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अयोध्या विवाद: मोदी सरकार के SC जाने पर कांग्रेस ने पूछा- लोकसभा चुनाव से ठीक 2 महीने पहले ही क्यों?

Ayodhya Dispute: सुप्रीम कोर्ट ने 2003 में असलम भूरे बनाम भारत सरकार मामले में फैसला देते वक्त माना था कि पूरी जमीन पर यथास्थिति बरकरार रखना ज़रूरी है. ताकि विवादित भूमि का फैसला जिसके भी पक्ष में आए, उसे उस जगह तक पहुंचने में दिक्कत न आए.

नई दिल्ली: लोकसभा चुनाव से ठीक पहले अयोध्या का राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद सुर्खियों में है.राम मंदिर को लेकर संत समाज, हिंदुवादी संगठन, वीएचपी, आरएसएस और शिवसेना मोदी सरकार से कानून लाए जाने की मांग कर रहा है. इस बीच केंद्र सरकार ने ऐसा कदम उठाया है जिसपर विपक्षी दलों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी देकर कहा है कि वो अयोध्या में विवादित जमीन के आसपास की ज़मीन उसके मूल मालिकों को लौटाना चाहती है. इसलिए कोर्ट पूरी जमीन पर यथास्थिति बरकरार रखने का अपना आदेश वापस ले ले.

सरकार ने अपनी अर्जी में कहा है कि जिस जमीन का मुकदमा इलाहाबाद हाई कोर्ट में चला और अब सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, वो सिर्फ 0.3 एकड़ है. लेकिन कोर्ट ने कुल 67.7 एकड़ जमीन पर यथास्थिति बरकरार रखने का आदेश दिया हुआ है. इस सारी जमीन का अधिग्रहण 1993 में केंद्र सरकार ने किया था. अब सरकार विवादित 0.3 एकड़ जमीन को छोड़ कर बाकी उसके मूल मालिकों को लौटाना चाहती है. कोर्ट इसकी इजाजत दे.

सरकार के इस कदम पर कांग्रेस ने सवाल उठाए हैं. कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने सवाल किया, "16 साल सोए रहने के बाद सरकार अचानक कैसे जाग गई, वह भी लोकसभा चुनाव से ठीक दो महीने पहले?"

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सरकार की नियति पर सवाल उठाते हुए सिंघवी ने अदालत के 2003 के उस निर्णय का हवाला दिया, जिसके तहत जबतक पूरे मामले में अंतिम निर्णय नहीं आ जाता, तबतक निर्विवादित भूमि सहित पूरी जमीन पर यथास्थिति बनी रहेगी. उन्होंने कहा, "सुप्रीम कोर्ट का निर्णय बिल्कुल स्पष्ट है, लेकिन चुनाव से पहले उस निर्णय में बदलाव लाने के लिए सरकार के कदम पर सवाल उठ रहा है."

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 2003 में असलम भूरे बनाम भारत सरकार मामले में फैसला देते वक्त माना था कि पूरी जमीन पर यथास्थिति बरकरार रखना ज़रूरी है. ताकि विवादित भूमि का फैसला जिसके भी पक्ष में आए, उसे उस जगह तक पहुंचने में दिक्कत न आए. यानी ऐसा न हो कि जिस पक्ष को आखिरकार ज़मीन मिले, वो इस वजह से ज़मीन तक न पहुंच सके कि उसके चारों तरफ निर्माण हो गया है.

सरकार की दलील है कि सिर्फ इस वजह से पूरी जमीन को रोक कर रखना गलत होगा. सरकार ने कहा है कि विवादित जमीन तक आने जाने का रास्ता देने के लिए जगह छोड़ने को तैयार है. इसके अलावा बाकी जमीन उसके मूल मालिकों को लौटा दी जानी चाहिए.

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अगर सुप्रीम कोर्ट सरकार की अर्ज़ी को मान लेता है तो गैर विवादित जमीन उसके मूल मालिकों को लौटाना संभव हो सकेगा. ऐसे में जो 67.4 एकड़ जमीन उसके मूल मालिकों को लौटाई जाएगी, उसमें से 42 एकड़ राम जन्मभूमि न्यास को मिलेगी. इसके अलावा जो बाकी जमीन है, वो भी ज्यादातर हिंदू पक्षकारों की है. जमीन वापस लौटने का सीधा असर ये होगा कि विवादित स्थान से जुड़े इलाकों में मंदिर का निर्माण शुरू हो सकेगा. इसको सीधे अर्थों में समझे तो प्रस्तावित मंदिर के गर्भ गृह की जगह पर यानी जिस जगह पर भगवान राम के पैदा होने का दावा किया जाता है या जहां 6 दिसंबर 1992 से पहले बाबरी मस्जिद नाम का विवादित ढांचा मौजूद था, उसे छोड़कर हर तरफ मंदिर का निर्माण हो सकेगा.

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