Explained: राजेश एक्सपोर्ट्स घोटाला में सेबी ने कैसे पकड़ा 15 लाख करोड़ का 'कागजी' कारोबार, क्यों LIC ने बढ़ाई हिस्सेदारी?
Rajesh Exports Scam: राजेश मेहता और उनके सहयोगियों पर आपराधिक मुकदमे चल सकते हैं. कंपनी के शेयरधारकों के लिए तो अब कुछ हाथ न आए, लेकिन यह पूरा प्रकरण भारत के वित्तीय बाजारों के लिए एक बड़ी चेतावनी है.

राजेश मेहता... यह नाम भारत के गोल्ड मार्केट में एक ब्रांड था. राजेश एक्सपोर्ट्स को दुनिया की सबसे बड़ी गोल्ड रिफाइनरी और सोने के कारोबार में एक मजबूत कंपनी के रूप में देखा जाता था. लेकिन जून 2026 की शुरुआत में सेबी ने अपनी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की तो यह 'गोल्डन ब्रांड' एक ऐसे वित्तीय धोखे का चेहरा बन गया. इसने पूरे बाजार को हिलाकर रख दिया.
सेबी का आरोप है कि कंपनी ने अपने राजस्व को 15 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया. यह रकम कई राज्यों की अर्थव्यवस्था से भी ज्यादा है. इस खेल में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि जहां एक तरफ ज्यादातर म्यूचुअल फंडों ने पिछले दस सालों में इस कंपनी से दूरी बना ली थी, वहीं देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी LIC ने अपनी हिस्सेदारी पांच गुना बढ़ाकर 10.8% कर ली. आइए एक्सप्लेनर में समझते हैं कि यह घोटाला है क्या, सेबी ने इसका पर्दाफाश कैसे किया और इसमें LIC की भूमिका आखिर क्या है?
राजेश एक्सपोर्ट्स है क्या और यह कंपनी इतनी चर्चित क्यों थी?
राजेश एक्सपोर्ट्स की स्थापना 1989 में राजेश मेहता ने की थी. यह कंपनी खुद को सोने की रिफाइनिंग, आभूषण निर्माण और निर्यात के कारोबार में वैश्विक लीडर बताती थी. बेंगलुरु स्थित इस कंपनी का दावा था कि वह हर साल करीब 500 टन सोना रिफाइन करती है, जो भारत की कुल सोने की मांग का एक बड़ा हिस्सा है. शेयर बाजार में भी यह कंपनी बड़ा नाम थी और एक समय इसका मार्केट कैप हजारों करोड़ रुपये में था. लेकिन पिछले कुछ सालों से कंपनी के कारोबार को लेकर सवाल उठने लगे थे. इसके शेयर की कीमत 2022 में 900 रुपये के उच्चतम स्तर से गिरकर 2026 तक 30 रुपये से भी नीचे आ चुकी थी. शेयर में इस गिरावट के पीछे जो राज छिपा था, सेबी ने अपनी जांच में उसे उजागर कर दिया.
सेबी ने कैसे 15 लाख करोड़ रुपये के वित्तीय 'घोटाले' का पर्दाफाश किया?
सेबी की जांच ने इस कंपनी के कारोबारी मॉडल की पोल खोलकर रख दी. जांच में पाया गया कि राजेश एक्सपोर्ट्स ने अपने राजस्व को आर्टिफिशियली बढ़ाने के लिए फर्जी बिक्री और खरीद का एक जटिल जाल बुन रखा था. सेबी के मुताबिक, कंपनी ने वित्त वर्ष 2023-24 में 3.41 लाख करोड़ रुपये के राजस्व की सूचना दी थी, लेकिन असल में इसका 98% हिस्सा कागजी था.
कंपनी एक ही माल को बार-बार खरीदती और बेचती थी, जिससे राजस्व के आंकड़े फुलाए जाते थे. इस खेल में कई शेल कंपनियों और संबद्ध पक्षों का इस्तेमाल किया गया, जिनके जरिए बिना किसी वास्तविक माल की आवाजाही के सिर्फ बिल तैयार किए जाते थे.
इस पूरी धोखाधड़ी को सेबी ने पिछले दस सालों के वित्तीय रिकॉर्ड खंगालकर पकड़ा. एजेंसी ने पाया कि 2014-15 से 2023-24 के बीच कंपनी ने कुल मिलाकर करीब 15 लाख करोड़ रुपये का फर्जी राजस्व दिखाया. सेबी ने अपने आदेश में कहा कि कंपनी ने जानबूझकर निवेशकों को गुमराह किया और शेयर की कीमत को आर्टिफिशियली बढ़ाए रखने की कोशिश की. नतीजतन, सेबी ने राजेश मेहता समेत कंपनी के शीर्ष अधिकारियों पर शेयर बाजार से प्रतिबंध लगा दिया और भारी जुर्माना ठोका.
पिछले 10 सालों में म्यूचुअल फंडों ने राजेश एक्सपोर्ट्स से दूरी क्यों बनाए रखी?
यह इस घोटाले का एक दिलचस्प पहलू है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक दशक में ज्यादातर घरेलू म्यूचुअल फंडों ने राजेश एक्सपोर्ट्स में निवेश करने से परहेज किया. इसकी वजह थी कंपनी के कारोबारी मॉडल पर लगातार उठ रहे सवाल. कंपनी बहुत बड़ा राजस्व तो दिखाती थी, लेकिन उसका मुनाफा बहुत मामूली था. यह गड़बड़ अनुभवी फंड मैनेजरों के लिए एक चेतावनी संकेत था.
इसके अलावा, कंपनी के शेयर की कीमत और उसके वास्तविक प्रदर्शन के बीच का बड़ा अंतर भी संदेह पैदा करता था. म्यूचुअल फंड उद्योग ने सामूहिक रूप से इस कंपनी से किनारा कर लिया, जो उनकी सूझबूझ को दर्शाता है. हालांकि, कुछ छोटे फंडों और पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज ने इसमें निवेश किया था, लेकिन कुल मिलाकर संस्थागत निवेश का बड़ा हिस्सा इससे दूर ही रहा.
LIC में इसकी हिस्सेदारी पांच गुना बढ़कर 10.8% क्यों हो गई?
जहां म्यूचुअल फंड कंपनी से दूर भाग रहे थे, वहीं देश की सबसे बड़ी संस्थागत निवेशक LIC ने ठीक उल्टा दांव खेला. सेबी की रिपोर्ट के मुातबिक, LIC ने अपनी हिस्सेदारी पिछले कुछ सालों में लगातार बढ़ाई और यह करीब पांच गुना बढ़कर 10.8% तक पहुंच गई. सवाल यह है कि LIC ने ऐसा क्यों किया जबकि दूसरे संस्थागत निवेशक इस शेयर को हाथ भी नहीं लगा रहे थे? इसके कई संभावित कारण सामने आते हैं.
- पहला, LIC अक्सर लंबी अवधि के निवेश का नजरिया रखती है. उसे उम्मीद थी कि कंपनी का गोल्ड रिफाइनिंग का बुनियादी कारोबार आखिरकार मुनाफा देगा.
- दूसरा, हो सकता है कि LIC ने कंपनी के वित्तीय दावों की गहराई से जांच नहीं की और वही गलती दोहराई जो कई खुदरा निवेशक करते हैं. बड़े नाम और बड़े राजस्व के आंकड़ों पर भरोसा कर लेना.
- तीसरा, कुछ एक्सपर्ट्स यह भी सवाल उठाते हैं कि क्या LIC के निवेश के फैसले पूरी तरह से पेशेवर विश्लेषण पर आधारित थे या उनमें कोई और दबाव काम कर रहा था. हालांकि, LIC ने अभी तक इस मामले पर कोई सार्वजनिक बयान जारी नहीं किया है, लेकिन शेयर की भारी गिरावट के बाद अब LIC को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है.
इस घोटाले का व्यापक असर और आगे क्या?
राजेश एक्सपोर्ट्स का यह घोटाला कई मायनों में अहम है:
- यह दिखाता है कि भारत में कॉरपोरेट गवर्नेंस और ऑडिट की व्यवस्था में अब भी बड़ी खामियां हैं. एक कंपनी अगर एक दशक तक 15 लाख करोड़ रुपये का फर्जी राजस्व दिखा सकती है तो सवाल ऑडिटरों और रेगुलेटरों पर भी उठते हैं.
- यह घोटाला उन हजारों छोटे निवेशकों के लिए एक बड़ा सबक है जो सिर्फ बड़े नाम और चमकदार आंकड़ों पर भरोसा करके शेयर खरीद लेते हैं.
- LIC जैसी सरकारी संस्था का इस कंपनी में इतना बड़ा निवेश करना यह सवाल उठाता है कि क्या सार्वजनिक धन की सुरक्षा के लिए पर्याप्त जांच-पड़ताल की गई थी.
एक्सपर्ट्स का मानना है कि आगे की राह में सेबी की जांच जारी रहेगी और हो सकता है कि इस मामले में ED और CBI भी एंट्री करें. राजेश मेहता और उनके सहयोगियों पर आपराधिक मुकदमे चल सकते हैं. कंपनी के शेयरधारकों के लिए तो शायद अब कुछ हाथ न आए, लेकिन यह पूरा प्रकरण भारत के वित्तीय बाजारों के लिए एक बड़ी चेतावनी है. जब तक बहतरीन निगरानी और ऑडिट की क्वालिटी नहीं सुधरेगी, ऐसे 'कागजी' साम्राज्य बनते-बिगड़ते रहेंगे.

























