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सस्ता नहीं, महंगा है लेबर... फिर भी मैन्युफैक्चरिंग हब बन बैठा चीन, आखिर यहां भी क्या खेल कर गया ड्रैगन?

अक्सर यह माना जाता रहा है कि चीन की मैन्युफैक्चरिंग ताकत की वजह सस्ता श्रम है, लेकिन अब यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है. पिछले तीन दशकों में चीन में मजदूरी तेजी से बढ़ी है.

China World's Production Hub: चीन आज भी मैन्युफैक्चरिंग के मामले में दुनिया का निर्विवाद नेता बना हुआ है. सेफगार्ड ग्लोबल की 2024 मैन्युफैक्चरिंग रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में चीन में 4.66 ट्रिलियन डॉलर मूल्य के सामानों का उत्पादन हुआ, जो वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग का करीब 28 प्रतिशत है. इसके मुकाबले अमेरिका 2.91 ट्रिलियन डॉलर के उत्पादन के साथ दूसरे स्थान पर रहा, जबकि जापान (867 अरब डॉलर) और जर्मनी (830 अरब डॉलर) इसके बाद आते हैं. भारत में सस्ती श्रम लागत के बावजूद 2024 में केवल 490 अरब डॉलर का उत्पादन हुआ, जो वैश्विक हिस्सेदारी का लगभग तीन प्रतिशत है. दक्षिण कोरिया, मैक्सिको, इटली और ब्रिटेन जैसे देशों की हिस्सेदारी भी 1.7 से 2.5 प्रतिशत के बीच ही रही.

कैसे चीन अब भी प्रोडक्शन हब?

अक्सर यह माना जाता रहा है कि चीन की मैन्युफैक्चरिंग ताकत की वजह सस्ता श्रम है, लेकिन अब यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है. पिछले तीन दशकों में चीन में मजदूरी तेजी से बढ़ी है और 2022 के आसपास फैक्ट्री वर्कर्स की औसत मजदूरी करीब 8 डॉलर प्रति घंटा तक पहुंच गई थी.


सस्ता नहीं, महंगा है लेबर... फिर भी मैन्युफैक्चरिंग हब बन बैठा चीन, आखिर यहां भी क्या खेल कर गया ड्रैगन?

इसके मुकाबले वियतनाम, मलेशिया, थाईलैंड और भारत जैसे देशों में श्रम लागत कहीं कम है. इसके बावजूद चीन का उत्पादन लगातार ऊंचा बना हुआ है, जिससे साफ है कि केवल सस्ता श्रम ही निर्णायक कारक नहीं है.

कहां कितनी श्रम लागत [सेफगार्ड ग्लोबल की 2024 मैन्युफैक्चरिंग रिपोर्ट]

देश श्रम लागत प्रति घंटे (डॉलर में) वैश्विक हिस्सा
चीन 4.66 ट्रिलियन डॉलर 28.9%
अमेरिका 2.91 ट्रिलियन डॉलर 17.2%
जापान 867 अरब डॉलर 5.1%
जर्मनी 830 अरब डॉलर 5.1%
भारत 490 अरब डॉलर 3%

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के विश्लेषण के अनुसार, चीन की असली ताकत उसकी उच्च उत्पादकता और मजबूत औद्योगिक इकोसिस्टम है. चीन में श्रम लागत भले ही ज्यादा हो, लेकिन वहां के कामगारों की उत्पादकता, काम की रफ्तार और गुणवत्ता कम लागत वाले देशों की तुलना में कहीं बेहतर है. वैश्विक कंपनियों के लिए कुल उत्पादन लागत ज्यादा मायने रखती है, न कि सिर्फ मजदूरी. कई मामलों में सस्ता श्रम होने के बावजूद कम उत्पादकता के कारण कुल लागत बढ़ जाती है.

बाजार पर कैसे चीन का वर्चस्व?

इसके अलावा, चीन ने पिछले कई दशकों में एक ऐसा व्यापक औद्योगिक इकोसिस्टम विकसित किया है, जहां कच्चे माल से लेकर कंपोनेंट्स, असेंबली प्लांट और सप्लाई चेन एक-दूसरे के बेहद करीब मौजूद हैं. इससे उत्पादन, लॉजिस्टिक्स और समन्वय आसान और तेज हो जाता है. यही वजह है कि वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम का मानना है कि किसी भी कंपनी के लिए चीन छोड़कर किसी दूसरे देश में जाना, वहां बने रहने की तुलना में कहीं ज्यादा महंगा और जटिल साबित हो सकता है.

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राजेश कुमार पत्रकारिता जगत में पिछले करीब 14 सालों से ज्यादा वक्त से अपना योगदान दे रहे हैं. राष्ट्रीय और सामाजिक मुद्दों से लेकर अपराध जगत तक, हर मुद्दे पर वह स्टोरी लिखते आए हैं. इसके साथ ही, किसी खबरों पर किस तरह अलग-अलग आइडियाज के साथ स्टोरी की जाए, इसके लिए वह अपने सहयोगियों का लगातार मार्गदर्शन करते रहे हैं. इनकी अंतर्राष्ट्रीय जगत की खबरों पर खास नज़र रहती है, जबकि भारत की राजनीति में ये गहरी रुचि रखते हैं. इन्हें क्रिकेट खेलना काफी पसंद और खाली वक्त में पसंद की फिल्में भी खूब देखते हैं. पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखने से पहले उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मास्टर ऑफ ब्रॉडकास्ट जर्नलिज्म किया है. राजनीति, चुनाव, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर राजेश कुमार लगातार लिखते आ रहे हैं.
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