगों का फटना और भीषण हैमरेज
कठोर सतह से टकराने का असर सिर्फ बाहरी त्वचा और हड्डियों तक सीमित नहीं रहता है. टक्कर के बाद पैदा होने वाली शॉक वेव शरीर के भीतर तेजी से फैलती है, जिससे दिल, फेफड़े, लिवर और तिल्ली (स्प्लीन) जैसे नाजुक अंग अपनी जगह से उखड़ जाते हैं या बुरी तरह फट जाते हैं. इसके साथ ही शरीर की मुख्य रक्त धमनियां और बड़ी नसें कट जाती हैं. नसों के फटने से शरीर के भीतर ही कुछ ही सेकंड में इतना अधिक खून बह जाता है कि इंसान तुरंत शॉक की स्थिति में चला जाता है और पलक झपकते ही उसकी सांसें थम जाती हैं.
हड्डियों का चकनाचूर होना और दर्द का अहसास न होना
जमीन से टकराते ही पसलियां, कूल्हे और हाथ-पैरों की मुख्य हड्डियां कई टुकड़ों में टूट जाती हैं. कई बार टूटी हुई पसलियां अंदरूनी अंगों जैसे फेफड़ों और दिल में गहराई तक चुभ जाती हैं. हालांकि, इस पूरे भयावह घटनाक्रम में एक राहत देने वाली बात यह होती है कि इंसान को इस दर्द का अहसास तक नहीं होता है. टकराने के माइक्रोसेकंड के भीतर ही मस्तिष्क का चेतना तंत्र पूरी तरह बंद हो जाता है, जिससे व्यक्ति को चोट या दर्द महसूस करने का समय ही नहीं मिलता और उसकी तत्काल बेहोशी में मौत हो जाती है.
क्या सच में नीचे गिरने पर शरीर के टुकड़े हो जाते हैं?
अमूमन 4 से 12 मंजिल की ऊंचाई से गिरने पर शरीर आंतरिक रूप से पूरी तरह से खत्म हो जाता है, लेकिन बाहरी तौर पर वह एक ढांचे के रूप में ही बना रहता है. इसका कारण यह है कि इंसानी त्वचा, मांसपेशियां और टिश्यू काफी मजबूत और लचीले होते हैं. शरीर के टुकड़े केवल बहुत खास और असाधारण परिस्थितियों में ही होते हैं. इसके लिए मुख्य रूप से दो स्थितियां जिम्मेदार होती हैं- या तो गिरने की ऊंचाई बेहद ज्यादा हो या फिर नीचे गिरते समय रास्ते में कोई नुकीली रुकावट मौजूद हो.

अत्यधिक ऊंचाई और रास्ते की नुकीली रुकावटें
यदि कोई इंसान 30 से 40 मंजिल या उससे भी अधिक ऊंचाई से गिरता है, तो वह 'टर्मिनल वेलोसिटी' यानी करीब 190 से 200 किलोमीटर प्रति घंटे की अधिकतम रफ्तार हासिल कर लेता है. इतनी प्रचंड गति से ठोस कंक्रीट पर टकराने से शरीर का ढांचा सहनशक्ति खो देता है और हाथ, पैर या सिर अलग हो सकते हैं. इसके अलावा, यदि गिरते वक्त शरीर किसी लोहे की ग्रिल, तार, बालकनी के नुकीले किनारे, बिजली के केबल या बाउंड्री वॉल के धारदार हिस्से से टकराता है, तो वह कटकर टुकड़ों में बंट जाता है.
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