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राजस्थान का रण: कहीं नारों ने किया परेशान, तो कहीं फूलमालाओं से स्वागत, वसुंधरा का इन दोनों से खूब हुआ आमना-सामना

राजस्थान की राजनीति को हाल के बरसों में वसुंधरा राजे की शख्सियत ने किसी जादूगर की तरह अपनी मुट्ठी में कर लिया. पहचान ऐसी बनी कि उन्हें आज तक चुनाव में कभी हार नहीं मिली.

नई दिल्ली: राजस्थान में इस बार का चुनाव बीजेपी बनाम कांग्रेस नहीं बल्कि वसुंधरा बनाम कांग्रेस की तरह देखा जा रहा है. यही वजह है कांग्रेस के निशाने पर मोदी से ज्यादा वसुंधरा नजर आईं और जवाब भी वसुंधरा की तरफ से ज्यादा दिया गया. राजस्थान की राजनीति को हाल के बरसों में वसुंधरा राजे की शख्सियत ने किसी जादूगर की तरह अपनी मुट्ठी में कर लिया. पहचान ऐसी बनी कि उन्हें आज तक चुनाव में कभी हार नहीं मिली. वो राजस्थान की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं और वो भी दो बार.

वसुंधरा की खासियत ये है कि उन्होंने राजनीति अपनी शर्तों पर की है. आमतौर पर हाईकमान के इशारे पर मुख्यमंत्रियों का खेल खेला जाता है. लेकिन वसुंधरा के आगे बीजेपी हाईकमान की एक नहीं चली. आरएसएस की नाराजगी और बीजेपी हाईकमान से तनातनी के बाद भी वसुंधरा राज्य में सीएम का चेहरा बनीं.

आखिर अपनी शर्तों पर राजनीति करने में कायमाब क्यों हो पाती हैं वसुंधरा? राजनीति का ये पाठ उन्होंने अपने राजपरिवार से सीखा. वसुंधरा राजे, सिंधिया घराने की रियासत और सियासत दोनों मध्य प्रदेश के ग्वालियर से नाता रखती हैं. ऐसे में राजस्थान की राजनीति में वसुंधरा की दस्तक दरअसल उनके परिवार से जुड़ी है.

वसुंधरा से पहले सिंधिया घराने की राजमाता विजयाराजे सिंधिया बीजेपी की संस्थापक सदस्य रह चुकी थीं. उनकी चार संतानों में से बड़ी बेटी शादी करके नेपाल चली गई. माधवराव सिंधिया ने कांग्रेस का दामन थाम लिया और मध्य प्रदेश में बीजेपी की राजनीतिक विरासत बहन यशोधरा राजे ने संभाल ली.

वसुंधरा की शादी धौलपुर के राजघराने के राजा हेमंत सिंह से हुई और राजस्थान उनका घर बन गया था. राजघराने से जुड़े होने और मां के राष्ट्रीय राजनीति में होने का उन्हें सीधा फायदा राजस्थान की राजनीति में मिला.

ऐसे हुई वसुंधरा की राजनीति की शुरुआत 1984 में 32 साल की युवा उम्र में उन्हें बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सदस्य बना दिया गया. अगले साल ही यानी साल 1985 में उन्हें राजस्थान बीजेपी युवा मोर्चे का उपाध्यक्ष बना दिया गया और दो साल से भी कम वक्त में यानी साल 1987 में वसुंधरा को राजस्थान बीजेपी का उपाध्यक्ष बना दिया गया था. साल 1985 में वो झालरापाटन से विधानसभा भी जा पहुंचीं.

राजस्थान की राजनीति में जसवंत सिंह और भैंरों सिंह शेखावत के होते हुए वसुंधरा की जगह बन नहीं पा रही थी इसलिए उऩ्हें केंद्र में भेजा गया. वो वाजपेयी सरकार में मंत्री बनाई गईं.

साल 2003 में राजस्थान विधानसभा के चुनाव थे. तब तक जसवंत सिंह वाजपेयी कैबिनेट के मंत्री बनकर केंद्र में आ चुके थे और भैरों सिंह शेखावत को उपराष्ट्रपति बना दिया गया था. शेखावत की जगह लेने के लिए पार्टी में प्रतिद्वंदी ताल ठोंक रहे थे कि तभी शेखावत ने वसुंधरा को अपनी विरासत सौंपने का फैसला किया.

वसुंधरा का हठयोग यहीं से वसुंधरा का हठयोग भी शुरु हो गया. उन्होंने खुद को पार्टी अध्यक्ष बनाए जाने की शर्त रखी. यही नहीं टिकटों के बंटवारे की जिम्मेदारी दिए जाने की शर्त भी रखी. पार्टी नेतृत्व को उनकी हर मांग माननी पड़ी. इसके बाद ही वसुंधरा ने परिवर्तन यात्रा निकाली जो बीजेपी और वसुंधरा दोनों के लिए परिवर्तन यात्रा साबित हुई.

इसके बाद दिसम्बर 2004 में चुनाव हुए, बीजेपी पहली बार अपने दम पर सत्ता में आई. जो काम भैरोंसिंह नहीं कर सके वो वसुंधरा ने कर दिखाया. राज्य में पहली बार कोई महिला मुख्यमंत्री बनी थी वो भी राजघराने से जुड़ी हुई. वसुंधरा राजे साल 2003 में राजस्थान की मुख्यमंत्री बन गई थीं लेकिन 2008 में ये जादू नहीं चल पाया. उस वक्त आरोपों के बावजूद वसुंधरा राजे ने ललित मोदी से रिश्ते नहीं तोड़े थे. गहलोत सरकार आने पर वसुंधरा निशाने पर भी आईं. लेकिन बीजेपी हाईकमान तब भी वसुंधरा को पीछे छोड़ आगे बढ़ने का खतरा नहीं उठा पाया.

हाईकमान से तनातनी खूब चर्चित हुई वसुंधरा ने विपक्ष में रहते हुए तो हाईकमान को खूब नचाया था. उस वक्त तत्कालीन राजस्थान बीजेपी अध्यक्ष ओम प्रकाश माथुर से उनकी तनातनी खूब चर्चित हुई थी. इसके बाद भी 2013 में बीजेपी के पास वसुंधरा को छोड़कर कोई चेहरा नहीं था.

वसुंधरा कैसे सबसे अपने को जोड़ने में कामयाब हो जाती हैं? वसुंधरा में खासियत ये है कि वो हर जगह से अपने को जोड़ लेती हैं. वसुंधरा राजपूतों से कहती हैं कि बेटी को राज दो. जाटों से गुहार करती कि मुंह दिखाई में बहू को ताज दो. गुर्जरों से कहती कि समधिन चुनरी का मान रखेगी. पढ़े लिखों के लिए तेजतर्रार चेहरा सामने रखती हैं, तो गरीबों की रहनुमा की तरह पेश आती हैं.

2013 में जीत ने वसुंधरा का कद और बढ़ा दिया. बीजेपी को 163 सीटें मिलीं जबकि 2014 लोकसभा चुनावों में राजस्थान से बीजेपी को 25 की 25 सीट मिलीं.

दूसरी बार मुख्यमंत्री बनी वसुंधरा की ही जिद थी कि बीजेपी के कद्दावर नेता जसवंत सिंह को साल 2014 में बाड़मेर की सीट से टिकट ना दिया जाए. जसवंत सिंह को तब निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरना पड़ा था. तब का फैसला अब वसुंधरा के सिर पर आ पड़ा है. इस बार जसवंत सिंह के बेटे मानवेंद्र सिंह कांग्रेस की टिकट पर झालरापाटन सीट से ताल ठोंक रहे हैं.

मदन लाल सैनी के अध्यक्ष बनने में क्या वसुंधरा की जीत छिपी है? इस बार भी वसुंधरा के हठयोग की वजह से राजस्थान में चुनावी साल होने के बाद भी 75 दिन तक अध्यक्ष नियुक्त नहीं हो पाया था. दरअसल वसुंधरा के खास अशोक परनामी को हटाए जाने के बाद बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने गजेंद्र सिंह शेखावत को अध्यक्ष बनाने की ठानी थी. लेकिन वसुंधरा अड़ गईं. आखिरकार हार अमित शाह को माननी पड़ी और मदन लाल सैनी राजस्थान बीजेपी के अध्यक्ष बने.

इस बार टिकट बंटवारे से लेकर प्रचार की कमान भी वसुंधरा राजे ने ही संभाली थी. उन्होंने एक दिन में चार-चार जिलों का दौरा किया और आधा दर्जन सभाएं रोज कीं. वो रास्ते में रूक-रूक कर लोगों से मिलती नजर आईं.

हालांकि सर्वे और उपचुनावों के नतीजों से बीजेपी हाईकमान को लगा कि राजस्थान में वसुंधरा के हालात अच्छे नहीं है. कई सभाओं में वसुंधरा के खिलाफ नारे लगते दिखाई दिए. यही वजह है कि आखिर में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने ताबड़तोड़ रैलियां कीं और जमकर बजरंगबली के नाम का इस्तेमाल किया. इस बार राजस्थान में योगी ने 24 रैलियां कीं जबकि मोदी ने सिर्फ 13 रैलियां. इसी बात को राजनीति के जानकार संकेत की तरह देख रहे हैं.

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वसुंधरा का केन्द्रीय नेतृत्व के साथ खराब समीकरण और प्रदेश में पार्टी और संघ के भीतर उनके विरोधियों की बड़ी तादाद भी कोई छिपी बात नहीं है. लेकिन वसुंधरा को इससे फर्क नहीं पड़ता. यही वो अंदाज है जो उन्हें वसुंधरा राजे सिंधिया बनाता है. एक बार फिर वसुंधरा राजे को 11 दिसंबर के नतीजों का इंतजार है.

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