venezuela Oil Crisis: दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला इस समय गहरे संकट के दौर से गुजर रहा है. दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले इस देश पर अमेरिकी हमले का असर सिर्फ वाशिंगटन तक सीमित नहीं रहने वाला, बल्कि आने वाले दिनों में इसका प्रभाव वैश्विक स्तर पर महसूस किया जा सकता है. भारत की बात करें तो फिलहाल कोई सीधा लाभ नजर नहीं आता, लेकिन दीर्घकाल में यह घटनाक्रम भारत के लिए अवसर भी पैदा कर सकता है.
अगर वैश्विक तेल बाजार में वेनेजुएला की दोबारा एंट्री होती है और वहां निवेश के रास्ते खुलते हैं, तो भारतीय रिफाइनर्स और तेल कंपनियों को बड़ा फायदा मिल सकता है. इसी उम्मीद का असर सोमवार को शेयर बाजार में देखने को मिला, जब रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयर में करीब एक प्रतिशत की तेजी आई और यह 52 हफ्ते के उच्चतम स्तर 1,611.80 रुपये पर पहुंच गया. इससे कंपनी का मार्केट कैप बढ़कर करीब 22 लाख करोड़ रुपये हो गया.
कैसे बदलेगा तेल का खेल?
तेल एवं गैस सेक्टर की अन्य कंपनियों में भी मजबूती देखने को मिली. हिंदुस्तान पेट्रोलियम 1.85 प्रतिशत की तेजी के साथ इंट्रा-डे में 508.45 रुपये पर पहुंचा. ओएनजीसी 1.16 प्रतिशत चढ़कर 246.80 रुपये, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन 1.03 प्रतिशत की बढ़त के साथ 168.79 रुपये और ऑयल इंडिया 0.47 प्रतिशत की मजबूती के साथ 432.45 रुपये पर कारोबार करता नजर आया.
विशेषज्ञों की राय इस पूरे घटनाक्रम को लेकर बंटी हुई है. जियोजीत इन्वेस्टमेंट्स के मुख्य निवेश रणनीतिकार वी.के. विजयकुमार का कहना है कि 2026 की शुरुआत में वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले ने बड़े भू-राजनीतिक बदलावों के संकेत दे दिए हैं. इससे वैश्विक जियोपॉलिटिक्स और ज्यादा अस्थिर हो सकती है. ईरान में विरोध प्रदर्शन तेज हो सकते हैं, रूस-यूक्रेन युद्ध के और लंबा खिंचने की आशंका है, वहीं चीन भी इन हालातों का फायदा उठाकर ताइवान को लेकर आक्रामक कदम उठा सकता है. हालांकि, उनका मानना है कि लंबे समय में वेनेजुएला संकट से भारत को तेल कीमतों में राहत मिल सकती है.
क्या होंगे बड़े असर?
वरिष्ठ पत्रकार रुमान हाशमी के मुताबिक, जिस तरह से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप रूस से तेल आयात को लेकर भारत पर दबाव बना रहे हैं और अब वेनेजुएला में सीधे हस्तक्षेप कर वहां की सत्ता पर पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, उससे वैश्विक तेल कारोबार पर दूरगामी असर तय है. उन्होंने कहा कि ट्रंप कोलंबिया और ब्राजील को भी चेतावनी दे रहे हैं और भारत पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की बात कर रहे हैं. जिस तरह इराक में सत्ता परिवर्तन के बाद वहां की सरकार अमेरिका के प्रभाव में आ गई थी, वैसा ही परिदृश्य वेनेजुएला में भी देखने को मिल सकता है.
हाशमी ने यह भी स्पष्ट किया कि रूस से तेल आयात करना भारत का राजनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक फैसला है. वैश्विक तेल बाजार में भारत की अहम भूमिका है और इसे यूक्रेन युद्ध को फंड करने से जोड़ना गलत है.
कुल मिलाकर, वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले के बाद वैश्विक तेल बाजार में बड़ी उथल-पुथल के संकेत मिल रहे हैं. इन घटनाओं का असर आने वाले दिनों में तेल की कीमतों, भू-राजनीतिक समीकरणों और भारतीय ऊर्जा कंपनियों की रणनीति पर साफ तौर पर दिखाई दे सकता है.
भारत पर क्या असर?
भारत के नजरिए से देखें तो वेनेजुएला के साथ उसके रिश्तों की बुनियाद काफी हद तक तेल आयात पर टिकी रही है. अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते 2021 और 2022 में दोनों देशों के बीच कच्चे तेल के कारोबार में तेज गिरावट आई थी, लेकिन हालात बदलने के साथ 2023-24 में यह व्यापार दोबारा रफ्तार पकड़ता नजर आया. इस दौरान वेनेजुएला से भारत का पेट्रोलियम आयात बढ़कर करीब 1 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया.
द फाइनेंशियल एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दिसंबर 2023 में भारत कुछ समय के लिए वेनेजुएला के कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार भी बन गया था. हालांकि मौजूदा स्थिति में चीन वेनेजुएला के कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक बना हुआ है. यह आंकड़े साफ तौर पर दिखाते हैं कि वैश्विक प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक तनावों के बावजूद भारत और वेनेजुएला के बीच ऊर्जा सहयोग फिर से मजबूत होने लगा है, जो भविष्य में भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से अहम भूमिका निभा सकता है.
























