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India-EU एफटीए पर लगी मुहर, 'मदर ऑफ ऑल डील' को प्रभावी होने के लिए अब क्या होगा अगला कदम?

भारत और ईयू के बीच 180 बिलियन का ट्रेड है, जबकि आठ लाख से ज्यादा भारतीय वहां पर काम कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि स्ट्रैटजिक टेक्नोलॉजी से लेकर क्लीन एनर्जी तक हर क्षेत्र में सहयोग के नए आयाम स्थापित होंगे.

India EU Free Trade Agreement: भारत और यूरोपीय यूनियन (ईयू) के बीच हुआ यह ऐतिहासिक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) न केवल द्विपक्षीय व्यापार के लिहाज से बल्कि वैश्विक भू-आर्थिक परिदृश्य में भी बेहद अहम माना जा रहा है. करीब 18–20 वर्षों तक चली जटिल और कई बार ठप पड़ चुकी बातचीत के बाद इस समझौते पर सहमति बनना इस बात का संकेत है कि दोनों पक्ष बदलते वैश्विक हालात में एक-दूसरे को रणनीतिक साझेदार के रूप में देख रहे हैं. ऐसे समय में, जब अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों में अनिश्चितता और ऊंचे टैरिफ जैसी चुनौतियां सामने हैं, भारत-ईयू एफटीए दोनों के लिए वैकल्पिक, स्थिर और भरोसेमंद बाजार सुनिश्चित करेगा.

वर्तमान में यूरोपीय यूनियन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और भारत के कुल व्यापार का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा ईयू के साथ होता है. वित्त वर्ष 2024-25 में दोनों के बीच वस्तुओं का व्यापार करीब 136.53 बिलियन डॉलर रहा, जिसमें भारत का निर्यात 75.85 बिलियन डॉलर और आयात 60.68 बिलियन डॉलर रहा, यानी भारत को लगभग 15.17 बिलियन डॉलर का ट्रेड सरप्लस मिला. इसके अलावा सेवा क्षेत्र में भी आईटी, बिजनेस सर्विसेज और टेलीकम्युनिकेशन समेत करीब 83 बिलियन डॉलर का कारोबार हुआ. एफटीए लागू होने के बाद इन आंकड़ों में तेज बढ़ोतरी की उम्मीद है.

FTA से व्यापार बढ़ने की उम्मीद

टैरिफ के मोर्चे पर यह समझौता बेहद निर्णायक साबित होगा. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, ऑटोमोबाइल और स्टील को छोड़कर करीब 93 प्रतिशत भारतीय सामानों पर यूरोपीय बाजार में आयात शुल्क पूरी तरह खत्म हो जाएगा. शेष उत्पादों पर भी या तो टैरिफ में बड़ी कटौती होगी या कोटा आधारित छूट दी जाएगी. कुल मिलाकर ईयू भारत के लगभग 99.5 प्रतिशत सामानों को टैरिफ रियायत देगा. वहीं भारत भी चरणबद्ध तरीके से अपने आयात शुल्क घटाएगा, जिससे यूरोपीय उत्पाद भारतीय बाजार में अपेक्षाकृत सस्ते हो सकेंगे. इससे कपड़ा, चमड़ा, इंजीनियरिंग गुड्स, फार्मा, कृषि उत्पाद और प्रोसेस्ड फूड जैसे क्षेत्रों को बड़ा फायदा मिलेगा.

इस एफटीए का असर सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट किया कि यह केवल ट्रेड एग्रीमेंट नहीं, बल्कि मोबिलिटी, टेक्नोलॉजी और लोगों के आपसी संपर्क का भी नया फ्रेमवर्क है. इसके तहत छात्रों, शोधकर्ताओं, कुशल पेशेवरों और कामगारों की आवाजाही आसान होगी, जिससे शिक्षा, रिसर्च और रोजगार के नए अवसर खुलेंगे. साथ ही, क्लीन एनर्जी, ग्रीन हाइड्रोजन, सेमीकंडक्टर, डिजिटल टेक्नोलॉजी और सप्लाई चेन रेज़िलिएंस जैसे क्षेत्रों में सहयोग को मजबूती मिलेगी.

रक्षा और सुरक्षा सहयोग भी इस समझौते का अहम हिस्सा है. पीएम मोदी के अनुसार, यह एफटीए काउंटर टेररिज्म, साइबर सिक्योरिटी और डिफेंस को-प्रोडक्शन जैसे क्षेत्रों में साझेदारी को औपचारिक और गहरा करेगा. इससे न केवल रणनीतिक विश्वास बढ़ेगा, बल्कि भारतीय डिफेंस इंडस्ट्री को भी यूरोपीय तकनीक और निवेश का लाभ मिलेगा.

कैसे होगा एफटीए प्रभावी?

अब इस एफटीए समझौते का कानूनी परीक्षण (लीगल रिविजन) किया जाएगा और इसे यूरोपीय संघ की सभी आधिकारिक भाषाओं में अनुवादित किया जाएगा. इसके बाद यूरोपीय आयोग इसे मंजूरी के लिए यूरोपीय काउंसिल और यूरोपीय संसद के सामने पेश करेगा. इसी दौरान भारत में भी इस समझौते को घरेलू स्तर पर अनुमोदित (रैटिफाई) किया जाएगा. जब दोनों पक्षों की मंजूरी मिल जाएगी, तब यह समझौता लागू हो जाएगा.

हालांकि, इसके तहत टैरिफ में कटौती और नियामकीय प्रावधानों को एक साथ लागू नहीं किया जाएगा, बल्कि इन्हें अगले लगभग दस वर्षों में चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा. यूरोपीय संघ के लिए यह समझौता केवल निर्यात बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि आर्थिक मजबूती और वैश्विक जोखिमों से निपटने की रणनीति का हिस्सा है.

भारत की अर्थव्यवस्था सालाना 6 प्रतिशत से अधिक की दर से बढ़ रही है और करीब 145 करोड़ की युवा आबादी के साथ भारत को भविष्य की वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में देखा जा रहा है. इसी वजह से यह समझौता ईयू को एक मजबूत और रणनीतिक साझेदार प्रदान करता है. यूरोपीय आयोग का अनुमान है कि इस समझौते से 2032 तक भारत को होने वाला यूरोपीय सामानों का निर्यात दोगुना हो सकता है, जिससे मैन्युफैक्चरिंग, कृषि और सेवा क्षेत्रों में रोजगार को बढ़ावा मिलेगा.

अनुमान है कि यह अगले वर्ष से प्रभावी हो सकता है. कुल मिलाकर, इंडिया-ईयू एफटीए भारत के लिए निर्यात, निवेश, रोजगार और वैश्विक वैल्यू चेन में हिस्सेदारी बढ़ाने का बड़ा अवसर है, जबकि ईयू के लिए यह एशिया में एक विशाल, युवा और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था तक पहुंच का रास्ता खोलता है. यह समझौता दोनों पक्षों को दीर्घकालिक आर्थिक साझेदारी की नई ऊंचाइयों तक ले जाने वाला माना जा रहा है.

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